फेसबुक यूज़र योगेंद्र साहू हिंदू वीर
ने वायरल दावा पोस्ट करते हुए लिखा है-
"पतञ्जलि का विरोध एवम जियो के टॉवर तोड़ने के बाद अगला काम,हिंदी नही चलेगी । पंजाब एवं दिल्ली के सड़कों पर हिंदी में लिखे गए नामों को मिटाया गया । ये किसान हैं ??"
पतञ्जलि का विरोध एवम जियो के टॉवर तोड़ने के बाद अगला काम,हिंदी नही चलेगी । पंजाब एवं दिल्ली के सड़कों पर हिंदी में लिखे गए नामों को मिटाया गया । ये किसान हैं ??
Posted by योगेंद्र साहू हिंदू वीर
on Friday, 8 January 2021
)
ट्विटर यूज़र छत्रपाल सिंह सोलंकी
ने भी यही दावा ट्वीट किया है.
)
इसी तरह के बाकी दावे आप यहां
और यहां
भी देख सकते हैं. (आर्काइव लिंक
) (आर्काइव लिंक
) पड़ताल 'दी लल्लनटॉप' ने वायरल तस्वीरों की पड़ताल की. हमारी पड़ताल में हिंदी में लिखे साइन बोर्ड्स पर कालिख़ पोते जाने वाली तस्वीरें पुरानी निकली. इनका देश में चल रहे किसान आंदोलन से कोई संबंध नहीं है.
कुछ कीवर्ड्स की मदद से सर्च करने पर हमें 25 अक्टूबर 2017 की हिंदुस्तान टाइम्स
की एक रिपोर्ट मिली. रिपोर्ट के मुताबिक़, सिख समुदाय के कुछ कट्टरवादी संगठन साइन बोर्ड्स में पंजाबी से ऊपर हिंदी और अंग्रेजी के लिखे जाने से नाराज़ थे. इसलिए उन्होंने बठिंडा-फरीदकोट नेशनल हाइवे पर इन साइन बोर्ड्स के ऊपर हिंदी में लिखे शब्दों पर कालिख़ पोत दी.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में वायरल तस्वीर
(आर्काइव लिंक
)
हमें वायरल तस्वीरों से जुड़ी ख़बर इंडिया टीवी
न्यूज़ चैनल की 25 अक्टूबर 2017 की एक रिपोर्ट में भी मिली.

इंडिया टीवी की 25 अक्टूबर 2017 की रिपोर्ट में अभी वायरल हो रही तस्वीरें
(आर्काइव लिंक
)
वायरल तस्वीरें सिख सियासत न्यूज़ नाम की वेबसाइट पर भी अक्टूबर 2017 की अलग
-अलग
खबरों में हमें मिली.

सिख सियासत की अक्टूबर 2017 की रिपोर्ट्स में वायरल तस्वीरें
(आर्काइव लिंक
) (आर्काइव लिंक
)
इंडियन एक्सप्रेस
की 28 नवंबर 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक़, पंजाब के संसदीय कार्य मंत्री ब्रह्म मोहिंद्रा ने साइन बोर्ड्स पर कालिख़ पोते जाने की घटना पर विधानसभा में चर्चा के दौरान जानकारी दी कि साइन बोर्ड्स पर पंजाबी को प्राथमिकता दी जाएगी. साथ ही उन्होंने साइन बोर्ड्स पर कालिख़ पोतने वाले लोगों पर दर्ज़ मामले की जांच कराने की भी बात कही थी.

इंडियन एक्सप्रेस की 28 नवंबर 2017 की रिपोर्ट
(आर्काइव लिंक
)
साफ़ है कि साइन बोर्ड्स पर कालिख़ पोते जाने की जिन तस्वीरों को वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन से जोड़ा जा रहा है वो साल 2017 की हैं. नतीजा हमारी पड़ताल में सोशल मीडिया पर साइन बोर्ड्स पर कालिख़ पोते जाने की तस्वीरों के साथ किया जा रहा दावा भ्रामक निकला. हिंदी में लिखे शब्दों पर कालिख़ पोते जाने की ये तस्वीरें अक्तूबर 2017 की है. इसका किसान आंदोलन से कोई संबंध नहीं है.















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