मिडिल ईस्ट (Middle East) में जब भी कोई जंग शुरू होती है, तो दो चीजें तुरंत चर्चा में आती हैं. तेल और मिसाइल. लेकिन इस बार कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट ये है कि ईरानी मिसाइलों की तारीफ खुद अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप (Donald Trump) तक को करनी पड़ी. बयान का मतलब साफ था कि ईरान की मिसाइलें सिर्फ शोर नहीं कर रहीं, असली नुकसान पहुंचा रही हैं.
ट्रंप भी हुए मुरीद! पाबंदियों के पिंजरे में रहकर ईरान ने कैसे बनाए दुनिया को दहलाने वाले 'सुपर मिसाइल'?
ईरान दशकों से अमेरिका और नाटो के प्रतिबंध झेल रहा है. बैंकिंग से लेकर टेक्नोलॉजी तक, हथियारों से लेकर मशीन टूल्स तक, हर चीज पर रोक. अमेरिका लगातार कोशिश करता रहा कि ईरान के पास हाई-एंड सैन्य तकनीक न पहुंचे. फिर कैसे ईरान ने इतने घातक हथियार विकसित कर लिए, जिनसे इजरायल की डिफेंस लाइन भी दबाव में दिखीं और अमेरिकी जहाजों को भी खतरा महसूस हुआ?


अब बड़ा सवाल वहीं से उठता है. ईरान तो दशकों से अमेरिका और नाटो के प्रतिबंध झेल रहा है. बैंकिंग से लेकर टेक्नोलॉजी तक और हथियारों से लेकर मशीन टूल्स तक, हर चीज पर रोक. अमेरिका लगातार कोशिश करता रहा कि ईरान के पास हाई-एंड सैन्य तकनीक न पहुंचे.
फिर ये मिसाइलें आईं कहां से? कैसे ईरान ने इतने घातक हथियार विकसित कर लिए, जिनसे इजरायल की डिफेंस लाइनें भी बार बार दबाव में दिखीं और अमेरिकी जहाजों को भी खतरा महसूस हुआ?

इस पूरे मेगा एक्सप्लेनर में हम इसी सवाल का जवाब हर एंगल से निकालेंगे. इतिहास, तकनीक, रणनीति, बजट, विदेशी मदद, और वो पांच मिसाइलें जिनका नाम सुनते ही डिफेंस एक्सपर्ट्स की भौंहें तन जाती हैं.
ट्रंप को क्यों तारीफ करनी पड़ी?
मिडिल ईस्ट की जंगों में अक्सर एक नियम चलता है. अमेरिका और उसके सहयोगी देश अपनी ताकत दिखाते हैं, दुश्मन को कमजोर साबित करते हैं और दुनिया को ये संदेश देते हैं कि मुकाबला एकतरफा है. लेकिन इस बार कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने अमेरिका के नैरेटिव को थोड़ा हिला दिया.
आगे बढ़ने से पहले आपको सुना देते हैं कि आखिर ट्रंप ने कहा क्या था,
जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान की मिसाइलों को लेकर तारीफ जैसी बात कही, तो ये सिर्फ एक बयान नहीं था. ये उस डर और उस रणनीतिक चिंता का संकेत था जो ईरानी मिसाइल ताकत ने धीरे धीरे अमेरिका और इजरायल के दिमाग में बैठा दी है.
अब सवाल ये नहीं है कि ईरान ने हमला किया या नहीं. असली सवाल ये है कि ईरान की मिसाइलों ने ऐसा क्या कर दिखाया कि अमेरिका को भी मानना पड़ा कि ये सिस्टम कमजोर नहीं है.
तारीफ के पीछे का मनोविज्ञान: अमेरिका दुश्मन की तारीफ क्यों नहीं करता?अमेरिकी रणनीति की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ हथियार नहीं है. अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसका नैरेटिव है. यानी दुनिया के सामने कहानी वही चलेगी जो अमेरिका चाहेगा.
अमेरिका आम तौर पर किसी दुश्मन की सैन्य क्षमता को खुलकर स्वीकार नहीं करता. इसके पीछे तीन बड़े कारण होते हैं.
- पहला कारण ये कि अगर दुश्मन को ताकतवर माना गया, तो अमेरिका के सहयोगी देशों में डर बढ़ सकता है. खासकर खाड़ी देश और इजरायल जैसे साथी, जिनकी सुरक्षा अमेरिका के भरोसे मानी जाती है.
- दूसरा कारण ये कि अमेरिका अपने नागरिकों के सामने ये दिखाना चाहता है कि उसका सैन्य सिस्टम हर खतरे के लिए तैयार है. अगर दुश्मन की तारीफ की जाए तो जनता के मन में सवाल उठेंगे कि फिर अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है.
- तीसरा और सबसे अहम कारण ये कि अमेरिका की पूरी रणनीति ही डिटरेंस पर टिकी है. यानी दुश्मन को डराकर पीछे रखना. अगर अमेरिका खुद ही मान ले कि दुश्मन के पास भी खतरनाक हथियार हैं, तो उसका डिटरेंस कमजोर हो जाता है.
यही वजह है कि ट्रंप का ईरानी मिसाइलों को लेकर तारीफ करना एक असामान्य घटना थी. ये संकेत है कि ईरानी मिसाइलों का असर अब केवल क्षेत्रीय नहीं रहा. वो अमेरिकी सैन्य सोच तक पहुंच चुका है.
ईरान की मिसाइलों का ट्रेंड: बीते कुछ सालों में क्या बदला?ईरान की मिसाइलें पहले भी थीं. शाहाब, फतेह, कियाम जैसे नाम दशकों से मौजूद थे. लेकिन फर्क ये है कि पहले ईरान की मिसाइलें ज्यादातर डर पैदा करने के लिए थीं, अब वो रणनीतिक रूप से असर दिखाने लगी हैं.
बीते कुछ वर्षों में ईरान ने तीन बड़े बदलाव किए.
- पहला बदलाव सटीकता में आया. अब ईरान सिर्फ मिसाइल दागने की क्षमता नहीं दिखा रहा, बल्कि ये साबित कर रहा है कि वो किसी खास लक्ष्य पर वार कर सकता है.
- दूसरा बदलाव मिसाइलों की विविधता में आया. ईरान ने सिर्फ बैलिस्टिक मिसाइलों पर नहीं, बल्कि क्रूज मिसाइल और ड्रोन कॉम्बिनेशन पर भी काम किया.
- तीसरा बदलाव रणनीति में आया. ईरान अब मिसाइलों को केवल युद्ध का हथियार नहीं मानता, बल्कि ये उसके लिए राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक युद्ध का सबसे मजबूत साधन बन चुकी हैं.
यही बदलाव अमेरिका और इजरायल को परेशान करता है. क्योंकि अब मिसाइल सिर्फ धमकी नहीं है. अब मिसाइल एक वास्तविक सैन्य ऑप्शन बन चुकी है.
ईरानी मिसाइलों का असर कहां दिखा?ईरानी मिसाइल ताकत का असर तीन मोर्चों पर सबसे ज्यादा दिखाई देता है. इजरायल की एयर डिफेंस व्यवस्था, अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा, और समुद्री इलाकों में अमेरिकी नौसेना की रणनीति.
इन तीनों जगहों पर ईरान की मिसाइलों ने अलग अलग तरीके से दबाव बनाया.
इजरायल की एयर डिफेंस पर दबाव: आयरन डोम की भी एक सीमा हैइजरायल को दुनिया का सबसे एडवांस एयर डिफेंस नेटवर्क रखने वाला देश माना जाता है. उसके पास मल्टी लेयर सिस्टम है. यानी खतरा किस ऊंचाई से आ रहा है और किस दूरी से आ रहा है, उसके हिसाब से अलग सिस्टम एक्टिव होता है.
इजरायल के प्रमुख डिफेंस सिस्टम में आयरन डोम, डेविड्स स्लिंग और एरो सिस्टम शामिल हैं. आयरन डोम आम तौर पर छोटे रॉकेट और कम दूरी के खतरे रोकने के लिए है. डेविड्स स्लिंग मीडियम रेंज खतरे के लिए काम करता है. जबकि एरो सिस्टम लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए तैयार किया गया है.
लेकिन यहां समस्या तकनीक की नहीं, गणित की है. जब मिसाइलें और ड्रोन सीमित संख्या में आते हैं, तब डिफेंस सिस्टम उन्हें रोक सकता है. लेकिन जब एक साथ बड़ी संख्या में मिसाइलें दागी जाएं, जिसे सैन्य भाषा में सैचुरेशन अटैक कहा जाता है, तब सबसे मजबूत एयर डिफेंस भी दबाव में आ जाता है.
सैचुरेशन अटैक की सूरत में हर मिसाइल को रोकने के लिए इंटरसेप्टर मिसाइल चाहिए. और इंटरसेप्टर की संख्या सीमित होती है. दूसरी तरफ, हमला करने वाली मिसाइलें अगर ज्यादा हों तो डिफेंस सिस्टम का स्टॉक खत्म होने लगता है.
ईरान इसी कमजोरी पर काम करता है. वो जानता है कि इजरायल की ताकत उसकी टेक्नोलॉजी है, लेकिन उसकी कमजोरी उसका सीमित भूगोल और सीमित संसाधन हैं.
इजरायल का एक और बड़ा संकट ये है कि उसे हर समय अलर्ट पर रहना पड़ता है. जैसे ही रडार एक्टिव होता है और इंटरसेप्टर मिसाइलें लॉन्च होती हैं, उसका खर्च बढ़ता है. लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह से दबाव बनता है.
यानी ईरानी मिसाइलों का असर सिर्फ तबाही नहीं है, असर ये भी है कि इजरायल को हर वक्त युद्ध जैसी स्थिति में जीना पड़ता है.
अमेरिकी सैन्य ठिकानों का अनुभव: 2020 वाला हमला सिर्फ बदला नहीं, टेस्टिंग भी थाईरान और अमेरिका की दुश्मनी में एक बड़ा मोड़ जनवरी 2020 में आया, जब अमेरिका ने कासिम सुलेमानी को मार गिराया. सुलेमानी सिर्फ एक सैन्य कमांडर नहीं थे, वो ईरान की क्षेत्रीय रणनीति का चेहरा थे.
उनकी मौत के बाद ईरान ने इराक में अमेरिकी बेसों पर मिसाइल हमला किया. दुनिया ने इसे बदले की कार्रवाई माना. लेकिन अगर इसे सैन्य नजर से देखें तो यह सिर्फ बदला नहीं था, यह एक तरह से क्षमता प्रदर्शन भी था.
ईरान ने ये दिखाया कि वो अमेरिकी ठिकानों तक मिसाइल पहुंचा सकता है. और सिर्फ पहुंचा नहीं सकता, बल्कि अपेक्षाकृत सटीक हमला कर सकता है.

