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'मुस्लिम कानून का दुरुपयोग कर कई शादियां कर रहे पुरुष', इलाहाबाद HC ने ऐसा क्यों कहा?

Allahabad High Court ने कहा कि जंग के बाद जब बहुत सारी महिलाएं विधवा हो गईं और बच्चे अनाथ हो गए, तो उस वक्त बहुविवाह की इजाजत दी गई थी ताकि उन महिलाओं और बच्चों का ख्याल रखा जा सके. लेकिन आजकल इस नियम का गलत फायदा उठाया जा रहा है.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुस्लिम बहुविवाह पर अहम टिप्पणी की. (Allahabad High Court)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई है. कोर्ट का कहना है कि कुरान में बहुविवाह को शर्तों के साथ मंजूरी दी गई थी, लेकिन आजकल पुरुष इसका इस्तेमाल 'स्वार्थी उद्देश्यों' यानी मतलब पूरा करने के लिए कर रहे हैं. कोर्ट का मानना है कि ये मुस्लिम कानून के असल मकसद के खिलाफ है.

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार, 14 मई को जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने कहा कि इस्लाम के शुरुआती दौर में बहुविवाह को विधवाओं और अनाथों की मदद के लिए मंजूरी दी गई थी.

जस्टिस कुमार के मुताबिक, जंग के बाद जब बहुत सारी महिलाएं विधवा हो गईं और बच्चे अनाथ हो गए, तो उस वक्त बहुविवाह की इजाजत दी गई थी ताकि उन महिलाओं और बच्चों का ख्याल रखा जा सके. लेकिन आजकल इस नियम का गलत फायदा उठाया जा रहा है.

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कोर्ट ने कहा,

"कुरान द्वारा बहुविवाह की इजाजत दिए जाने के पीछे एक ऐतिहासिक कारण है. इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब अरबों में आदिम कबीलों के बीच होने वाले झगड़ों में बड़ी संख्या में महिलाएं विधवा हो गई थीं और बच्चे अनाथ हो गए थे. मदीना में नए-नवेले इस्लामी समुदाय की रक्षा करने में मुसलमानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. ऐसे हालात में ही कुरान ने अनाथ बच्चों और उनकी माताओं को शोषण से बचाने के लिए सशर्त बहुविवाह की इजाजत अनुमति दी थी."

इस मामले में कोर्ट ने सरला मुदगल और लिली थॉमस केस का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की जरूरत दोहराते हुए इसे लाने पर जोर दिया था.

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कोर्ट ने IPC की धारा 494 के तहत मुस्लिम पुरुषों के बहुविवाह की कानूनी स्थिति साफ की है. कोर्ट ने कुछ अहम बिंदु बताए हैं-

1. पहली शादी के तहत बहुविवाह की स्थिति: अगर कोई मुस्लिम पुरुष अपनी पहली शादी मोहम्मदी कानून के तहत करता है, तो उसकी दूसरी, तीसरी या चौथी शादी को वैध माना जाएगा और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 (जो Bigamy विवाह से संबंधित है) उस पर लागू नहीं होगी. हालांकि, अगर दूसरी शादी को परिवार अदालत ने अवैध (बातिल) घोषित किया है, तो फिर धारा 494 IPC लागू होगी.

2. अन्य विवाह अधिनियम: अगर कोई पुरुष विशेष विवाह अधिनियम, हिंदू विवाह अधिनियम, ईसाई, पारसी या विदेशी विवाह अधिनियम के तहत पहली शादी करता है और फिर इस्लाम धर्म अपनाकर दूसरी शादी करता है, तो वह शादी अवैध मानी जाएगी और धारा 494 IPC लागू होगी.

3. परिवार अदालत की अधिकारिता: कोर्ट ने यह भी साफ किया कि परिवार अदालत के पास मुस्लिम विवाहों की वैधता को तय करने का अधिकार है, जो कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार किए गए होते हैं.

आखिर में कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पुरुषों को दूसरी शादी करने का पूरा अधिकार नहीं है, जब तक कि वे अपनी सभी पत्नियों के साथ बराबरी का व्यवहार करने के काबिल ना हों, जैसा कि कुरान में कहा गया है.

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