पहली सिचुएशन. रात में बढ़िया से सोए थे. लेकिन एक ख़राब-सा सपना आया. आप भड़भड़ाकर उठ गए और अचानक डर लगने लगा. दूसरी सिचुएशन. स्टोर रूम में बल्ब जलाकर कुछ ढूंढ रहे थे. तभी लाइट चली गई. चारों ओर घुप्प अंधेरा देखकर डर लगने लगा. तीसरी सिचुएशन. टीवी पर भूत वाली मूवी देखी या भयानक साइकोलॉजिकल थ्रिलर. फिर अगले 2-4 दिन अनजाने-से डर में बीते. ये तीनों ही ऐसी सिचुएशन हैं. जो गाहे-बगाहे हमारे साथ होती ही हैं. इसके अलावा, एग्ज़ाम से पहले डर लगना. रिज़ल्ट देखने से पहले डर लगना. बॉस गुस्से में है और अचानक आपको बुला ले. तब डर लगना. ये सब भी बहुत आम है.
जब हमें डर लगता है तो हमारे शरीर और दिमाग के अंदर इसका क्या असर पड़ता है?
आपने कभी सोचा है कि जब आप डरते हैं, तब दिमाग में क्या हो रहा होता है? शरीर कैसे रिएक्ट करता है? आज यही जानेंगे. एक्सपर्ट से समझेंगे कि डर हमारे शरीर और दिमाग पर तुरंत क्या असर डालता है. अगर डर लंबे समय तक बना रहे, तो इससे सेहत को नुकसान होता है. किस तरह के डर ‘नॉर्मल’ हैं. कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए. और, डर को मैनेज कैसे करें.


पर कभी सोचा है? जब आप डरते हैं, तब दिमाग में क्या हो रहा होता है? शरीर कैसे रिएक्ट करता है? आज यही जानेंगे. एक्सपर्ट से समझेंगे कि डर हमारे शरीर और दिमाग पर तुरंत क्या असर डालता है. अगर डर लंबे समय तक बना रहे, तो इससे सेहत को नुकसान होता है. किस तरह के डर ‘नॉर्मल’ हैं. कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए. और, डर को मैनेज कैसे करें.
डर हमारे शरीर और दिमाग पर तुरंत क्या असर डालता है?
ये हमें बताया नंदिता कालरा ने.

डर लगते ही शरीर तुरंत सर्वाइवल मोड यानी खुद को बचाने वाले मोड में चला जाता है. दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है. सांसें तेज़-तेज़ चलने लगती हैं. मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं. पसीना आने लगता है. दिमाग का अमिग्डाला हिस्सा अलार्म की तरह एक्टिव हो जाता है.
वहीं सोचने-समझने वाला हिस्सा, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं, पीछे चला जाता है. इसी वजह से डर के समय हम घबरा जाते हैं. ठीक से सोच नहीं पाते. कई बार बिना सोचे-समझे तुरंत प्रतिक्रिया दे देते हैं. ये सब शरीर का हमें ख़तरे से बचाने का नेचुरल तरीका है. ख़तरा असली न होने पर भी शरीर यही प्रतिक्रिया देता है.
लंबे समय तक डर में रहने से सेहत को क्या नुकसान होते हैं?
डर या चिंता लंबे समय तक रहने से शरीर और दिमाग थकने लगता है. नींद की क्वालिटी ख़राब हो जाती है. सिरदर्द, पेट की दिक्कत, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है. मेंटल लेवल पर एंग्ज़ायटी, पैनिक अटैक, कॉन्फिडेंस कम होना और डिप्रेशन का ख़तरा बढ़ता है. लगातार डर में रहने से इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है. इससे बार-बार बीमार पड़ने की संभावना रहती है. अगर डर रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगे तो वो सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि सेहत की समस्या बन जाता है.

किस तरह के डर ‘नॉर्मल’ और कब डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी?
नया काम शुरू करने, परीक्षा देने, इंटरव्यू में या किसी अनजान स्थिति का पहली बार सामना करते समय डर लगना स्वाभाविक है. ऐसा डर बिल्कुल नॉर्मल होता है. लेकिन अगर डर बिना वजह आए, बहुत ज़्यादा हो. डर कई दिनों, महीनों या सालों तक बना रहे. अगर डर की वजह से आप बाहर जाना, काम करना या लोगों से मिलना बंद कर दें. तब ये डर बिल्कुल भी नॉर्मल नहीं है.
अगर पैनिक अटैक आएं, सांस घुटने लगे, चक्कर आए या बहुत ज़्यादा बेचैनी हो. तब आपको तुरंत किसी प्रोफेशनल को दिखाना चाहिए. साइकेट्रिस्ट या साइकोलॉजिस्ट से मदद लें. प्रोफेशनल मदद लेना कमज़ोरी नहीं, बल्कि समझदारी है.
डर को कैसे मैनेज करें?
सबसे पहले अपने डर को पहचानिए और उसे नाम दीजिए. डर को दबाने की कोशिश न करें. डर कम करने के लिए धीमी गहरी सांसें लीजिए. 4-6-8 ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ करिए. पहले 4 सेकंड में सांस अंदर लें. अगले 6 सेकंड सांस रोककर रखें. फिर 8 सेकंड में सांस धीरे-धीरे छोड़ें. अपने दिमाग को याद दिलाएं कि आप सुरक्षित हैं.
डाइट में कैफीन और चीनी घटा दें. नींद पूरी लें और अपना रूटीन ठीक रखें. अगर इसके बावजूद डर बार-बार लौटता है. तब किसी साइकोलॉजिस्ट या साइकेट्रिस्ट से बात करें. बात करने से डर कमज़ोर पड़ता है और मन हल्का होता है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
वीडियो: सेहत: किडनी ख़राब होने की दो सबसे बड़ी वजहें!











.webp?width=275)






.webp?width=120)