अमेरिका को इस घटना ने दो तरह से झटका दिया.
- पहला झटका मनोवैज्ञानिक था. अमेरिका की सेना को दुनिया में सबसे सुरक्षित माना जाता है. लेकिन अगर दुश्मन सीधे उसके बेसों पर मिसाइल मार सकता है, तो उसकी सुरक्षा की छवि को चोट लगती है.
- दूसरा झटका रणनीतिक था. अमेरिकी बेसों का मतलब सिर्फ सैनिक नहीं होते. वहां गोला बारूद, एयर डिफेंस सिस्टम, फ्यूल स्टोरेज, कम्युनिकेशन सेंटर और रनवे जैसी चीजें होती हैं. अगर इनमें से किसी पर भी सटीक हमला हो जाए, तो अमेरिका की युद्ध क्षमता प्रभावित हो सकती है.
ईरान ने यही संदेश दिया कि अगर जरूरत पड़ी तो अमेरिका को सिर्फ समुद्र में नहीं, जमीन पर भी चुनौती दी जा सकती है.
और यही बात अमेरिका के लिए खतरनाक संकेत है. क्योंकि अमेरिका का युद्ध मॉडल हमेशा ये रहा है कि वह दुश्मन की जमीन पर हमला करेगा, खुद पर हमला सहने की स्थिति नहीं आने देगा. ईरान ने इस समीकरण को थोड़ा बदल दिया.
समुद्री इलाकों में खतरा: अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर पर हमला क्यों सबसे बड़ा डर है?अमेरिका की सैन्य ताकत का सबसे बड़ा प्रतीक उसका एयरक्राफ्ट कैरियर होता है. ये तैरता हुआ एयरबेस होता है. एक एयरक्राफ्ट कैरियर के साथ कई युद्धपोत चलते हैं. पूरा कैरियर स्ट्राइक ग्रुप बनता है.
ये दुनिया का सबसे महंगा और सबसे ताकतवर समुद्री हथियार सिस्टम माना जाता है. लेकिन ईरान ने पिछले वर्षों में जिस दिशा में काम किया है, वो है एंटी शिप मिसाइल और ड्रोन स्वार्म रणनीति.
अगर फारस की खाड़ी या उसके आसपास के समुद्री क्षेत्र में सैकड़ों किलोमीटर दूर से हाई स्पीड मिसाइलें और बड़ी संख्या में ड्रोन एक साथ भेजे जाएं, तो किसी भी नौसेना पर दबाव बढ़ जाता है.
यहां समस्या ये नहीं है कि एयरक्राफ्ट कैरियर कमजोर हैं. समस्या ये है कि कैरियर का बचाव करना बेहद महंगा और जटिल है.
एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत लाखों डॉलर हो सकती है. जबकि हमला करने वाला ड्रोन या मिसाइल कई बार उससे सस्ता होता है. यही वजह है कि अमेरिका के लिए समुद्री खतरा सिर्फ सैन्य नहीं, आर्थिक युद्ध भी बन जाता है.

