जमाना बदला, मगर दहेज का लालच नहीं. आए दिन दहेज हत्या की खबरें मिल जाती हैं. इन मामलों में अक्सर ऐसा होता है कि महिला अपने परिवार को दहेज उत्पीड़न की जानकारी देती है. लेकिन उसकी कोई सुनता नहीं. उसे ‘एडजस्ट’ करने के लिए कह दिया जाता है. अब दहेज से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माता-पिता को सलाह दे दी है. कहा कि शादीशुदा महिला की दहेज के लिए परेशान करने वाली शिकायतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
दहेज के लिए सताई जा रही बेटियों के मां-बाप को इलाहाबाद HC ने क्या नसीहत दे दी?
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच दहेज उत्पीड़न के एक पुराने केस की सुनवाई कर रही थी. साल 2011 में 25 वर्षीय मीना देवी और उनकी 15 महीने की बेटी की हत्या दहेज की एक अधूरी मांग के कारण कर दी गई थी.

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच दहेज उत्पीड़न के एक पुराने केस की सुनवाई कर रही थी. साल 2011 में 25 वर्षीय मीना देवी और उनकी 15 महीने की बेटी की हत्या दहेज की एक अधूरी मांग के कारण कर दी गई थी.
2016 में सुनाई गई थी सजाआरोप था कि शादी के समय पीड़िता के परिवार ने 2.26 लाख रुपये ससुराल वालों को दिए थे. लेकिन उन्होंने इसके ऊपर एक मोटरसाइकिल और 1 लाख रुपये और मांगे. मामले में महिला के पति, दो देवरों, सास और ससुर को दोषी पाया गया. 2016 में एक ट्रायल कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इसी फैसले को पलटने के लिए उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, 27 जुलाई को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गौर किया कि पीड़िता ने कई बार अपने परिवार को ससुराल वालों की लगातार मांगों और उत्पीड़न के बारे में बताया था. जिस पर बेंच ने कहा कि दहेज के लिए उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को समझौता करने और हालात के साथ तालमेल बिठाने की सलाह देने से दोषियों का हौसला बढ़ेगा.
कोर्ट ने घटाई उम्रकैद की सजाबेंच ने कहा,
“अक्सर दहेज से जुड़े उत्पीड़न की शिकार महिला को समझौता करने या शादी बचाने की सलाह दी जाती है. भले ही उसने अपने परिवार को उस पर हो रही क्रूरता के बारे में बार-बार बताया हो. कभी-कभी ऐसी सलाह अनजाने में दोषियों का हौसला बढ़ा सकती है, और पीड़िता को लगातार दुर्व्यवहार का शिकार बना सकती है. इसका नतीजा दुखद और कभी न सुधरने वाला हो सकता है. यहां तक कि पीड़िता की मौत भी हो सकती है.”
बेंच ने कहा कि बार-बार ऐसी शिकायतों को सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं माना जाना चाहिए. बेटी अपनी शिकायतों के बारे में बता रही है, तो उसे गंभीरता से सुना जाना चाहिए. इसके बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों के दोषी ठहराए जाने के फैसले को बरकरार रखा. लेकिन उम्रकैद की सजा को हटा दिया.
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बेंच ने दोषियों की सजा को घटाकर उतना कर दिया जितनी सजा वह पहले काट चुके थे. यह भी पाया कि उनका कोई पिछला क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था. कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट IPC की धारा 304-B के तहत अधिकतम सजा देने का कारण बताने में नाकाम रहा था.
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