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पत्नी की तकलीफ देखी नहीं गई, तो बुजुर्ग ने घर की सीढ़ियों पर बना डाली जुगाड़ वाली देसी एस्केलेटर

Farmer Builds Homemade Escalator: पत्नी के घुटने में दर्द था, तो आंध्र के 5वीं पास बुजुर्ग ने घर की सीढ़ियों पर ही बना दिया 'देसी एस्केलेटर'. मोहब्बत और जुगाड़ का यह वीडियो इंटरनेट पर गदर मचा रहा है.

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पत्नी के लिए घर में बनाया देसी एस्केलेटर (फोटो-AI)

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  • आंध्र प्रदेश के सत्ती शिव नारायण रेड्डी ने अपनी पत्नी के घुटनों के दर्द के लिए घर की सीढ़ियों पर एक देसी एस्केलेटर यानी होम-मेड लिफ्ट तैयार की, जिसका खर्च लगभग 70,000 रुपये था।
  • उनकी पत्नी के लिए ऊपर की मंजिल पर जाना मुश्किल हो गया था, और बाजार में महंगी लिफ्ट उपलब्ध न होने या महंगी होने के कारण शिव नारायण ने खुद मशीन बनाने का निर्णय लिया।
  • इस देसी एस्केलेटर ने बुजुर्गों की मोबाइलिटी समस्याओं को सस्ता और प्रभावी समाधान प्रदान किया है, जिससे गांवों में बुजुर्गों की उपयोगी गतिशीलता बेहतर हो सकती है।

शाहजहां ने मुमताज के लिए ताजमहल बनवाया था. इतिहास गवाह है. लेकिन आंध्र प्रदेश के एक बुजुर्ग ने अपनी पत्नी के लिए जो कुछ किया, वो शाहजहां के मकबरे से कहीं ज्यादा काम की चीज है. मोहब्बत जब दिमाग और हुनर के साथ मिलती है, तो वो कोई आलीशान इमारत नहीं बल्कि इंसान की तकलीफ दूर करने का जरिया बन जाती है. सोशल मीडिया पर आजकल एक वीडियो खूब धूम मचा रहा है. इस वीडियो में एक बुजुर्ग अपनी पत्नी के लिए घर की सीढ़ियों पर एक 'देसी एस्केलेटर' यानी होम-मेड लिफ्ट चलाते नजर आ रहे हैं. ये कहानी है आंध्र प्रदेश के ईस्ट गोदावरी जिले के अर्थमूरु गांव के रहने वाले 65 साल के सत्ती शिव नारायण रेड्डी और उनकी 58 साल की पत्नी सत्यवेणी की.

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शिव नारायण रेड्डी ने अपनी पत्नी के घुटनों के दर्द को दूर करने के लिए घर के अंदर ही एक ऐसा चलता-फिरता जुगाड़ तैयार कर दिया, जिसने बड़े-बड़े इंजीनियरों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है. आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर इस कमाल के जुगाड़ के पीछे की पूरी कहानी क्या है.

जुगाड़ का मास्टरमाइंड: सिर्फ 5वीं पास और कमाल की इंजीनियरिंग

‘दि इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक सत्ती शिव नारायण रेड्डी कोई पढ़े-लिखे मैकेनिकल इंजीनियर नहीं हैं. उन्होंने गांव के पास स्कूल न होने की वजह से सिर्फ 5वीं क्लास तक पढ़ाई की है. लेकिन उनके पास एक ऐसी डिग्री है जो किसी यूनिवर्सिटी में नहीं मिलती- 'तजुर्बा'. रेड्डी पेशे से एक किसान हैं, जिनके पास पांच एकड़ जमीन है, चार ट्रैक्टर हैं और वो एक राइस मिल भी चलाते हैं. सालों से अपने ट्रैक्टरों, राइस मिल की मशीनों और खेती-किसानी के औजारों को खुद ठीक करते-करते वो मशीनों के उस्ताद बन गए.

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जब उनकी पत्नी सत्यवेणी को घुटनों में तेज दर्द रहने लगा, तो उनके लिए घर की 21 सीढ़ियां चढ़ना एक भयानक सजा जैसा हो गया था. वास्तु के मुताबिक उनका बेडरूम पहली मंजिल पर था, इसलिए नीचे रहना मुमकिन नहीं था. अपनी पत्नी को रोज दर्द से तड़पते देख रेड्डी ने ठान लिया कि वो इसका कोई न कोई हल जरूर निकालेंगे. उन्होंने बाजार में मिलने वाली महंगी कमर्शियल लिफ्ट या स्टेयरलिफ्ट के बजाय खुद का दिमाग इस्तेमाल करने का फैसला किया.