ईरान की समुद्री रणनीति को अक्सर एरिया डिनायल रणनीति कहा जाता है. मतलब ईरान ये नहीं कहता कि वो अमेरिका को समुद्र में हरा देगा. ईरान बस ये साबित करना चाहता है कि वो समुद्र को अमेरिका के लिए खतरनाक बना सकता है.
अगर अमेरिका के एयरक्राफ्ट कैरियर पर हमला होने की संभावना भी बन जाए, तो अमेरिका को अपनी पूरी योजना बदलनी पड़ती है. यही कारण है कि ट्रंप की तारीफ में समुद्री एंगल सबसे ज्यादा अहम माना जा सकता है.
ट्रंप की तारीफ का असली मतलब: बयान नहीं, संकेत थाराजनीति में हर बयान का एक सतही मतलब होता है और एक गहरा मतलब. ट्रंप की तारीफ का सतही मतलब ये हो सकता है कि वो बस बोलने की आदत के कारण बोल गए. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के शब्द अक्सर सोच समझकर चुने जाते हैं, खासकर युद्ध जैसे मामलों में.
अगर इस बयान को बिटविन द लाइन पढ़ें, तो दो संकेत साफ दिखाई देते हैं.
पहला संकेत: अमेरिका मान चुका है कि ईरान की मिसाइल टेक्नोलॉजी पिछड़ी नहीं रहीअमेरिका और पश्चिमी देश लंबे समय तक ईरान को एक ऐसा देश बताते रहे जो प्रतिबंधों के कारण आधुनिक तकनीक नहीं बना सकता. लेकिन ईरान की मिसाइलों ने ये नैरेटिव कमजोर कर दिया.
आज ईरान के पास ऐसी मिसाइलें हैं जो सॉलिड फ्यूल पर आधारित हैं, तेजी से लॉन्च हो सकती हैं, और कुछ मामलों में ज्यादा सटीक भी मानी जाती हैं. ये टेक्नोलॉजी उस देश के लिए आसान नहीं है जिस पर दशकों से आर्थिक नाकेबंदी हो.
इसलिए ट्रंप का बयान कहीं न कहीं इस बात की स्वीकारोक्ति था कि ईरान ने प्रतिबंधों को तोड़कर या उन्हें चकमा देकर अपनी मिसाइल क्षमता को मजबूत किया है.
दूसरा संकेत: अमेरिका को डर है कि भविष्य में नुकसान बहुत बड़ा हो सकता हैअमेरिका की चिंता सिर्फ आज के हमले तक सीमित नहीं है. अमेरिका की चिंता भविष्य के युद्ध से जुड़ी है. अगर कल को ईरान और अमेरिका के बीच बड़ा संघर्ष होता है, तो ईरान की मिसाइलें अमेरिकी सैन्य ठिकानों और नौसेना दोनों को नुकसान पहुंचा सकती हैं.
यहां नुकसान का मतलब सिर्फ सैनिकों की मौत नहीं है. नुकसान का मतलब रणनीतिक नुकसान भी है. जैसे बेस निष्क्रिय हो जाना, रनवे टूट जाना, कम्युनिकेशन सेंटर खत्म हो जाना, या युद्धपोत को गंभीर क्षति पहुंचना.
ऐसे नुकसान से अमेरिका की विश्वसनीयता प्रभावित होती है. और अमेरिका के लिए विश्वसनीयता ही सबसे बड़ा हथियार है. क्योंकि अमेरिका की ताकत सिर्फ लड़ने में नहीं, बल्कि डराने में भी है. ईरान की मिसाइलें उस डर को चुनौती देती हैं.
ये तारीफ नहीं थी, चेतावनी थीट्रंप का बयान दुनिया के लिए मैसेज था, लेकिन उतना ही बड़ा मैसेज अमेरिका के भीतर भी था. यह अमेरिकी सेना, पेंटागन और अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए एक संकेत था कि खतरा वास्तविक है. ईरान की मिसाइलों को हल्के में लेने की गलती अब नहीं हो सकती.
दूसरी तरफ यह अमेरिका के सहयोगी देशों के लिए भी चेतावनी थी कि आने वाले समय में मिडिल ईस्ट में युद्ध का चेहरा बदल सकता है. लड़ाई सिर्फ टैंक और विमान से नहीं होगी. लड़ाई मिसाइलों और ड्रोन के झुंड से होगी.
और यही वो वजह है जिसके चलते ट्रंप जैसे नेता को भी मजबूरी में कहना पड़ा कि ईरान की मिसाइलें तेज और खतरनाक हैं. यानी ये बयान तारीफ से ज्यादा एक कबूलनामा था. जिसमें डर भी था, रणनीति भी थी और आने वाले तूफान का संकेत भी.
ईरान ने कौन-कौन सी मिसाइलें इस्तेमाल कीं?
अब आते हैं सबसे बड़े हिस्से पर. ईरान की मिसाइलें सिर्फ एक-दो मॉडल नहीं हैं. ये पूरा एक इकोसिस्टम है. बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल, शॉर्ट रेंज, मीडियम रेंज और अब हाइपरसोनिक दावा भी.
ईरान ने अपनी रणनीति ऐसी बनाई है कि वो संख्या भी ला सके और रेंज भी. और यही चीज इजरायल-अमेरिका के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है.
नीचे हम उन मिसाइलों की बात करेंगे जो हालिया संघर्षों में चर्चा में रहीं या जिनका इस्तेमाल ईरान के हमलों में माना जाता है.
फतेह-110 ईरान की सबसे प्रसिद्ध शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों में से एक है. इसे ईरान के IRGC यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की रीढ़ कहा जाता है.
रेंज और क्षमता: इसकी रेंज अलग-अलग वेरिएंट में लगभग 200 से 300 किलोमीटर के आसपास मानी जाती है.
तकनीक: ये सॉलिड फ्यूल पर आधारित है. सॉलिड फ्यूल मिसाइलों की खासियत ये होती है कि इन्हें जल्दी लॉन्च किया जा सकता है, इन्हें स्टोर करना आसान होता है और दुश्मन को पहले से संकेत कम मिलता है.
क्यों खतरनाक है?: क्योंकि ये मिसाइलें तेजी से दागी जा सकती हैं. इन्हें मोबाइल लॉन्चर से भी चलाया जा सकता है. और जब दर्जनों मिसाइलें एक साथ दागी जाती हैं, तो एयर डिफेंस सिस्टम पर लोड बढ़ जाता है.

