वैज्ञानिक जोर दे रहे हैं कि भारत को अपने बिजली बनाने वाले रिएक्टरों में थोरियम वाले फ्यूल का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए. यानी यूरेनियम की जगह रिएक्टरों में फ्यूल के तौर पर थोरियम को समय से पहले यूज करने की शुरुआत करना जरूरी हो गया है. हालांकि, यह भारत के तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का सबसे आखिरी चरण है.
न्यूक्लियर 'चैंपियन' बनने के लिए भारत को यूरेनियम नहीं थोरियम चाहिए?
परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व चेयरमैन अनिल काकोदकर का कहना है कि भारत को मौजूदा PHWR रिएक्टरों में थोरियम आधारित फ्यूल का इस्तेमाल शुरू करने पर विचार करना चाहिए, ताकि यूरेनियम पर निर्भरता कम हो.

भारत के बड़े परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर का कहना है कि देश में बने प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) में थोरियम वाले फ्यूल को अब शामिल कर लेना चाहिए. ताकि भविष्य में तीसरे चरण के परमाणु कार्यक्रम को जल्दी शुरू करने में मदद मिल सके.
भारत फिलहाल, बिजली बनाने वाले अपने रिएक्टरों में प्राकृतिक यूरेनियम पर आधारित फ्यूल यूज करता है. वह थोरियम का इस्तेमाल अभी बिजली बनाने के लिए नहीं कर रहा है. काकोदकर इसके पीछे तर्क देते हैं कि भारत में थोरियम भारी मात्रा में मौजूद है. जबकि यूरेनियम उसे इंपोर्ट करना पड़ता है. ऐसे में खर्चा कम करने और ज्यादा से ज्यादा आत्मनिर्भर बनने के लिए जरूरी है कि मौजूदा रिएक्टरों में कुछ बदलाव के साथ थोरियम आधारित फ्यूल का इस्तेमाल शुरू कर दिया जाए.
अनिल काकोदकर परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व चेयरमैन हैं और फिलहाल होमी जहांगीर भाभा नेशनल इंस्टीट्यूट के चांसलर और राजीव गांधी साइंस एंड टेक्नोलॉजी कमीशन के चेयरमैन हैं. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में काकोदकर ने कहा कि उन्हें लगता है कि प्राकृतिक यूरेनियम और लो-एनरिच्ड यूरेनियम (Low-Enriched Uranium) पर आधारित फ्यूल साइकिल का दौर ज्यादा समय तक नहीं चलेगा.
फिलहाल, भारत समेत दुनिया में ज्यादातर रिएक्टर प्राकृतिक यूरेनियम या लो-एनरिच्ड यूरेनियम वाले फ्यूल से चलते हैं. लेकिन यूरेनियम की मात्रा तो असीमित नहीं है. काकोदकर के मुताबिक, अगर यूरेनियम को रिएक्टर में सिर्फ एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिया जाए और दोबारा इस्तेमाल न किया जाए तो दुनिया के मौजूदा यूरेनियम रिसोर्स लगभग 550 से 750 GWe परमाणु क्षमता को ही 60 साल तक चला पाएंगे. लेकिन विश्व परमाणु संगठन (World Nuclear Association) का अनुमान है कि साल 2050 तक दुनिया की परमाणु बिजली क्षमता करीब 1,400 GWe हो सकती है.
ऐसे में लंबे समय तक ऊर्जा सुरक्षा और न्यूक्लियर फ्यूल की सप्लाई के लिए दो तरीकों पर काम किया जा सकता है.
भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का दूसरा चरण यही है. फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) प्लूटोनियम फ्यूल से चलते हैं. ये रिएक्टर यूरेनियम-238 (U-238) को प्लूटोनियम में बदलकर फ्यूल के रूप में इस्तेमाल करते हैं. इससे यूरेनियम की उपयोग दक्षता 60 से 100 गुना तक बढ़ जाती है, जिससे वही रिसोर्स सैकड़ों-हजारों सालों तक चल सकते हैं.
FBR में भी आगे चलकर थोरियम का इस्तेमाल किया जा सकता है और भारत के लिए यह खासतौर पर महत्वपूर्ण भी है. क्योंकि भारत के पास थोरियम के बड़े संसाधन हैं. लेकिन दिक्कत यह है कि भारत को FBR तकनीक विकसित करने और बड़े पैमाने पर लगाने में अभी काफी समय लगेगा. इसमें लगभग 20 से 30 साल लग सकते हैं.
लेकिन थोरियम के लिए जल्दी क्यों मची है?काकोदकर की चिंता है कि जब दुनिया में यूरेनियम की कमी से परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की रफ्तार पर असर होगा, तब तक भारत शायद अपनी जरूरत के हिसाब से FBR को इतने बड़े पैमाने पर तैनात करने की हालत में नहीं पहुंच पाएगा. ऐसे में अगर हम FBR के पूरी तरह तैयार होने का इंतजार करते रहे तो थोरियम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू करने में बहुत देर हो सकती है. यहीं वो दुविधा है, जहां पर PHWR रिएक्टर काम आते हैं.
काकोदकर कहते हैं कि PHWR यानी प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स में HALEU-थोरियम फ्यूल का इस्तेमाल किया जा सकता है. HALEU ऐसा ईंधन है जिसमें थोरियम के साथ एक खास तरह का यूरेनियम (High-Assay Low-Enriched Uranium) मिलाया जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि थोरियम अकेले वैसे न्यूक्लियर फ्यूल की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जैसे यूरेनियम का यूज किया जाता है.
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इसका क्या फायदा होगा?काकोदकर के मुताबिक, थोरियम बेस्ड फ्यूल यूज करने के लिए मौजूदा PHWR डिजाइन में बहुत बड़ा बदलाव करने की जरूरत नहीं होगी और भारत को FBR के पूरी तरह से तैयार होने से पहले ही थोरियम के इस्तेमाल का मौका मिल सकता है. इसका फायदा ये होगा कि काफी मात्रा में यूरेनियम की बचत होगी और इसके आयात में कमी आएगी. साथ ही इस्तेमाल के बाद फ्यूल का कचरा कम होगा. न्यूक्लियर फ्यूल सिक्योरिटी और अवैलेबिलिटी बेहतर हो सकेगी. सबसे जरूरी बात कि भारत को थोरियम के इस्तेमाल का अनुभव पहले से मिलने लगेगा.
करीब 15 साल बाद जब थोरियम बेस्ड Molten Salt Reactors (TMSRs) के जरिए परमाणु कार्यक्रम के तीसरे चरण को शुरू करना होगा तो तो ये काम थोड़ा आसान हो जाएगा.
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