क्या माता-पिता अपनी बालिग बेटी को साथ रहने के लिए मजबूर कर सकते हैं? इलाहाबाद हाई कोर्ट में ऐसी ही एक याचिका पहुंची थी. महिला का कहना था कि बेटी उनके साथ रहे. लेकिन बेटी अपने घर वापस आकर नहीं रहना चाहती थी. इस मामले में कोर्ट ने भी साफ किया कि आप किसी की इच्छा के बिना उसे अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.
बेटी को साथ रखने के लिए मां HC पहुंची, जज ने साफ कहा- 'बालिग है, मजबूर नहीं कर सकते'
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक 'हेबियस कॉर्पस' याचिका को खारिज कर दिया. उन्होंने ये भी कहा कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उनकी मर्जी के खिलाफ अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

कलावती देवी नाम की महिला ने हाई कोर्ट में 'हेबियस कॉर्पस' याचिका दायर की थी. उनका कहना था कि उनकी 25 वर्षीय बेटी कुमारी पूजा को हाई कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया जाए. लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया.
याचिका खारिज करते हुए जज ने क्या कहा?हेबियस कॉर्पस एक कानूनी रिट है. इसके तहत अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करने का आदेश दिया जाता है. मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने की.
सुनवाई के दौरान जज ने साफ कर दिया कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को अपने साथ रहने के लिए 'हेबियस कॉर्पस' याचिका का इस्तेमाल नहीं कर सकते. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 सितंबर को जस्टिस संदीप जैन ने कहा,
“किसी बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ किसी व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. सिर्फ इसलिए कि वह व्यक्ति उसका माता-पिता है.”
17 अगस्त 2026 को कोर्ट ने राज्य को पूजा को उनके सामने पेश करने का निर्देश दिया था. इसके बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया. जज के सामने कलावती की बेटी ने कहा कि वह दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही है. किसी भी व्यक्ति की गैर-कानूनी हिरासत या कैद में नहीं है.
पूजा ने साफ कहा कि वह अपनी मां के साथ नहीं रहना चाहती. उसने आरोप लगाया कि उसकी मां का व्यवहार उसे लेकर अच्छा नहीं था. घर में उसके साथ मारपीट भी होती थी. मगर मां ने इन आरोपों से इनकार किया और इच्छा जताई कि उसकी बेटी उसके साथ आकर रहे.
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हाई कोर्ट ने पाया कि जो बालिग और सक्षम व्यक्ति है, वह अपनी पसंद की जगह पर और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने के लिए आजाद है. इसके बाद कोर्ट ने मां कलावती को साफ कहा कि ‘हेबियस कॉर्पस’ की कार्यवाही का मकसद गैर-कानूनी या अवैध हिरासत से आजादी दिलाना होता है.
लेकिन इसका इस्तेमाल बालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ किसी के साथ रहने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं किया जा सकता. इसके बाद कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी. क्योंकि 'हेबियस कॉर्पस' याचिका को बनाए रखने का कोई जरूरी आधार मौजूद नहीं था.
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