राजनीति की दुनिया में कब कौन सा दांव चल दिया जाए और कानून की किस loophole का फायदा उठा लिया जाए, ये बात कभी-कभी बड़े-बड़े दिग्गजों को भी हैरान कर देती है. हाल ही में बिहार की सियासत से एक ऐसा ही दिलचस्प और गंभीर मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंच चुका है. कोर्ट ने नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी की सरकारों के कार्यकाल के दौरान बिना विधायक या विधान पार्षद बने मंत्री पद पर काबिज रहे दीपक प्रकाश के मामले में तीखा रुख अपनाया है.
चुनाव जीते बिना मंत्री पद पर बने रहने का विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से मांगा जवाब
Supreme Court to Bihar Government: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा है कि बिना चुनाव जीते दीपक प्रकाश 6 महीने से अधिक समय तक मंत्री कैसे बने रह सकते हैं. जानिए क्या है पूरा कानूनी विवाद और अनुच्छेद 164(4) का पेंच.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक सीजेआई (CJI) ने साफ शब्दों में कहा है कि ये विशुद्ध रूप से कानून का सवाल है और राज्य सरकार को ये समझाना ही होगा कि आखिर कोई व्यक्ति छह महीने की संवैधानिक समयसीमा बीत जाने के बाद भी बिना चुने मंत्री कैसे बना रह सकता है.
क्या है पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?
ये पूरा कानूनी विवाद बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री रहे दीपक प्रकाश की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को लेकर खड़ा हुआ है. नियमों के मुताबिक कोई भी ऐसा व्यक्ति जो राज्य के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, वो अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है. इस तय अवधि के भीतर उसे या तो विधानसभा का चुनाव जीतना होता है या फिर विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ता है. अगर वो ऐसा नहीं कर पाता है, तो उसे मंत्री पद छोड़ना ही पड़ता है. लेकिन दीपक प्रकाश के मामले में जो खेल खेला गया, उसने कानूनविदों को भी चौंका दिया है.
दीपक प्रकाश ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में पहली बार पंचायती राज मंत्री के तौर पर चार महीने और 26 दिन काम किया. इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना इस्तीफा दे दिया, जिसके चलते दीपक प्रकाश का वो कार्यकाल स्वतः समाप्त हो गया. इसके अगले 22 दिनों तक वो किसी भी ministerial पद पर नहीं रहे. इसके बाद 7 मई को जब सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ, तो दीपक प्रकाश को एक बार फिर से मंत्री पद की शपथ दिला दी गई, जबकि इस बीच उन्होंने कोई चुनाव नहीं जीता था.
संविधान का अनुच्छेद 164(4) क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) स्पष्ट रूप से ये प्रावधान करता है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त कोई भी मंत्री यदि लगातार छह महीने की किसी भी अवधि के लिए राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं रहता है, तो उस अवधि के समाप्त होने पर वो मंत्री नहीं रहेगा. इस नियम का मूल उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोग जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह रहें और जनता की अदालत से मुहर लगवाकर आएं.
आम तौर पर इस प्रावधान का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई बाहरी व्यक्ति या विशेषज्ञ मंत्री बन जाता है. इसके बाद पारंपरिक रूप से किसी सुरक्षित सीट पर बैठे मौजूदा विधायक से इस्तीफा दिलवाकर वहां उपचुनाव कराया जाता है और मंत्री महोदय चुनाव जीतकर सदन में पहुंच जाते हैं. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत जैसे नेता भी इसी तरह विधान परिषद या विधानसभा के रास्ते अपनी कुर्सी बचा चुके हैं.
बिहार का केस क्यों है सबसे अलग और उलझा हुआ?
यहां पर पेंच ये फंसता है कि दीपक प्रकाश ने एक ही लगातार कार्यकाल में छह महीने पूरे नहीं किए हैं. पहले कार्यकाल में उन्होंने नीतीश सरकार के तहत चार महीने 26 दिन काम किया और इस्तीफा दे दिया. इसके बाद 22 दिन के गैप के बाद सम्राट चौधरी की नई सरकार में उन्हें दोबारा मंत्री बना दिया गया. अब दोनों कार्यकालों को अगर जोड़ लिया जाए, तो वो बिना चुनाव जीते छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री पद की कुर्सी पर काबिज रह चुके हैं.
इसी बात को लेकर 30 मई को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें उनकी इस नियुक्ति को असंवैधानिक और 'संविधान के साथ धोखा' (fraud upon the Constitution) करार दिया गया है. ‘लाइव लॉ’ के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेंच ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है और साफ किया है कि राज्य सरकार को इसका ठोस कानूनी जवाब देना होगा. अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त के लिए तय की है.
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से तय होगी आगे की राजनीति
इस पूरे प्रकरण ने देश की राजनीति और कानूनी गलियारों में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है. बड़ा सवाल ये है कि क्या कोई व्यक्ति बीच में कुछ दिनों का गैप देकर या सरकार बदलकर छह महीने की समयसीमा को रीसेट (reset) करवा सकता है? क्या इस तरह के लूपहोल का इस्तेमाल करके कोई अनइलेक्टेड मंत्री अनिश्चित काल तक सत्ता का सुख भोग सकता है? सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला इस ग्रे एरिया (grey area) को हमेशा के लिए स्पष्ट करेगा और तय करेगा कि संवैधानिक नैतिकता से खिलवाड़ करने वाले ऐसे तौर-तरीकों पर लगाम कैसे लगेगी.
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