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असम-मिजोरम बॉर्डर पर ट्रकों की लाइन लंबी कतार, दो राज्यों की पुरानी लड़ाई सड़क पर क्यों आई?

एक highway पर खड़े सैकड़ों ट्रक सिर्फ transport की कहानी नहीं, बल्कि दो राज्यों के दशकों पुराने सीमा विवाद का नया साइड इफेक्ट हैं. असम सरकार के Border Protection and Development Department के मुताबिक Assam-Mizoram सीमा 164.6 किलोमीटर लंबी है और सीमा को लेकर दोनों राज्यों के ऐतिहासिक दावे अलग हैं.

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असम-मिजोरम बॉर्डर पर ट्रकों की आवाजाही क्यों रुकी है? (फोटो-PTI/ANI)

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  • 1 सितंबर 2023 को असम के कछार जिले के लैलापुर इलाके में मिजोरम जाने वाले मालवाहक ट्रकों की आवाजाही ट्रक ड्राइवरों द्वारा उत्पीड़न की शिकायत के कारण बाधित हुई।
  • असम और मिजोरम के बीच सीमांकन को लेकर ऐतिहासिक दस्तावेजों में भिन्नता और क्षेत्रीय प्रशासनिक मतभेदों ने ट्रांसपोर्ट विवाद को बढ़ावा दिया है।
  • यह घटना मिजोरम की सप्लाई चेन पर प्रभाव डाल सकती है और दोनों राज्यों की सरकारों द्वारा समाधान के लिए बातचीत जारी रखने की आवश्यकता बताती है।

असम और मिजोरम के बीच सीमा विवाद एक बार फिर सड़क पर दिखाई दे रहा है. इस बार मामला गोलीबारी या आमने-सामने की पुलिस कार्रवाई का नहीं, बल्कि ट्रकों के पहिए थम जाने का है. मिजोरम जाने वाले मालवाहक ट्रकों की आवाजाही असम के कछार जिले के लैलापुर इलाके में प्रभावित हुई है. ट्रक ड्राइवरों और ट्रांसपोर्टरों ने मिजोरम में कथित तौर पर उत्पीड़न, डराने-धमकाने और माल लेकर जाने में बार-बार आने वाली दिक्कतों का आरोप लगाया है. 

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इसके विरोध में बड़ी संख्या में ट्रक खड़े कर दिए गए हैं. NDTV के मुताबिक 2 सितंबर की रिपोर्ट में 100 से ज्यादा ट्रक ड्राइवरों और ट्रांसपोर्ट कर्मचारियों के विरोध का जिक्र है.

ट्रक ड्राइवर आखिर नाराज क्यों हैं?

पूरे विवाद की तात्कालिक वजह सीमा विवाद से ज्यादा ट्रांसपोर्ट को लेकर पैदा हुआ टकराव है. ट्रांसपोर्टरों का आरोप है कि असम नंबर वाले ट्रकों को मिजोरम में सामान पहुंचाने के दौरान बार-बार परेशानियों का सामना करना पड़ता है. खास तौर पर कुछ मालवाहक वाहनों के प्रवेश और आवाजाही को लेकर आपत्तियां सामने आई हैं.

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Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक बराक वैली के ट्रक ड्राइवरों ने मिजोरम में असम के ट्रकों के कथित उत्पीड़न और रेत से लदे वाहनों के प्रवेश पर रोक जैसी शिकायतें उठाई हैं. इसी को लेकर 30 अगस्त से "steering down" आंदोलन शुरू हुआ और सिलचर-आइजोल हाईवे पर ट्रकों की आवाजाही प्रभावित हुई.

इसके बाद मामला और गरम हो गया. 1 सितंबर को कछार जिला प्रशासन ने सड़क से ट्रकों का जाम हटाने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे. उन्होंने भारी वाहनों को सड़क पर खड़ा कर दिया और कहा कि सिर्फ ट्रैफिक खुलवाने के बजाय ड्राइवरों की सुरक्षा की गारंटी पर बात होनी चाहिए.

असम और मिजोरम की सीमा आखिर तय क्यों नहीं है?

यहीं से कहानी करीब 150 साल पीछे चली जाती है. असम और मिजोरम के बीच इंटर-स्टेट सीमा करीब 164.6 किलोमीटर लंबी है. ये सीमा असम के कछार, हैलाकांडी और करीमगंज जिलों से लगती है. असम सरकार के मुताबिक सीमा को लेकर दोनों राज्यों की ऐतिहासिक व्याख्या अलग-अलग है. असम 9 मार्च 1933 की अधिसूचना और बाद में मिजोरम के गठन से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को सीमा का आधार मानता है. वहीं मिजोरम 20 अगस्त 1875 की Inner Line Notification को ऐतिहासिक और जातीय आधार पर सीमा का आधार मानता है.

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मतलब एक ही जमीन के लिए दो अलग-अलग ऐतिहासिक दस्तावेज सामने रखे जाते हैं. यही इस विवाद की सबसे बड़ी पेचीदगी है.

इसी वजह से सीमा पर कई जगह जमीन को लेकर दोनों पक्षों की धारणा अलग है. कागजों पर खींची गई रेखा और जमीन पर मौजूद प्रशासनिक नियंत्रण के बीच मतभेद समय-समय पर तनाव पैदा करता रहा है.

2021 में ऐसा क्या हुआ था?

इस विवाद का सबसे गंभीर रूप जुलाई 2021 में दिखाई दिया था. असम और मिजोरम की सीमा पर पुलिस बलों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इसमें असम पुलिस के कम से कम छह जवानों की मौत हुई और 50 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. इस घटना ने पूरे देश का ध्यान इस पुराने सीमा विवाद की तरफ खींच दिया था.

