‘इस साल गर्मी ज़्यादा पड़ेगी.’ ये बात हम हर साल सुनते हैं. लेकिन इस बार सच में बहुत गर्मी पड़ रही है. अभी तो जून आया भी नहीं है कि कमरे आग की भट्टी बन गए हैं. दिन में एसी काम नहीं कर रहे. कूलर गर्म हवा फेंक रहे हैं. कई राज्यों में हीटवेव अलर्ट आने शुरू हो गए हैं. हीटवेव यानी लू चलना. भारत मौसम विज्ञान विभाग, कहीं रेड तो कहीं ऑरेंज अलर्ट जारी कर रहा है.
लू लगने पर शरीर में क्या होता है? लक्षण खतरनाक हैं, ये 5 तरीके बचा लेंगे
डॉक्टर से समझेंगे कि हीटवेव के दौरान शरीर में क्या होता है. किन लोगों को हीटवेव से सबसे ज़्यादा ख़तरा है. हीटस्ट्रोक यानी लू लगने के शुरुआती लक्षण क्या हैं. लू लगने और सामान्य थकान में फ़र्क कैसे करें. और हीटवेव से कैसे बचें.


कई राज्यों में तापमान 45-47 डिग्री पार कर गया है. झुलसाने वाली गर्मी पड़ रही है. ऐसे में खुद को गर्म हवाओं, लू से बचाना बहुत ज़रूरी है. वरना हीटस्ट्रोक पड़ सकता है. यानी लू लग सकती है. कई मामलों में ये जानलेवा भी साबित हुई है.
Temperature नाम के जर्नल में छपी एक स्टडी के मुताबिक, 2001 से 2019 के बीच देश में 19 हज़ार 693 मौतें लू लगने से हुईं. सबसे ज़्यादा जानें आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पंजाब में गईं. पर कैसे पता चलेगा कि किसी को लू लग गई है. यही जानेंगे आज.
डॉक्टर से समझेंगे कि हीटवेव के दौरान शरीर में क्या होता है. किन लोगों को हीटवेव से सबसे ज़्यादा ख़तरा है. हीटस्ट्रोक यानी लू लगने के शुरुआती लक्षण क्या हैं. लू लगने और सामान्य थकान में फ़र्क कैसे करें. और हीटवेव से कैसे बचें.
हीटवेव के दौरान शरीर में क्या होता है?
ये हमें बताया डॉक्टर अजय कुमार गुप्ता ने.

हीटवेव तब मानी जाती है, जब बाहर का तापमान 40 डिग्री या उससे ज़्यादा हो जाता है. इसे आम भाषा में 'लू चलना' कहते हैं. जब शरीर लंबे समय तक ज़्यादा गर्मी के संपर्क में रहता है. तब दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस ग्रंथि शरीर का तापमान नियंत्रित करने की कोशिश करता है. लेकिन ज़्यादा गर्मी में ये सिस्टम ठीक से काम नहीं कर पाता. ऐसे में शरीर का तापमान लगातार बढ़ने लगता है. कई बार शरीर का तापमान 105-106 डिग्री तक पहुंच सकता है. इसके बाद शरीर में गंभीर दिक्कतें और नुकसान शुरू होने लगते हैं.
हीटस्ट्रोक यानी लू लगने के शुरुआती लक्षण
लू लगने पर शुरुआत में सिरदर्द होता है. चक्कर आने लगते हैं. घबराहट और बेचैनी महसूस होती है. व्यक्ति चिड़चिड़ा और जल्दी परेशान होने लगता है. हर चीज़ से खीझने लगता है. बहुत ज़्यादा पसीना आने लगता है. ये सभी हीटस्ट्रोक के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं.
अगर गर्मी का असर लगातार बढ़ता रहे और शरीर उसे सहन न कर पाए. तब शरीर का तापमान और तेज़ी से बढ़ने लगता है. इसका असर मांसपेशियों, दिमाग और ज़रूरी केमिकल रिएक्शन्स पर पड़ता है. घबराहट के साथ-साथ उल्टियां होने लगती हैं. कुछ लोगों को दस्त लग सकते हैं. कभी-कभार बेहोशी होने लगती है. कुछ मामलों में दौरे भी पड़ सकते हैं. हीटस्ट्रोक बढ़ने पर दिमाग को स्थायी नुकसान पहुंचने का भी ख़तरा रहता है.

