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पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई छह साल राज्यसभा में बैठे, एक भी सवाल ना पूछा, कार्यकाल खत्म

CJI Ranjan Gogoi: साल 2020 में चीफ जस्टिस के पद से हटने के चार महीने बाद ही उन्हें राज्यसभा के सदस्य के लिए नॉमिनेट किया गया था. तब इस नामांकन की आलोचना भी हुई थी.

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भारत के पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया रंजन गोगोई. (फोटो-आजतक)

पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई की राज्यसभा सदस्यता सोमवार, 16 मार्च को खत्म हो गई. जिसके बाद सदन ने उन्हें विदाई दी. विदाई देते वक़्त राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उनकी कानूनी समझ की सराहना की. हालांकि इसके बाद से ही वे चर्चा में आ गए. चर्चा की वजह है इस कार्यकाल के दौरान उनका सदन में योगदान. 

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दरअसल, साल 2020 में उन्हें राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के तौर पर चुना गया था. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़, चीफ जस्टिस के पद से हटने के चार महीने बाद ही उन्हें राज्यसभा के सदस्य के लिए नॉमिनेट किया गया था. इस नामांकन की आलोचना भी हुई. आरोप लगा कि ये नामांकन सरकार के पक्ष में फैसले सुनाने का नतीजा है.

उस समय बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने रंजन गोगोई का पक्ष लिया. उनके बारे में लिखा कि वे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच पुल का काम करेंगे. बता दें कि साल 2018 में उन्हें चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया था. 

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राज्यसभा में क्या कर गए चीफ जस्टिस? 

पीआरएस से मिली जानकारी के मुताबिक़ सदन में उनकी उपस्थिति केवल 53 फीसदी ही रही. अपने 6 साल के कार्यकाल में उन्होंने केवल एक बहस में भाग लिया और कभी कोई सवाल नहीं पूछा.  

राज्यसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि उन्होंने अगस्त 2023 में दिल्ली सेवा विधेयक से जुड़ी बहस में भाग लिया. इस विधेयक का उद्देश्य सेवाओं पर दिल्ली सरकार के कंट्रोल को कम करना था. उन्होंने इसका समर्थन किया था.

दिसंबर 2021 में एनडीटीवी से जुड़े श्रीनिवासन जैन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 

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‘मैं राज्यसभा तभी जाता हूं जब मेरा मन करता है, जब मुझे लगता है कि कोई महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर मुझे बोलना चाहिए. मैं अपनी मर्जी से जाता हूं और अपनी मर्जी से वापस आता हूं. मैं किसी पार्टी के व्हिप से बंधा हुआ नहीं हूं’

हालांकि इस कार्यकाल के दौरान संसद ने कृषि कानूनों, नए आपराधिक कानूनों, न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, वक्फ संशोधन अधिनियम और महिलाओं के आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक जैसे विभिन्न ज़रूरी कानूनों पर चर्चा की. लेकिन पूर्व CJI का इनमें कोई योगदान नहीं रहा. इस दौरान उन्होंने एक भी सवाल नहीं पूछा और न ही खुद से कोई विधेयक पेश किया.

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