कहां तबाही मचाई?: फतेह सीरीज का इस्तेमाल इराक और सीरिया के इलाकों में ईरान के हमलों में रिपोर्ट हुआ है. यह मिसाइल अक्सर ईरानी जवाबी कार्रवाई का पहला हथियार बनती है.
ज़ोल्फ़ाघर (Zolfaghar)ज़ोल्फ़ाघर, फतेह परिवार की ही उन्नत मिसाइल मानी जाती है.
रेंज: इसकी रेंज लगभग 700 किलोमीटर तक बताई जाती है.
तकनीक: ये भी सॉलिड फ्यूल बैलिस्टिक मिसाइल है. इसमें बेहतर गाइडेंस सिस्टम और ज्यादा दूरी की क्षमता जोड़ी गई.
क्यों खतरनाक?: क्योंकि ये ईरान को ये क्षमता देती है कि वो इजरायल के नजदीकी क्षेत्रों और खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों तक पहुंच बना सके.

बैलिस्टिक मिसाइलें ऊंचाई तक जाती हैं और फिर बहुत तेज गति से लक्ष्य पर गिरती हैं. आखिरी कुछ सेकंड में इन्हें रोकना बेहद मुश्किल होता है.
कियाम-1 (Qiam-1)कियाम-1 ईरान की एक शॉर्ट टू मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है.
खासियत: इसकी डिजाइन स्कड मिसाइलों से प्रेरित मानी जाती है. लेकिन ईरान ने इसे अपने हिसाब से अपग्रेड किया.
रेंज: करीब 700 से 800 किलोमीटर तक.
घातक क्यों?: क्योंकि ये मिसाइलें पारंपरिक वारहेड के साथ-साथ कुछ मामलों में क्लस्टर जैसी क्षमता भी रखने की वजह से चर्चाओं में रही हैं. ये बात और है कि हर बार इसकी पुष्टि नहीं होती.

युद्ध में भूमिका: कियाम को ईरान ने अपने कई जवाबी हमलों में इस्तेमाल किया है. यह मिसाइल ईरानी रणनीति में एक भरोसेमंद हथियार की तरह है.
शाहाब-3 (Shahab-3)शाहाब-3 ईरान की सबसे चर्चित मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है. इसे ईरान के मिसाइल प्रोग्राम की बड़ी छलांग माना जाता है.
रेंज: लगभग 1300 से 2000 किलोमीटर तक अलग-अलग वेरिएंट्स में बताई जाती है.
तकनीक: ये लिक्विड फ्यूल आधारित है. लिक्विड फ्यूल मिसाइलों में रेंज ज्यादा होती है, लेकिन इन्हें तैयार करने में समय लगता है और लॉन्च से पहले दुश्मन को संकेत मिलने का खतरा ज्यादा रहता है.
क्यों खतरनाक?: क्योंकि इसकी रेंज इजरायल तक पहुंचने के लिए पर्याप्त है. यही वजह है कि शाहाब-3 का नाम इजरायल में लंबे समय से डर पैदा करता है.

असर और तबाही: शाहाब-3 का इस्तेमाल कई बार सैन्य परेड और टेस्ट में दिखाया गया है. इसका मुख्य उद्देश्य रणनीतिक डर बनाना है.
इमाद (Emad)इमाद को शाहाब-3 का अपग्रेड वर्जन माना जाता है.
खासियत: इसमें गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम बेहतर बताया जाता है, जिससे इसकी सटीकता बढ़ जाती है.
रेंज: करीब 1700 किलोमीटर.
क्यों खतरनाक?: मीडियम रेंज मिसाइल अगर ज्यादा सटीक हो जाए तो वो सिर्फ शहरों पर नहीं, बल्कि सैन्य ठिकानों और एयरबेस पर भी निर्णायक हमला कर सकती है.
सेज्जिल (Sejjil)सेज्जिल ईरान की सबसे खतरनाक बैलिस्टिक मिसाइलों में गिनी जाती है.
तकनीक: ये सॉलिड फ्यूल मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है. और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.
रेंज: करीब 2000 किलोमीटर तक.
क्यों खतरनाक?: सॉलिड फ्यूल + 2000 किलोमीटर रेंज का मतलब है कि ईरान के पास तेजी से लॉन्च होने वाली स्ट्रैटेजिक मिसाइल है. यानी दुश्मन को रिएक्ट करने का समय कम.

अगर ईरान सेज्जिल जैसी मिसाइलों को बड़ी संख्या में ऑपरेशनल कर लेता है, तो इजरायल का एयर डिफेंस और अमेरिकी बेस दोनों पर दबाव बढ़ जाता है.
खैबर शेकन (Kheibar Shekan)खैबर शेकन का नाम ही मैसेज है. खैबर किला तोड़ने वाला. ये मिसाइल ईरान ने हाल के वर्षों में शोकेस की है.
रेंज: करीब 1450 किलोमीटर तक.
तकनीक: सॉलिड फ्यूल बैलिस्टिक मिसाइल, ज्यादा मैन्युवरेबिलिटी और बेहतर गाइडेंस.
खासियत: इसके बारे में दावा किया जाता है कि यह मिसाइल एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने के लिए अपने रास्ते में बदलाव कर सकती है.

आधुनिक एयर डिफेंस मिसाइलें आम तौर पर अनुमानित बैलिस्टिक ट्रैक को पकड़ती हैं. अगर मिसाइल अपना ट्रैक बदलने लगे तो इंटरसेप्शन मुश्किल हो जाता है.
हाज कासिम (Haj Qassem)यह मिसाइल ईरान ने कासिम सुलेमानी के नाम पर बनाई. और इसका मकसद भी वही है, बदले का संदेश.
रेंज: करीब 1400 किलोमीटर.
तकनीक: सॉलिड फ्यूल, हाई स्पीड री-एंट्री और बेहतर टर्मिनल गाइडेंस.