हीट स्ट्रोक और सामान्य थकान में फ़र्क कैसे करें?
सामान्य थकान व्यक्ति को हमेशा रहती है. हर थकान को न तो पूरी तरह सामान्य थकान कहा जा सकता है, न ही हीट स्ट्रोक. अगर तेज़ लू या धूप में ज़्यादा देर रहने के बाद अचानक समस्या शुरू हो रही है. तब ऐसे में हीट स्ट्रोक या हीट एग्ज़ॉशन की संभावना ज़्यादा होती है. सामान्य थकान रोज़मर्रा के काम करते हुए भी होगी. जैसे जिन मरीज़ों में खून की कमी या दिल की बीमारी होती है. उन्हें ज़्यादा काम करने पर जो थकान होती है, वही हीट एग्ज़ॉशन में भी होती है.
किन लोगों को हीटवेव से सबसे ज़्यादा ख़तरा?
हीटवेव का सबसे ज़्यादा ख़तरा छोटे बच्चों और 65 साल से ऊपर के बुज़ुर्गों को होता है. ऐसे लोग जिनको किडनी, दिल या लिवर की पुरानी बीमारी है, उन्हें भी रिस्क रहता है. इन लोगों को बहुत गर्मी में घर से बाहर निकलने की सलाह नहीं दी जाती. अगर बाहर जाना ज़रूरी हो, तो कोशिश करें कि छांव में चलें. शरीर को थकाने वाले काम या मेहनत से बचाना चाहिए.
हीटवेव यानी लू से कैसे बचें?
बहुत ज़रूरी न हो, तो सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे के बीच घर से बाहर न निकलें. अगर बाहर जाना ज़रूरी हो, तो शरीर को पूरी तरह ढककर निकलें. हमेशा हल्के और हवादार कपड़े पहनें, जैसे कॉटन या लिनन. ढीले कपड़े पहनें ताकि हवा शरीर के अंदर तक पहुंच सके. सिंथेटिक और नायलॉन जैसे कपड़ों से बचें. बाहर जाते समय टोपी या छतरी का इस्तेमाल करें.
शरीर को हमेशा हाइड्रेटेड रखें. हाइड्रेटेड का मतलब है- बार-बार पानी पीते रहना. ORS, नींबू-पानी या दूसरे आसानी से पचने वाले तरल पदार्थ लेते रहें. हर घंटे एक से डेढ़ गिलास पानी, ORS या नींबू-पानी लेना ठीक रहता है.
बहुत ज़्यादा गर्मी हो, तो गीले कपड़े से शरीर को पोछें. अपने साथ टोपी और छाता ज़रूर रखें. अगर छांव मिले तो वहां बैठें. एक बार में बहुत ज़्यादा मेहनत न करें. धूप में एक्सरसाइज़ बिल्कुल न करें. अगर बाहर लंबे समय तक रहना पड़े, तो बीच-बीच में आराम ज़रूर करें. समय-समय पर छांव या ठंडी जगह पर जाते रहें. पेड़ की छांव या ठंडा कमरा बेहतर विकल्प होते हैं.
अगर तापमान लगभग 40 डिग्री के आसपास है तो पंखा पर्याप्त हो सकता है. लेकिन अगर तापमान इससे ज़्यादा है तो AC या कूलर इस्तेमाल करना बेहतर है. पंखे में भी रहें तो शरीर को हल्का-हल्का गीला करते रहें.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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