कैसे काम करता है ये देसी एस्केलेटर?

शिव नारायण रेड्डी ने करीब 20 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद इस चलती हुई सीढ़ी को तैयार कर दिया. इसे बनाने में उनका कुल खर्च महज 70,000 रुपये आया, जो कि बाजार में मिलने वाली लिफ्ट की कीमत का एक बहुत छोटा हिस्सा है.

‘ईटीवी भारत’ के मुताबिक इस देसी एस्केलेटर की तकनीकी खूबियां कुछ इस तरह हैं,

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पावरफुल मोटर: इस पूरे सिस्टम को चलाने के लिए 1.5 हॉर्सपावर (HP) की इलेक्ट्रिक मोटर का इस्तेमाल किया गया है.

लोड कैपेसिटी: ये मशीन 300 किलोग्राम तक का वजन आराम से उठा सकती है. अब सत्यवेणी के साथ-साथ घर का भारी सामान जैसे चावल की बोरियां और राशन भी इसी से ऊपर जाता है.

सुरक्षा के इंतजाम: इसमें खास ऑटो-स्टॉपर और तीन सेफ्टी स्टॉपर्स लगाए गए हैं ताकि किसी भी हादसे के वक्त ये तुरंत रुक जाए.

पावर बैकअप: गांवों में बिजली कटने की समस्या आम होती है. इसके लिए रेड्डी ने इसे 1400 VA के इन्वर्टर बैकअप से जोड़ दिया है ताकि बिजली जाने पर भी सत्यवेणी बीच में न फंसी रहें.

द लव स्टोरी: छोटे कस्बों की खामोश मोहब्बत

आजकल सोशल मीडिया पर लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों, महंगे तोहफों और रील्स के जरिए अपनी मोहब्बत का दिखावा करते हैं. लेकिन भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में आज भी एक ऐसी मोहब्बत बसती है, जो चिल्लाकर अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं कराती. वो पार्टनर की तकलीफ को देखकर अंदर ही अंदर पिघलती है और फिर एक समाधान बनकर सामने आती है.

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक जब शिव नारायण रेड्डी से पूछा गया कि उन्होंने ये क्यों किया, तो उन्होंने बहुत सादगी से कहा कि शाहजहां ने प्यार साबित करने के लिए ताजमहल बनवाया था, लेकिन असली प्यार वो है जो अपनों की रोजमर्रा की जिंदगी के दर्द को कम कर सके. इंटरनेट पर लोग इस वीडियो को देखकर भावुक हो रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि असली 'मजनू' और 'रांझा' तो ये दादाजी हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी की आंखों के आंसू पोंछने के लिए कबाड़ और लोहे को एक खूबसूरत तोहफे में बदल दिया.

बुजुर्गों के लिए होम-केयर और कस्टमाइज्ड सॉल्यूशंस की जरूरत

ये कहानी सिर्फ एक अनोखे जुगाड़ या रोमांटिक कपल की नहीं है. ये देश की एक बहुत बड़ी समस्या की तरफ भी इशारा करती है. भारत में उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्गों में ऑस्टियोआर्थराइटिस और घुटनों के दर्द की समस्या बहुत तेजी से बढ़ रही है. शहरों में तो बहुमंजिला इमारतों में लिफ्ट होती हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों या कस्बों में बने दो-मंजिला मकानों में बुजुर्गों के लिए ऊपर-नीचे करना दूभर हो जाता है.

बाजार में मिलने वाले मेडिकल इक्विपमेंट्स और होम-लिफ्ट्स इतने महंगे होते हैं कि एक आम भारतीय परिवार उन्हें खरीदने की सोच भी नहीं सकता. ऐसे में शिव नारायण रेड्डी का ये ₹70,000 वाला कस्टमाइज्ड मॉडल एक बड़ी मिसाल है. ये दिखाता है कि अगर स्थानीय स्तर पर सही और सुरक्षित तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए, तो बुजुर्गों की मोबिलिटी यानी चलने-फिरने की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. टैलेंट सिर्फ बड़े कालेजों की लैब्स में नहीं, बल्कि देश के गांवों की वर्कशॉप्स में भी बिखरा पड़ा है.

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