ये मिसाइल ईरान को स्ट्राइक कैपेबिलिटी देती है. यानी वो दूर बैठे लक्ष्य पर तेज हमला कर सकता है.
पावेह (Paveh) क्रूज मिसाइलईरान ने क्रूज मिसाइल टेक्नोलॉजी पर भी काफी काम किया है. पावेह को लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल के तौर पर पेश किया गया.
क्रूज मिसाइल का मतलब क्या?: क्रूज मिसाइलें जमीन के करीब उड़ती हैं. इन्हें रडार से पकड़ना मुश्किल होता है, क्योंकि ये पहाड़ों और जमीन के भूगोल के साथ-साथ चलती हैं.
रेंज: ईरान ने इसके लिए 1000 किलोमीटर से ज्यादा की क्षमता के दावे किए हैं.
क्रूज मिसाइलें सटीक हमला कर सकती हैं. एयर डिफेंस के लिए इन्हें पकड़ना बैलिस्टिक मिसाइलों से अलग चुनौती है.
खलिज फारस (Khalij Fars) एंटी-शिप मिसाइलखलिज फारस ईरान की एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल मानी जाती है. इसका मकसद अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और युद्धपोतों को डराना है.
रेंज: करीब 300 किलोमीटर या उससे ज्यादा.
तकनीक: यह मिसाइल समुद्र में चलते लक्ष्य को हिट करने के लिए डिजाइन की गई बताई जाती है. यानी इसके पास टर्मिनल गाइडेंस हो सकता है.
ये मिसाइल अमेरिका के लिए सिरदर्द है. क्योंकि एयरक्राफ्ट कैरियर को रोकने के लिए पारंपरिक तौर पर बड़े हथियार चाहिए होते हैं. अगर बैलिस्टिक मिसाइलों से समुद्र में हमला संभव हो जाए, तो अमेरिकी नौसेना की रणनीति प्रभावित होती है.
फत्ताह (Fattah) हाइपरसोनिक दावाईरान ने दावा किया कि उसने फत्ताह नाम की हाइपरसोनिक मिसाइल बनाई है. हाइपरसोनिक मिसाइल मतलब वो मिसाइल मार्क 5 यानी ध्वनि की गति से पांच गुना ज्यादा स्पीड से चले और मैन्युवर भी कर सके.
हाइपरसोनिक हथियारों को इंटरसेप्ट करना बेहद कठिन माना जाता है. अमेरिका, रूस और चीन इस तकनीक पर दशकों से काम कर रहे हैं.

बिटविन द लाइन सच्चाई: ईरान का दावा कितना पूरी तरह ऑपरेशनल है, इस पर दुनिया के सैन्य विशेषज्ञ बंटे हुए हैं. लेकिन एक बात तय है कि ईरान हाई स्पीड री-एंट्री व्हीकल और मैन्युवरिंग वॉरहेड की दिशा में काम कर रहा है.
ये भी पढ़ें: ईरान के फतेह-2 और खैबर ने इजरायल में मचाई तबाही, आयरन डोम की 'ढाल' तक चीर डाली
आगे बढ़ने से पहले ईरान की टॉप-5 मिसाइलों और उनकी खूबियों पर इस टेबल के जरिए एक बार फिर नजर डाल लेते हैं.
| मिसाइल का नाम | रेंज (किलोमीटर) | खासियत |
| खैबर शेकन | 1450 किमी | इसे 'खोर्रमशहर-4' भी कहते हैं. ये 1500 किलो का वारहेड ले जा सकती है. |
| सेजिल (Sejjil) | 2500 किमी | ये ईरान की सबसे लंबी दूरी की मिसाइल है. ये पूरे इजरायल और यूरोप के कुछ हिस्सों तक पहुंच सकती है. |
| हाज कासिम | 1400 किमी | जनरल कासिम सुलेमानी के नाम पर बनी ये मिसाइल एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में माहिर है. |
| शहाब-3 | 1300-2000 किमी | ईरान की सबसे भरोसेमंद और पुरानी बैलिस्टिक मिसाइल, जिसे बार-बार अपग्रेड किया गया है. |
| फत्ताह-2 | 1500 किमी | ये हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV) तकनीक पर काम करती है, जो इसे और भी खतरनाक बनाती है. |
ईरान का मिसाइल प्रोग्राम कब शुरू हुआ और कैसे यहां तक पहुंचा?
इस बात को विस्तार से समझने के लिए इतिहास में जरा पीछे चलते हैं. ईरान का मिसाइल प्रोग्राम कोई अचानक पैदा हुई चीज नहीं है. इसकी जड़ें ईरान-इराक युद्ध में हैं.
1980 के दशक में जब इराक ने ईरान पर हमला किया, तब ईरान को समझ आया कि उसके पास जवाबी क्षमता बहुत कमजोर है. इराक के पास स्कड मिसाइलें थीं. ईरान के शहरों पर हमले हो रहे थे.
ईरान के लिए ये सिर्फ युद्ध नहीं था, ये राष्ट्रीय अस्तित्व का सवाल बन गया. यहीं से ईरान ने तय किया कि उसे अपना मिसाइल सिस्टम खुद बनाना होगा.
शुरुआती दौर: बाहर से खरीद और कॉपी मॉडलपहले चरण में ईरान ने दूसरे देशों से मिसाइलें खरीदीं और फिर उन्हें रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए समझा. रिवर्स इंजीनियरिंग मतलब जो चीज मिली है, उसे खोलकर देखो, उसका डिजाइन समझो और फिर अपने तरीके से वैसा ही बना लो.
IRGC का रोलईरान की सेना दो हिस्सों में बंटी है. एक रेगुलर आर्मी और दूसरी IRGC. IRGC ने मिसाइल प्रोग्राम को अपने नियंत्रण में रखा. वजह साफ थी. मिसाइलें ईरान की सबसे बड़ी डिटरेंस यानी डर पैदा करने वाली शक्ति बन सकती थीं.
ईरान के मिसाइल सेंटर और बेस कहां हैं?ईरान ने अपने मिसाइल बेस इस तरह बनाए कि उन्हें नष्ट करना आसान न हो. ईरान ने अपने मिसाइल प्रोग्राम में कई एहतियात बरतें. मिसाल के तौरपर,
पहाड़ी इलाकों में अंडरग्राउंड बेस: ईरान ने कई जगह सुरंगों और पहाड़ों के अंदर मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च फैसिलिटी बनाई हैं.
मोबाइल लॉन्चर सिस्टम: ट्रक पर लगे लॉन्चर, जिन्हें जल्दी से कहीं भी शिफ्ट किया जा सके.
डिकॉय और फेक बेस: कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान ने नकली लॉन्च साइट भी बनाई हैं ताकि दुश्मन की सैटेलाइट निगरानी को धोखा दिया जा सके.
मिसाइल सिटी कॉन्सेप्टईरान ने खुद वीडियो जारी कर कई बार दावा किया कि उसके पास "मिसाइल सिटीज" हैं. यानी अंडरग्राउंड नेटवर्क जहां मिसाइलें स्टोर होती हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत बाहर निकाली जा सकती हैं.

