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पीनस की ऊपरी स्किन टाइट है या पीछे नहीं खिंचती तो क्या करें?

पुरुषों के प्राइवेट पार्ट से जुड़ी एक कंडीशन है- फाइमोसिस. इसमें पीनस के टिप की ऊपरी स्किन पीछे नहीं खिंचती. वो बहुत टाइट हो जाती है.

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फाइमोसिस को ठीक किया जा सकता है (फोटो: Adobe Stock)

सीने में दर्द हो. पेट दर्द हो. पीठ दर्द हो या पैर में कोई दिक्कत हो जाए. व्यक्ति तुरंत डॉक्टर के पास जाता है. टेस्ट करवाता है और इलाज शुरू कर देता है. लेकिन अगर दिक्कत उसके प्राइवेट पार्ट से जुड़ी हो, तो झिझक के चलते वो किसी को नहीं बताता. शर्म के मारे डॉक्टर के पास नहीं जाता. बस चुपचाप दर्द सहता रहता है. जब तक कि दिक्कत हद से ज़्यादा नहीं बढ़ जाती.

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पुरुषों में होने वाली ऐसी ही एक दिक्कत है- फाइमोसिस. इसमें पीनस के टिप की ऊपरी स्किन पीछे नहीं खिंचती. वो बहुत टाइट हो जाती है. छोटे बच्चों में फाइमोसिस होना नॉर्मल है. उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जब यही फाइमोसिस एडल्ट्स में होता है, तो बड़ी दिक्कतें करता है. आज हम फाइमोसिस पर खुलकर बात करेंगे. डॉक्टर से जानेंगे कि फाइमोसिस क्या है. ये क्यों होता है. फाइमोसिस होने पर कौन-से लक्षण दिखते हैं. इसका इलाज क्या है. और फाइमोसिस से बचाव कैसे कर सकते हैं. 

फाइमोसिस क्या होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर आरिफ अख्तर ने. 

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डॉ. आरिफ अख्तर, सीनियर कंसल्टेंट, यूरोलॉजी एंड रीनल ट्रांसप्लांट, मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स, गुरुग्राम

फाइमोसिस वो कंडीशन है, जिसमें पेनाइल फोरस्किन यानी पीनस के ऊपरी हिस्से को ढकने वाली स्किन पीछे नहीं खींची जा सकती. फाइमोसिस दो प्रकार का होता है. पहला है फिजियोलॉजिकल फाइमोसिस. ये छोटे बच्चों में एक सामान्य स्थिति होती है. जन्म के समय फोरस्किन (लिंग की आगे की स्किन) और ग्लांस (लिंग का आगे वाला गोल हिस्सा) आपस में चिपके होते हैं. उम्र बढ़ने के साथ ये चिपकाव धीरे-धीरे अपने आप खत्म हो जाता है. ज़्यादातर बच्चों में किशोरावस्था तक स्किन आसानी से पीछे खिंचने लगती है. 

दूसरा है पैथोलॉजिकल फाइमोसिस. इसमें फोरस्किन (लिंग की आगे की स्किन) में सख्ती आ जाती है. इससे स्किन को पीछे खींचना मुश्किल या असंभव हो जाता है. ऐसा होने पर इंफेक्शन, दर्द या सेक्स करने में परेशानी हो सकती है. डॉक्टरों को आमतौर पर इसी प्रकार का फाइमोसिस ज्यादा देखने को मिलता है.

फाइमोसिस होने के क्या कारण हैं?

फाइमोसिस होने के कई कारण हो सकते हैं. सबसे आम कारण बार-बार बैलेनाइटिस या बालनोपोस्टहाइटिस होना है. बैलेनाइटिस यानी लिंग के आगे वाले हिस्से का इंफेक्शन और बालनोपोस्टहाइटिस यानी लिंग के आगे वाले हिस्से और उसकी स्किन का इंफेक्शन. 

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दूसरा मुख्य कारण डायबिटीज़ होता है. ब्लड शुगर ज़्यादा होने से स्किन में इंफेक्शन और लंबे समय तक सूजन बनी रहती है. इससे लिंग की आगे की स्किन सख्त हो सकती है. 

तीसरा मुख्य कारण प्राइवेट पार्ट की ठीक से साफ-सफाई न रखना है. लिंग की आगे की स्किन के नीचे स्मेग्मा नाम का सफेद पदार्थ जमा हो जाता है. अगर इसे रेगुलरली साफ न किया जाए, तो वहां बैक्टीरिया और फंगस के पनपने का चांस बढ़ जाता है. 

कुछ मामलों में स्किन की बीमारियां, जैसे लाइकेन स्क्लेरोसस, भी फोरस्किन को सख्त बना सकती हैं. हमारे समाज में सेक्शुअल हेल्थ को लेकर खुलकर बात नहीं होती. इसलिए कई पुरुष अपनी समस्या किसी से साझा नहीं कर पाते और डॉक्टर के पास जाने में देर कर देते हैं.

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प्राइवेट पार्ट से जुड़ी कोई भी दिक्कत संकोच के चलते नज़रअंदाज़ न करें 

फाइमोसिस के क्या लक्षण हैं?

- सबसे सामान्य लक्षण लिंग की आगे की स्किन का पीछे न जाना.

- पेशाब करते समय फोरस्किन का गुब्बारे की तरह फूलना.

- बार-बार इंफेक्शन होना.

- इरेक्शन के समय स्किन में कसाव या दर्द महसूस होना.

- अक्सर पुरुषों में ये सेक्शुअल लाइफ और मेंटल हेल्थ पर भी असर डालती है.

- पुरुषों को सेक्स के दौरान दर्द या असहजता महसूस होती है.

- प्रीमेच्योर इजैकुलेशन यानी शीघ्रपतन हो सकता है.

- कुछ पुरुषों के सेक्शुअल कॉन्फिडेंस में कमी आ सकती है.

- इससे एंग्ज़ायटी, डिप्रेशन या स्ट्रेस हो सकता है.

- कई बार मरीज़ों को ये समस्या शारीरिक से ज़्यादा मानसिक तनाव देने लगती है.

फाइमोसिस का इलाज और बचाव

शुरुआत में डॉक्टर अक्सर स्टेरॉयड क्रीम देते हैं. इससे फोरस्किन लचीली हो जाती है और स्किन को पीछे खींचना आसान हो जाता है. कई स्टडीज़ में इस इलाज की सफलता 70 से 80% तक पाई गई है. इसके साथ जेंटल स्ट्रेचिंग टेक्नीक भी की जा सकती है यानी स्किन को हल्का-हल्का खींचना. 

अगर फोरस्किन बहुत ज़्यादा सख्त है, तब सर्जरी करना ठीक रहता है. ऐसे मामलों में सर्जरी के दो ऑप्शन होते हैं- प्रीप्यूटियोप्लास्टी और सरकमसीजन. प्रीप्यूटियोप्लास्टी में स्किन को सुरक्षित रखते हुए उसे ढीला किया जाता है. वहीं सरकमसीजन में लिंग के टिप की ऊपरी स्किन हटा दी जाती है. ये सर्जरी आमतौर पर एक दिन में हो जाती है. मरीज़ बहुत जल्दी नॉर्मल एक्टिविटी करना शुरू कर सकते हैं.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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