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यूपी पुलिस का SI शख्स को जबरन उठाकर ले गया, अब सैलरी से मुआवजा देना पड़ सकता है

UP illegal detention compensation: इलाहबाद हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को 25 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है. आरोप है कि शख्स को एक पुलिस अधिकारी ने गैर-कानूनी तरीके से 24 घंटे तक हिरासत में रखा था. कोर्ट ने माना कि अधिकारी ने याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत आजादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया था.

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आरोप है कि पुलिस अधिकारी याचिकाकर्ता को घर से लूंगी और कुर्ता में उठा ले गया था. (फोटो-Pexels)

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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने यूपी सरकार को 2022 में गैर कानूनी हिरासत में रखे गए याचिकाकर्ता को 25 हजार रुपये मुआवजे के साथ 10 हजार रुपये कानूनी खर्च देने का आदेश दिया।
  • यह मामला उस समय उत्पन्न हुआ जब प्रयागराज के मतांबर मिश्रा को पुलिस अधिकारी सूर्य प्रकाश दुबे ने घरेलू हिंसा की शिकायत से जुड़ी विवाद में बिना किसी न्यायालय के वारंट के 24 घंटे गैर कानूनी हिरासत में रखा गया था और छोड़ने के लिए कथित रिश्वत मांगी गई।
  • कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अवैध हिरासत के लिए मुआवजा देने का आदेश देते हुए कहा कि सरकार आरोपी पुलिस अधिकारी से मुआवजा वसूल सकती है और इस संबंध में विभागीय जांच कर सजा या राहत निर्धारित की जाएगी।

2022 में एक व्यक्ति को पुलिस अधिकारी ने गैर कानूनी तरीके से 24 घंटे हिरासत में रखा था. और उसे छोड़ने के लिए कथित तौर पर 20 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी. जिसके बाद ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा. अब केस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने यूपी सरकार को याचिकाकर्ता को 25 हजार रुपये देने का आदेश दिया है.

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बेंच ने सुनवाई करते हुए टिप्पणी की,

पुलिस अधिकारी लगातार नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, यह सोचकर कि उनके गलत कामों पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा.

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Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला 26 नवंबर, 2022 का है. प्रयागराज के रहने वाले मतांबर मिश्रा के भाई की पत्नी ने घरेलू हिंसा की शिकायत पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई थी. उसी मामले में सब-इंस्पेक्टर सूर्य प्रकाश दुबे (उस समय पुलिस चौकी के प्रभारी थे) याचिकाकर्ता को घर से उठा ले गए थे. बताया गया कि जब ये घटना हुई तब मतांबर मिश्रा सिर्फ लुंगी और कुर्ता में थे. हंडिया पुलिस स्टेशन में अधिकारी ने उन्हें लगभग 24 घंटे हिरासत में रखा. आरोप है कि SI सूर्य प्रकाश दुबे ने उन्हें छोड़ने के लिए कथित तौर पर 20 हजार रुपये की रिश्वत मांगी.

मगर बहू द्वारा दर्ज शिकायत में कोई कॉग्निजेबल ऑफेंस दर्ज नहीं किया गया था. कॉग्निजेबल ऑफेंस यानी वे गंभीर जुर्म, जिनमें पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकता है.

Live Law ने अपनी खबर में बताया कि अधिकारी ने गैर-कानूनी हिरासत को छिपाने के लिए पीड़ित को कस्टडी से रिहा करने के दो दिन बाद CrPC की धारा 107 और 116 के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी. ये कार्रवाई असल में सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए होती हैं. और घरेलू हिंसा के निजी मामले में इनका इस्तेमाल कभी नहीं किया जा सकता.

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याचिकाकर्ता के बेटे ने इस घटना की शिकायत यूपी के मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक और प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर से की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया और मांग की कि मामले की जांच किसी अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से कराई जाए.

अधिकारी का तर्क अदालत को रास नहीं आया

29 मई को केस पर सुनवाई के दौरान बेंच ने माना कि याचिकाकर्ता को जबरदस्ती पुलिस स्टेशन ले जाया गया और लॉकअप में रखा गया. जिस पर एसआई दुबे ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि याचिकाकर्ता खुद विवाद को सुलझाने के लिए पुलिस चौकी आए थे. मगर कोर्ट को ये बात ज्यादा रास नहीं आई. बेंच ने कहा,

“SI दुबे आखिर कोई आध्यात्मिक गुरु, पंच परमेश्वर या समुदाय के नेता नहीं थे, जिसके पास याचिकाकर्ता और उसका रिश्तेदार अपनी मर्जी से जाकर अपना झगड़ा सुलझाने या सलाह लेने के लिए जाते.”

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने कहा पुलिस अधिकारी के आचरण की विभागीय जांच करना असल में सरकार या पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का प्रशासनिक काम है. उन्हें राहत मिल सकती है या फिर सजा. लेकिन इससे उनकी हरकत की भरपाई नहीं होगी.

सरकार आरोपी अधिकारी से वसूल सकती है राशि

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में मुआवजा नहीं मांगा था. फिर भी अदालत ने राज्य सरकार को 2021 की नीति (जिसमें पुलिस की तरफ से की गई गैर-कानूनी हिरासत के लिए 25 हजार रुपये का मुआवजा देने का नियम है) के तहत आदेश दिया है कि वे अवैध कस्टडी के लिए याचिकाकर्ता को 25 हजार रुपये मुआवजा 30 दिनों के अंदर दे. साथ ही 10 हजार रुपये का कानूनी खर्च भी दें. 

कोर्ट ने कहा कि सरकार पहले ये राशि याचिकाकर्ता को दें. बाद में वे आरोपी अधिकारी से वसूल सकती है, जिसमें वेतन से कटौती भी शामिल है.

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