ऑर्गन ट्रांसप्लांट यानी अंग प्रत्यारोपण. इसमें किसी व्यक्ति के शरीर से एक स्वस्थ अंग निकाला जाता है. फिर उसे दूसरे ज़रूरतमंद व्यक्ति के शरीर में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है. ताकि उसकी जान बचाई जा सके.
ऑर्गन ट्रांसप्लांट में किस मरीज़ का नंबर पहले आएगा, ये कैसे तय होता है?
ऑर्गन ट्रांसप्लांट में किसे प्राथमिकता दी जाएगी, ये कई कारकों पर निर्भर करता है. जैसे मेडिकल इमरजेंसी.


ऑर्गन ट्रांसप्लांट तब किया जाता है, जब किसी व्यक्ति का कोई ज़रूरी अंग काम करना बंद कर देता है और उसे किसी भी तरह ठीक नहीं किया जा सकता. जैसे किडनी, लिवर, दिल, फेफड़े, पैनक्रियाज़ और कॉर्निया. कॉर्निया यानी आंखों के सबसे आगे वाला हिस्सा. इन सभी अंगों का ट्रांसप्लांट किया जा सकता है.

जिस व्यक्ति का अंग लिया जाता है. उसे ‘डोनर’ (Donor) कहते हैं. डोनर ज़िंदा भी हो सकता है और मृत भी.
अब कई मामलों में मरीज़ के घरवाले ही अपना अंग दान कर देते हैं. जैसे किडनी. लिवर का छोटा हिस्सा. मगर कई बार ऐसे अंगों की ज़रूरत होती है जो ज़िंदा व्यक्ति दान नहीं कर सकता. जैसे दिल और कॉर्निया. तब डोनर का इंतज़ार किया जाता है.
लेकिन, ये कैसे तय होगा कि किस मरीज़ को कोई अंग पहले मिलेगा और किस मरीज़ को बाद में. मसलन, अगर दो मरीज़ों को हार्ट ट्रांसप्लांट कराना है. तो उनमें से प्रायोरिटी किसे दी जाएगी? इसका पूरा प्रोसेस क्या है? ये हमने पूछा डॉक्टर अनंत कुमार से.

डॉक्टर अनंत कहते हैं कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट में किसे प्राथमिकता दी जाएगी, ये कई कारकों पर निर्भर करता है. जैसे मेडिकल इमरजेंसी. प्राथमिकता देने का पहला पैमाना ये है कि किस मरीज़ की हालत ज़्यादा गंभीर है. किसका बिना ऑर्गन ट्रांसप्लांट ज़िंदा रहना मुमकिन नहीं है. जिस मरीज़ को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है. उसे ऑर्गन ट्रांसप्लांट में प्रायोरिटी दी जाती है.
जैसे लिवर ट्रांसप्लांट के मामले में मेल्ड स्कोर (MELD) देखा जाता है. ये स्कोर अनुमान लगाता है कि अगले 3 महीनों में किस मरीज़ को लिवर ट्रांसप्लांट की कितनी ज़रूरत होगी. ये स्कोर 6 से 40 के बीच होता है. अगर स्कोर ज़्यादा है तो इसका मतलब मरीज़ की हालत गंभीर है और उसे जल्द से जल्द लिवर ट्रांसप्लांट की ज़रूरत है.
दूसरा कारक है, मेडिकल मैच. ऑर्गन डोनेशन में डोनर और मरीज़ के खून और टिशूज़ के प्रकार का मैच होना बहुत ज़रूरी है. अगर मैच सही हुआ तो ट्रांसप्लांट की सफलता का चांस बढ़ जाता है.
यानी अगर मरीज़ की हालत गंभीर है और डोनर का अंग उसके शरीर से मेल खाता है. तो उस मरीज़ को ट्रांसप्लांट में प्राथमिकता दी जाती है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से जरूर पूछें. ‘दी लल्लनटॉप ’आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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