ये रणनीति इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अमेरिका और इजरायल की सबसे बड़ी ताकत है एयर स्ट्राइक और सर्जिकल अटैक.
ईरान के मिसाइल स्टोर का हाल?आज ईरान के पास मिसाइलों का एक बड़ा स्टॉक माना जाता है. इसमें हजारों शॉर्ट रेंज और सैकड़ों मीडियम रेंज मिसाइलें होने का अनुमान लगाया जाता है.
ईरान की सबसे बड़ी ताकत संख्या है. क्योंकि एयर डिफेंस सिस्टम महंगे होते हैं और इंटरसेप्टर मिसाइलें सीमित होती हैं. अगर एक साथ बहुत बड़ी संख्या में मिसाइलें दाग दी जाएं, तो किसी भी डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है.
यही वजह है कि ईरान "सैचुरेशन अटैक" यानी भरमार हमला की रणनीति अपनाता है.
ईरान के मिसाइल प्रोग्राम का बजट कितना है और पैसा कहां से आता है?अब सवाल आता है पैसे का. मिसाइल प्रोग्राम सस्ता नहीं होता. रिसर्च, टेस्टिंग, मटेरियल, इलेक्ट्रॉनिक्स, गाइडेंस सिस्टम, इंजन, फ्यूल, सब कुछ महंगा.
लेकिन ईरान का मॉडल थोड़ा अलग है. तो फिर वहीं सवाल की ईरान मिसाइल पर खर्च कम कैसे होता है? कम खर्च के पीछे भी ईरान की तीन नीतियां हैं.
- घरेलू उत्पादन: ईरान ने जितना हो सके, चीजें अपने देश में बनाईं. इससे लागत कम होती है.
- रिवर्स इंजीनियरिंग: नई चीज खोजने के बजाय पुराने मॉडल को अपग्रेड करना सस्ता पड़ता है.
- स्थानीय नेटवर्क: ईरान ने अपनी इंडस्ट्री को सैन्य जरूरतों के साथ जोड़ दिया. यानी कई पार्ट्स सिविल इंडस्ट्री के नाम पर बनते हैं, फिर सैन्य प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होते हैं.
ईरान में सैन्य बजट की पारदर्शिता बहुत कम है. IRGC का बजट कई बार ऑफिशियल आंकड़ों से अलग चैनल से चलता है. कई रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान मिसाइल और ड्रोन प्रोग्राम पर अरबों डॉलर के बराबर खर्च करता है, लेकिन यह खर्च धीरे-धीरे सालों में फैला हुआ है.
अब सवाल उठता है कि ईरान फंडिंग का इंतजाम कैसे करता है? जानकारों का मानना है कि ईरान के पास कुछ बड़े स्रोत हैं.
- तेल और गैस से कमाई
- सरकारी बजट
- IRGC से जुड़ी कंपनियां
- कुछ क्षेत्रों में गैर-औपचारिक व्यापार नेटवर्क
बिटविन द लाइन देखें तो ईरान का मिसाइल प्रोग्राम सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि सत्ता संरचना का हिस्सा है. IRGC की आर्थिक ताकत और राजनीतिक पकड़ भी इसे फंडिंग में मदद करती है.
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क्या दूसरे देश ईरान के मिसाइल प्रोग्राम में मदद कर रहे हैं?
अब बारी सबसे विवादित, लेकिन सबसे अहम सवाल की आती है. ईरान ने मिसाइलों का ये जखीरा सिर्फ अपने दम पर जमा किया है या दूसरे देश इसमें मदद कर रहे हैं?
रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो ईरान अकेला नहीं है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी देश पूरी तरह अकेला होकर इतना बड़ा टेक्नोलॉजिकल जंप आम तौर पर नहीं करता. ईरान के इस मिसाइल सिंडिकेट में चार देशों का ज़िक्र आता है.
उत्तर कोरिया का एंगलदुनिया में सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर कोरिया की होती है. क्योंकि उत्तर कोरिया भी प्रतिबंध झेलता है और मिसाइल टेक्नोलॉजी में काफी आगे है. ऐसा माना जाता है कि शुरुआती दौर में ईरान और उत्तर कोरिया के बीच टेक्नोलॉजी एक्सचेंज हुआ.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि शाहाब मिसाइलों की डिजाइन प्रेरणा उत्तर कोरियाई मिसाइलों से मिली.