लेकिन 2021 की हिंसा अचानक पैदा हुई कोई नई दुश्मनी नहीं थी. इससे पहले भी सीमा पर स्थानीय लोगों के बीच झड़पें और तनाव की घटनाएं होती रही थीं. विवाद की जड़ पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड, जमीन पर नियंत्रण और अलग-अलग सीमा दावों में है.

तो क्या अभी फिर सीमा विवाद भड़क गया है

अभी उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर ऐसा कहना जल्दबाजी होगी कि 2021 जैसी स्थिति लौट आई है. मौजूदा मामला ट्रक ड्राइवरों की शिकायत, मालवाहक वाहनों की आवाजाही और कथित उत्पीड़न को लेकर है.

लेकिन समस्या ये है कि ट्रांसपोर्ट रूट उसी संवेदनशील इलाके से होकर गुजरता है जहां दोनों राज्यों के बीच सीमा को लेकर पुराना विवाद मौजूद है. इसलिए एक छोटा प्रशासनिक या कारोबारी विवाद भी जल्दी राजनीतिक और अंतरराज्यीय मुद्दा बन सकता है.

1 सितंबर को प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव इसी वजह से बढ़ा. अधिकारियों ने सड़क खाली कराने की कोशिश की, जबकि ट्रक ड्राइवर सुरक्षा और स्थायी समाधान की मांग पर अड़े रहे.

मिजोरम की सप्लाई चेन पर असर क्यों पड़ता है?

मिजोरम की भौगोलिक स्थिति इस कहानी को और महत्वपूर्ण बना देती है. राज्य की बड़ी मात्रा में बाहरी सप्लाई सड़क मार्ग से आती है और असम से होकर गुजरने वाले रास्ते बेहद अहम हैं. इसलिए अगर असम से मिजोरम जाने वाले ट्रकों की आवाजाही रुकती है तो असर सिर्फ ट्रांसपोर्टरों तक सीमित नहीं रहता.

माल की सप्लाई प्रभावित होने पर बाजारों में सामान पहुंचने में देरी हो सकती है. ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ सकती है और कारोबारियों को वैकल्पिक रास्तों या अतिरिक्त इंतजामों का सहारा लेना पड़ सकता है. फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में व्यापक स्तर पर किसी वस्तु की कमी का आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है, इसलिए किसी खास सामान की किल्लत का दावा करना अभी सही नहीं होगा. हालांकि Times of India ने माल और जरूरी वस्तुओं की आवाजाही प्रभावित होने की बात कही है.

असम सरकार की भूमिका क्या है?

क्योंकि ट्रक फिलहाल असम के कछार जिले के लैलापुर इलाके में खड़े हैं, इसलिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस की पहली जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सड़क यातायात सामान्य कराने की है.

लेकिन ये मामला सिर्फ जिला प्रशासन से हल होने वाला नहीं है. इसमें असम और मिजोरम दोनों सरकारों के बीच बातचीत जरूरी है. दोनों राज्यों के बीच सीमा विवाद पर बातचीत पहले भी होती रही है. असम सरकार के मुताबिक दोनों राज्यों ने 2014 में यथास्थिति बनाए रखने, सीमा के सीमांकन और Survey of India तथा दोनों राज्यों के भूमि अधिकारियों की भागीदारी वाले तंत्र के जरिए समाधान की दिशा में सहमति जताई थी. बाद के वर्षों में भी सीमा विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश जारी रही है.

केंद्र क्या कर सकता है?

केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ा काम दोनों राज्यों के बीच संवाद को लगातार बनाए रखना है. सीमा विवाद को सिर्फ तब सक्रिय करना जब तनाव बढ़ जाए, लंबे समय का समाधान नहीं है. सोशल एक्टिविस्ट और पूर्व पत्रकार पंकज कर्माकर कहते हैं,

सेंटर को एक साथ कई स्तरों पर काम करना होगा. एक तरफ ट्रक ड्राइवरों की सुरक्षा और माल की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करनी होगी. दूसरी तरफ सीमा से जुड़े मूल विवाद को सर्वे, पुराने रिकॉर्ड और दोनों राज्यों की सहमति के आधार पर सुलझाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा.

क्योंकि जब तक सीमा को लेकर दोनों राज्यों की जमीन पर समझ एक जैसी नहीं होती, तब तक सड़क, जंगल, जमीन, पुलिस कार्रवाई या ट्रांसपोर्ट जैसे छोटे दिखने वाले मुद्दे भी बड़े विवाद में बदल सकते हैं.

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असल कहानी क्या है?

इस पूरी कहानी में सबसे जरूरी बात ये है कि लैलापुर में खड़े ट्रक सिर्फ ट्रक नहीं हैं. ये उस पुराने विवाद का आर्थिक असर हैं जिसकी जड़ औपनिवेशिक दौर की दो अलग-अलग सीमा व्यवस्थाओं में है. सोशल एक्टिविस्ट पंकज कर्माकर के शब्दों में,

आज मामला ड्राइवरों की सुरक्षा और माल की आवाजाही से शुरू हुआ है. कल यही मुद्दा फिर सीमा, जमीन और अधिकार की बहस में बदल सकता है.

इसलिए असली सवाल सिर्फ ये नहीं है कि ट्रकों की लाइन कब खुलेगी. बड़ा सवाल ये है कि असम और मिजोरम के बीच वो सीमा कब साफ होगी जिसे दोनों राज्य आज भी अलग-अलग ऐतिहासिक दस्तावेजों से समझते हैं. जब तक इस सवाल का टिकाऊ जवाब नहीं मिलता, सीमा पर तनाव कभी पुलिस के रूप में, कभी जमीन के विवाद के रूप में और कभी सड़क पर खड़े ट्रकों के रूप में सामने आता रहेगा.

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