ओज़ेम्पिक और वेगोवी. ये दोनों बड़ी ही मशहूर दवाएं हैं. ये टाइप-2 डायबिटीज़ कंट्रोल करती हैं और तेज़ी से वज़न घटाती हैं. ये दवाएं वेट लॉस में इतनी असरदार हैं कि देश-दुनिया के कई सेलेब्रिटीज़ ने इनकी मदद से वज़न घटाया है. ये दवाएं भारत में भी मिलती हैं.
भारत में भी बनेगी 'Ozempic' वाली दवा, दाम भी कम, ऑप्शन भी ज्यादा
ओज़ेम्पिक और वेगोवी तो ब्रांड नेम हैं. असल दवा सेमाग्लूटाइड है. जिसे डेनमार्क की फार्मा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क बनाती है. लेकिन अब तक एक दिक्कत थी. कोई दूसरी कंपनी सेमाग्लूटाइड से दवा नहीं बना सकती थी. क्यों? क्योंकि इसका पेटेंट नोवो नॉर्डिस्क के पास था. लेकिन अब भारत में ये पेटेंट 20 मार्च 2026 के बाद खत्म हो गया है.


वैसे ओज़ेम्पिक और वेगोवी तो ब्रांड नेम हैं. असल दवा सेमाग्लूटाइड है. जिसे डेनमार्क की फार्मा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क बनाती है. लेकिन अब तक एक दिक्कत थी. कोई दूसरी कंपनी सेमाग्लूटाइड से दवा नहीं बना सकती थी. क्यों? क्योंकि इसका पेटेंट नोवो नॉर्डिस्क के पास था. लेकिन अब भारत में ये पेटेंट 20 मार्च 2026 के बाद खत्म हो गया है.
पेटेंट खत्म होने का मतलब है कि अब सेमाग्लूटाइड को बनाने, बेचने और उससे मुनाफा कमाने का हक सिर्फ नोवो नॉर्डिस्क का नहीं रहेगा. दूसरी कंपनियां भी इसके जेनेरिक वर्ज़न्स बना और बेच सकती हैं. पेटेंट खत्म होने का सबसे बड़ा असर कीमतों पर पड़ेगा. अभी ओज़ेम्पिक की कीमत हर महीने करीब 8 से 11 हज़ार रुपए है. जबकि वेगोवी का खर्च लगभग 16 हज़ार रुपए है.
महंगी होने की वजह से ये दवाएं आम लोगों की पहुंच से बाहर हैं. अब पेटेंट खत्म होने के बाद कई कंपनियां इसके जेनेरिक वर्ज़न मार्केट में ला सकेंगी. माना जा रहा है कि ये दवाएं 30 से 70 परसेंट तक सस्ती हो सकती हैं. शुरुआत में इनकी कीमत हर महीने 3 से 5 हज़ार रुपये हो सकती है. लेकिन जैसे-जैसे कंपटीशन बढ़ेगा दवाएं और सस्ती होंगी.

हालांकि, जेनेरिक दवा बनाकर बेचना इतना आसान नहीं होता. भारत में किसी भी जेनेरिक दवा को लॉन्च करने से पहले कंपनियों को साबित करना होता है कि उनका प्रोडक्ट ओरिजिनल दवा जितना ही असरदार है. इसके लिए उन्हें CDSCO में Bioequivalence और Bioavailability स्टडीज़ जमा करनी होती हैं. CDSCO यानी Central Drugs Standard Control Organisation. ये भारत में दवाओं को जांचने और मंज़ूरी देने वाली संस्था है.
द प्रिंट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 से लेकर 2026 की शुरुआत के बीच, CDSCO की एंडोक्रिनोलॉजी एक्सपर्ट कमेटी ने सेमाग्लूटाइड बनाने और बेचने की इच्छा रखने वाली कई भारतीय कंपनियों के एप्लीकेशन का रिव्यू किया. इसके बाद 2026 की शुरुआत में ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने कई कंपनियों को फाइनल अप्रूवल दे दिए. अनुमान है कि एक महीने के भीतर सेमाग्लूटाइड के करीब 50 अलग-अलग ब्रांड मार्केट में आ सकते हैं.
पर एक्सपर्ट्स को ये भी चिंता है कि कहीं इन दवाओं का अनकंट्रोल्ड इस्तेमाल न होने लगे. सेमाग्लूटाइड से बनी दवाएं तभी लेनी चाहिए, जब डॉक्टर इन्हें प्रिस्क्राइब करें. बिना डॉक्टर की सलाह के ये दवाएं लेने से क्या नुकसान हो सकते है? ये हमने पूछा धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल, दिल्ली में जीआई सर्जरी, जीआई ऑन्कोलॉजी, बैरियाट्रिक एंड मिनिमल एक्सेस सर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट, डॉक्टर कपिल कुमार कुर्सीवाल से.

डॉक्टर कपिल कहते हैं कि सेमाग्लूटाइड एक हॉर्मोन बेस्ड दवा है. इसे बिना डॉक्टर की सलाह के लेना रिस्की हो सकता है. व्यक्ति को उबकाई-उल्टी आ सकती है. दस्त या कब्ज़ की शिकायत हो सकती है. पेट दर्द हो सकता है. भूख बहुत कम हो जाती है. कई बार बहुत कमज़ोरी लगती है. अचानक ब्लड शुगर लेवल कम हो सकता है. पैंक्रियाज़ में सूजन आ सकती है. अगर सेमाग्लूटाइड को बिना डॉक्टर से पूछे लंबे समय तक लिया जाए, तो थायरॉइड ग्रंथि में ट्यूमर भी हो सकता है. इसलिए भले ही दवा सस्ती हो जाए. आसानी से मिलने लगे. फिर भी बिना डॉक्टर से पूछे इसे न लें.
वैसे सेमाग्लूटाइड वाली दवाओं की कीमत कम होने का सबसे ज़्यादा फायदा टाइप-2 डायबिटीज़ के मरीज़ों को होगा. जिन्हें ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए लंबे समय तक दवा लेनी पड़ती है. जिन मरीज़ों का वज़न बहुत ज़्यादा है. उन्हें भी दवा सस्ती होने का काफी फायदा मिलेगा.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
वीडियो: सेहत: पेशाब में खून किसी बीमारी की वजह से आता है?











.webp?width=275)
.webp?width=275)
.webp?width=275)