चीन के ऊपर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि उसकी टेक्नोलॉजी या कंपोनेंट्स किसी न किसी रास्ते से ईरान तक पहुंचे. चीन की भूमिका सीधे मिसाइल देने की नहीं, बल्कि ड्यूल यूज टेक्नोलॉजी के जरिए हो सकती है.
ड्यूल यूज मतलब जो चीज सिविल और सैन्य दोनों में इस्तेमाल हो सकती है. जैसे मशीन टूल्स, नेविगेशन पार्ट्स, हाई ग्रेड मटेरियल.
युद्ध और स्ट्रैटेजिक मामलों के जानकार और ‘इंडिया मैटर्स’ के एडिटर रोहित शर्मा कहते है कि
चीन और उत्तर कोरिया से मिसाइल के पार्ट्स और तकनीक की मदद तो मिली ही है. ये भी मुमकिन है कि बने बनाए मिसाइलों का जखीरा पिछले कई सालों में ईरान को मिला हो, जिसे रंग पोत कर ईरान अपना बता रहा है.
रोहित का मानना है कि ईरान को विदेशों से मिसाइल पार्टस और टेक्नोलॉजी (बहुत मुमकिन है कि बनी बनाई मिसाइलें भी) कई सालों मिल रही हैं. ये हो सकता है कि ईरान इंडिजिनस तकनीक विकसित कर चुका हो. मगर सालों से लगे प्रतिबंधों के बीच ये बड़ा मुश्किल काम है.
रोहित इसके समर्थन में तर्क देते हुए कहते हैं,
बिना स्पेस प्रोग्राम के मिसाइल इंजन बनाना काफी मुश्किल काम है क्योंकि मिसाइल के इंजन की तकनीक वही है जो स्पेस रॉकेट इंजन की होती है. भारत को अपने क्रायोजनिक इंजन बनाने में काफी समय लग गया. ऐसे में बिना किसी बाहरी मदद के ईरान खुद से मिसाइल इंजन डेवलप कर लेगा, इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है.
रोहित कहते हैं कि चीन और उत्तर कोरिया को ईरान से तेल चाहिए. और बदले में मिसाइल और उसकी तकनीक देना किसी भी लिहाज से महंगा सौदा नहीं है.
रूस का एंगलरूस के साथ ईरान का संबंध पिछले दशक में गहरा हुआ है. खासकर सीरिया युद्ध के बाद. रूस मिसाइल टेक्नोलॉजी में मास्टर है. लेकिन रूस ने सीधे ईरान को मिसाइल टेक्नोलॉजी दी, ये बात खुलकर साबित नहीं होती.
फिर भी, रूस के साथ सहयोग से ईरान को रडार, एयर डिफेंस, इंजन टेक्नोलॉजी और रणनीतिक ट्रेनिंग में मदद मिल सकती है. वायुसेना के पूर्व अधिकारी और रक्षा विशेषज्ञ डॉ डी. के. पाण्डेय कहते हैं,
पाकिस्तान का एंगलरूस इकलौता ऐसा देश है कि जिसकी हाइपसोनिक तकनीक पूरी दुनिया के सामने साबित हो चुकी है. ऐसे में ताज्जुब नहीं होना चाहिए. अगर ईरान की हाइपरसोनिक मिसाइलों के पीछे भी रूसी दिमाग हो.
पाकिस्तान खुद बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम में अनुभवी है. लेकिन पाकिस्तान के ईरान से संबंध हमेशा स्थिर नहीं रहे. कुछ पश्चिमी विश्लेषक मानते हैं कि क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए टेक्नोलॉजी की अदला-बदली मुमकिन है.
ये बात और है कि खुद पाकिस्तान ऐसे इल्जामों से हमेशा इंकार करता रहा है.

