इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज हैं पंकज भाटिया. बीते तीन महीनों में उन्होंने दहेज हत्या से जुड़े 510 मामलों की सुनवाई की. इनमें से 99 प्रतिशत से भी ज्यादा यानी तकरीबन हर मामले में उन्होंने आरोपियों को जमानत दी है.
दहेज हत्या के आरोपियों को राहत देने वाले जज का रिकॉर्ड, '510 में से 508 केस में बेल'
तीन महीने में दहेज हत्या के जिन 508 मामलों में जस्टिस भाटिया ने बेल ग्रांट की है, उन सभी मामलों में शादी की औसत अवधि साढ़े 3 से चार साल की थी.
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इंडियन एक्सप्रेस के लिए अमाल शेख ने कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से मौजूद जज के फैसलों की पड़ताल की है. इसके मुताबिक, जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच दहेज हत्या के 510 में से ‘508’ मामलों में आरोपियों को जमानत दी है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मौतों की वजहें अलग-अलग हैं लेकिन जज के आदेश की भाषा, जमानत की वजह, मुचलके की राशि तकरीबन सारे मामलों में एक जैसी हैं.
जस्टिस पंकज भाटिया वही जज हैं, जिनके एक फैसले पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था. ये भी जमानत का ही मामला था. श्रावस्ती की 28 साल की एक महिला की शादी के दो महीने से भी कम समय में मौत हो गई थी. शव उसके ससुराल के घर के बरामदे में मिला था. महिला के पिता ने बताया कि शादी के वक्त उन्होंने साढ़े 3 लाख रुपये नकद दहेज दिया था. बाद में लड़के वालों ने कार मांगी थी. आरोप है कि मांग पूरी नहीं हुई तो महिला की हत्या कर दी गई. इस केस में सेशन कोर्ट ने आरोपियों को जमानत नहीं दी, लेकिन जस्टिस पंकज भाटिया के कोर्ट ने बेल ग्रांट कर दी.
सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘हैरानी भरा फैसला’ बताया था और उनके आदेश को पलट दिया था. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा था कि हाई कोर्ट का ये फैसला बेहद चौंकाने वाला है. ये समझ से बाहर की बात है कि इतने गंभीर अपराध में जमानत देने का फैसला किस आधार पर लिया गया. जस्टिस भाटिया सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से आहत भी हुए थे और बेल रोस्टर में उन्हें शामिल न करने की रिक्वेस्ट चीफ जस्टिस से कर दी थी.
हालांकि, जमानत देने के मामले में जस्टिस पंकज भाटिया काफी ‘फास्ट’ लगते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2025 से दिसंबर 2025 के बीच तीन महीने में दहेज हत्या के जिन 508 मामलों में जस्टिस भाटिया ने बेल ग्रांट की है, उन सभी मामलों में शादी की औसत अवधि साढ़े 3 से चार साल की थी. यानी दहेज हत्या के लिए एकदम मजबूत केस. भारत का कानून कहता है कि अगर शादी के 7 साल के अंदर महिला की असामान्य मृत्यु होती है और दहेज उत्पीड़न के सबूत हों तो अदालत यह मानती है कि उसकी मौत में ससुराल वालों की भूमिका हो सकती है. आरोपियों को इसे कोर्ट में गलत साबित करना होता है.
जस्टिस पंकज भाटिया के सामने लाए गए 510 में से 362 केस में पति, 68 में सास, 63 में ससुर और बाकी में अन्य रिश्तेदार आरोपी बनाए गए थे. 6 ऐसे मामले थे, जिनमें पीड़िताएं प्रेग्नेंट थीं. 340 मामलों में पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट बताती है कि महिला की मौत फांसी लगने से हुई थी. 27 केस जहर से मौत के थे. 16 में गला घोटा गया था. 11 में जलाया गया था. 7-7 मामले सिर में गहरी चोट और गला दबाने के थे. 4 मामलों में महिला की मौत डूबने से हुई थी. इन सभी मामलों में आरोपियों को जस्टिस भाटिया ने जमानत दी थी.
आरोपियों का आपराधिक इतिहास?
अमाल शेख की रिपोर्ट बताती है कि 510 केसों में सिर्फ 10 मामलों को छोड़कर तकरीबन सभी के आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था. इनमें 356 आरोपी एक साल से कम समय जेल में रहे थे. इनमें भी 5 आरोपी एक महीने से भी कम, 104 एक से तीन महीने तक, 142 तीन से छह महीने तक और 105 आरोपी छह से 12 महीने तक जेल में थे.
52 मामलों के आरोपी 1 से 2 साल तक जेल में रहे और करीब 31 मामलों के आरोपी 2 साल से ज्यादा समय तक हवालात में रहे. इन सब में जो सबसे लंबी हिरासत थी वो 8 साल की थी. इस केस में एक महिला के कुएं में गिरकर मरने की बात कही गई थी. बचे 71 मामलों में हिरासत के समय के बारे में जानकारी दर्ज नहीं थी.
जस्टिस भाटिया के दिए फैसले से जुड़ी ये सारी जानकारियां अदालत की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं.
तकरीबन जमानत के सभी आदेशों में भाषा एक जैसी है. जमानत देते समय अक्सर पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट, हिरासत का समय, आरोपियों का कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड न होने का हवाला दिया गया था. एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, तकरीबन आधे मामलों में कहा गया कि मौत से पहले हैरसमेंट का कोई सबूत नहीं है. आदेश भी एक जैसा ही लिखा गया था. वकीलों की बात, रिकॉर्ड देखने की डिटेल, एफआईआर, धाराएं, हिरासत की अवधि, पीएम रिपोर्ट और अंत में जमानत देने का कारण. अधिकतर केस में आदेश लिखने का यही प्रसीजर फॉलो किया गया है.
बेल ग्रांट करते हुए हर बार यही कहा गया कि ‘आरोपी के खिलाफ कुछ खास’ नहीं है. तकरीबन सभी मामलों में 20 हजार के निजी मुचलके और दो जमानतदारों पर रिहाई दे दी गई. शर्तें भी एक सी थीं कि आरोपी में कोर्ट में उपस्थित होता रहेगा और गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा.
अब अंतिम बात. तीन महीने में 510 में सिर्फ 2 मामलों में ही जस्टिस पंकज भाटिया ने जमानत खारिज की थी. पहला मामला ऐसा था, जिसमें महिला को जलाया गया था. वह तकरीबन 90 फीसदी जल गई थी. कोर्ट ने माना था कि अपराध गंभीर है. घटना वाले दिन पीड़िता ने अपने पिता को बताया था कि उसका उत्पीड़न हो रहा है और धमकी दी जा रही है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शव पर जलने के निशान और केरोसिन की गंध पाई गई थी. कोर्ट ने माना कि अपराध जिस तरीके से अंजाम दिया गया है, उसे देखते हुए जमानत का कोई ठोस आधार नहीं बनता.
दूसरे मामले में पति पर महिला को गोली मारने का आरोप था. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से ये बात साबित हो रही थी. इसलिए कोर्ट ने बेल की अर्जी खारिज कर दी.
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