विदेशी मदद का रोल चाहे जितना हो, एक सच यह है कि ईरान ने दशकों में अपना वैज्ञानिक आधार तैयार किया है. उसने यूनिवर्सिटी, रिसर्च सेंटर, सैन्य लैब और इंजीनियरिंग नेटवर्क तैयार किया. प्रतिबंधों ने उसे मजबूर किया कि वो आयात पर नहीं, घरेलू इनोवेशन पर टिके.
इन सबके बीच एक और सवाल ये उठता है कि आखिर ईरान की मिसाइलें इतनी खतरनाक कैसे बन गईं? यहीं पर बात आती है टेक्नोलॉजी की असली कहानी पर. ईरान ने इस बाबत 5 लेवल की रणनीति बनाई है,
(1) सॉलिड फ्यूल टेक्नोलॉजी में प्रगति: ईरान ने सॉलिड फ्यूल को प्राथमिकता दी क्योंकि यह तेजी से लॉन्च होता है और इसे छिपाना आसान है.
सॉलिड फ्यूल मिसाइलें युद्ध में ज्यादा उपयोगी हैं क्योंकि इन्हें फ्यूल भरने के लिए लंबा समय नहीं चाहिए.
(2) गाइडेंस सिस्टम और सटीकता: पहले के जमाने की मिसाइलें शहरों पर गिरती थीं. अब मिसाइलें एयरबेस, हेडक्वार्टर, रडार स्टेशन, गोदाम, रनवे जैसी जगहों को निशाना बना सकती हैं.
ईरान ने INS यानी इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और संभवतः GPS जैसे सिग्नल से प्रेरित गाइडेंस पर काम किया.
(3) ड्रोन और मिसाइल का कॉम्बिनेशन: ईरान ने मिसाइलों के साथ ड्रोन को जोड़ दिया. ड्रोन पहले जाकर एयर डिफेंस को उलझाते हैं, रडार को मजबूर करते हैं कि वो एक्टिव हो. फिर मिसाइलें आती हैं.
इसे आधुनिक युद्ध में "डिकॉय और स्ट्राइक" मॉडल कहते हैं.
(4) मैन्युवरिंग री-एंट्री व्हीकल: ईरान का दावा है कि उसकी कुछ मिसाइलें री-एंट्री के वक्त दिशा बदल सकती हैं. अगर ये दावा सही है तो यह एयर डिफेंस के लिए बड़ी चुनौती है.
(5) संख्या का खेल: ईरान की रणनीति ये नहीं कि एक मिसाइल से जंग जीत जाए. उसकी रणनीति है कि एक साथ इतनी मिसाइलें दागो कि दुश्मन की डिफेंस लाइन थक जाए.
यही वजह है कि ईरान मिसाइलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है.
इजरायल-अमेरिका के लिए ईरानी मिसाइलें सबसे बड़ा सिरदर्द क्यों हैं?
इजरायल की जियोग्राफी छोटी है. उसके एयरबेस, पावर स्टेशन, पोर्ट और बड़े शहर सीमित इलाके में हैं. अगर एक या दो मिसाइलें भी सही जगह गिर जाएं, तो नुकसान बड़ा हो सकता है.
अमेरिका के लिए समस्या अलग है. अमेरिका के पास बेस हैं इराक, कुवैत, बहरीन, कतर और आसपास. ये सब ईरान की मिसाइल रेंज में आते हैं.
यानी ईरान के पास एक ऐसा हथियार है जो अमेरिका को सीधे मैदान में चुनौती दे सकता है, बिना एयरफोर्स के.
प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने ये सब कैसे किया? असली जुगाड़ मॉडल
अब उस सवाल पर लौटते हैं जिससे कहानी शुरू हुई. जब दुनियाभर की पाबंदियां लगी थीं तो फिर ईरान ने इतने सारे मिसाइल क्यों बना लिए. जानकार मानते हैं कि ईरान ने प्रतिबंधों को जुगाड़, नेटवर्क और घरेलू उत्पादन से काटा है.
चलिए एक-एक करके उन जुगाड़ों से आपको रूबरू कराते हैं,
रिवर्स इंजीनियरिंग: जो पार्ट्स कहीं से भी मिले, ईरान ने उन्हें खोला, समझा और कॉपी किया.
ड्यूल यूज इंपोर्ट: कई मशीनें और कंपोनेंट्स ऐसे होते हैं जो सिविल इंडस्ट्री में भी लगते हैं. ईरान ने इन्हें अलग रास्तों से मंगाया.
शैडो ट्रेड नेटवर्क: ईरान के पास व्यापार का एक अनौपचारिक नेटवर्क है जो प्रतिबंधों के बीच भी काम करता है.
घरेलू वैज्ञानिक आधार: ईरान ने इंजीनियरों की एक पीढ़ी तैयार की जो केवल मिसाइल प्रोग्राम पर काम करती रही.
युद्ध से सीख: ईरान ने इराक युद्ध, सीरिया युद्ध और क्षेत्रीय संघर्षों से लगातार सीख ली. जो मिसाइल टेस्टिंग में नहीं सीख सकते, वो युद्ध में सीख जाते हैं.
ईरान की मिसाइल रणनीति: हमला नहीं, डर पैदा करना असली लक्ष्य
ईरान का असली लक्ष्य हमेशा जंग जीतना नहीं होता. उसका लक्ष्य होता है दुश्मन को रोकना. इसे डिटरेंस कहते हैं. ईरान जानता है कि अमेरिका की एयरफोर्स और नौसेना उससे कई गुना बड़ी है.
लेकिन अगर ईरान अमेरिका को ये विश्वास दिला दे कि हमला करने पर नुकसान बहुत ज्यादा होगा, तो अमेरिका पीछे हट सकता है. यही ईरान का मिसाइल सिद्धांत है.
ईरान की मिसाइल पावर और मिडिल ईस्टअब सवाल ये उठता है कि ईरान की इस मिसाइल ताकत का मिडिल ईस्ट पर क्या असर पड़ रहा है? पश्चिम एशिया की सामरिक गतिविधियों पर करीब से नजर रखने वाले इसे चार हिस्सों में बांटकर देखते हैं.
(1) इजरायल की सुरक्षा रणनीति बदली: इजरायल अब सिर्फ आयरन डोम पर निर्भर नहीं रह सकता. उसे मल्टी लेयर डिफेंस और प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक की रणनीति रखनी पड़ती है.
(2) खाड़ी देशों की चिंता बढ़ी: सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों के लिए ईरान की मिसाइलें सीधे खतरा हैं.
(3) अमेरिका को अपने बेस फैलाने पड़े: अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों की सुरक्षा बढ़ानी पड़ी, पैट्रियट और THAAD सिस्टम लगाने पड़े.
(4) हथियारों की दौड़ तेज हुई: ईरान की मिसाइलों ने पूरे इलाके में आर्म्स रेस तेज कर दी.
ईरान मिसाइल बनाता गया, दुनिया जवाब देती गईये कहानी सिर्फ ईरान की नहीं है. ये एक्शन-रिएक्शन की चेन है. ईरान ने मिसाइलें बढ़ाईं. इजरायल ने एयर डिफेंस बढ़ाया. अमेरिका ने प्रतिबंध बढ़ाए. ईरान ने ड्रोन और क्रूज मिसाइल बढ़ाए. इजरायल ने प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक की नीति अपनाई. यानी ये एक सर्कल है. और इस सर्कल में हर नया हथियार अगले हथियार को जन्म देता है.
ईरान की मिसाइलों की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?हर ताकत के साथ कमजोरी भी छिपी होती है. ईरानी मिसाइल प्रोग्राम पर भी ये बात लागू होती है. तो आइये एक नजर उन कमजोरियों पर भी डाल लेते हैं.
(1) एयरफोर्स की कमी: ईरान के पास आधुनिक फाइटर जेट्स की कमी है. इसलिए वो मिसाइलों पर ज्यादा निर्भर है.
(2) टेक्नोलॉजी गैप: ईरान बहुत आगे बढ़ा है, लेकिन अमेरिका और इजरायल के मुकाबले इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, सैटेलाइट इंटेलिजेंस और रियल टाइम टार्गेटिंग में अभी भी अंतर है.
(3) लॉजिस्टिक दबाव: अगर लंबी जंग हो जाए तो मिसाइल स्टॉक बनाए रखना आसान नहीं होता. क्योंकि उत्पादन क्षमता भी सीमित होती है.
ट्रंप की तारीफ और अमेरिका की चिंताअब पूरी कहानी को समेटते हैं. ट्रंप ने तारीफ की, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अमेरिका ईरान को सम्मान दे रहा है. इसका मतलब है कि अमेरिका ईरान की सैन्य क्षमता को गंभीरता से देख रहा है.
आज की जंग में मिसाइलें सिर्फ हथियार नहीं हैं. ये राजनीतिक बयान हैं. जब ईरान मिसाइल दागता है, तो वो सिर्फ लक्ष्य नहीं मारता, वो दुनिया को संदेश देता है कि मैं अकेला नहीं हूं, मैं कमजोर नहीं हूं, और मैं हमला झेलकर भी जवाब दे सकता हूं.
यही बात अमेरिका और इजरायल के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है.
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ईरान ने प्रतिबंधों को हथियार बना लियाईरान की मिसाइलों की कहानी असल में टेक्नोलॉजी की कहानी नहीं है. ये सर्वाइवल की कहानी है. जब किसी देश को लगातार घेरा जाए, उसके लिए बाजार बंद किए जाएं, बैंकिंग रोक दी जाए, और हथियारों पर प्रतिबंध लगा दिए जाएं, तो दो रास्ते बचते हैं. या तो वो झुक जाए. या फिर वो खुद सीख जाए.
ईरान ने दूसरा रास्ता चुना. उसने मिसाइलों को अपनी ढाल बनाया, अपनी तलवार बनाया और अपनी राजनीति का सबसे बड़ा कार्ड बना दिया.
इसीलिए आज हालात ये हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति भी अगर ईरान की मिसाइलों की तारीफ कर रहा है, तो समझिए ये मिसाइलें सिर्फ ईरान की नहीं रहीं. ये मिडिल ईस्ट की पूरी जियोपॉलिटिक्स का केंद्र बन चुकी हैं.
आने वाले वक्त में, अगर कोई बड़ा संघर्ष होता है, तो सबसे पहले चर्चा इन्हीं मिसाइलों की होगी. क्योंकि जंग अब जमीन पर नहीं, आसमान से लिखी जा रही है.
वीडियो: इज़रायल पर गिरा ईरानी मिसाइल, हिज़्बुल्लाह ने भी किया अटैक, कई लोग घायल




















