अब घर से काम करने के कई फायदे हैं. पाजामे में बैठे-बैठे मीटिंग सलटा लो. केवल शक्ल सुधारकर रखनी होती है. खाते-खाते काम करना हो, तो उसमें भी दिक्कत नहीं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सब कुछ बमबम ही होता है. वो कहते हैं न, सिक्के के दो पहलू होते हैं. सबके पास 'शोले' के जय जैसा फ्रॉड सिक्का तो होता नहीं. तो बस हम उसी दूसरे पहलू की बात करेंगे कि आखिर 'वर्क फ्रॉम होम' में कौन सी चीज़ें हैं, जिनका ध्यान रखना ज़रूरी है आपके लिए. कौन-सी चीज़ें हैं, जो आपकी मदद कर सकती हैं. क्या हैं, जिनसे आपको सावधान रहने की ज़रूरत है. तो अगर आप भी घर से काम कर रहे हैं, तो ये लिस्ट एक सांस में पढ़ जाइए. देश-दुनिया के साइकोलॉजिस्ट की सलाह छांटकर लाए हैं आपके लिए.
क्या करें?
# सबसे पहले तो घर का एक कोना तय करें, जहां शान्ति से काम किया जा सके. कमरा हो, तो बेहतर. दरवाजा लगाकर बैठिए और काम करिए. लोगों की आवाजाही न हो कमरे में. अगर कमरा पॉसिबल नहीं है, तो कोना पकड़िए. लेकिन उसी कोने में अपना सारा माल-मत्ता रखिए. ये न हो कि लैपटॉप रख लिया और चार्जर भूल गए. या पेन तो रख लिया, लेकिन कॉपी भूल गए.
# जगह तय कर ली? बहुत बढ़िया. अब ये डिसाइड कीजिए कि आप पहनेंगे क्या. हां जी. ऐसा है कि लुंगी, धोती, पाजामा, गाउन में आराम बहुत है. पर ये आपके दिमाग के साथ खिलवाड़ कर देता है. आराम वाले कपड़े घर में पहने जाते हैं. तो दिमाग भी रिलैक्स मोड में चला जाता है. तो अपने दफ्तर के कपड़े निकालिए. नहाइए, धोइए और सलीके वाले कपड़े पहनकर तय समय पर काम करने बैठिए. इससे आपके दिमाग को सिग्नल मिलता है कि आप रेडी हैं काम करने के लिए.
# ये तय कर लीजिए कि आप कितनी देर बाद लंच करेंगे. ऑफिस में जिस समय आपका लंच होता, उसी समय उठिए और लंच करके टाइम पर वापस आ जाइए. अगर इस समय आप खाना खाने के बाद वॉक पर जाते हैं ऑफिस में, 10-15 पन्द्रह मिनट के लिए, तो वो चीज़ घर पर भी फॉलो कीजिए. इससे दिमाग भटकता नहीं है. उसको लगता है कि रुटीन ही चल रहा है.

# कम्युनिकेशन बनाए रखिए ऑफिस वालों से. कोई एक प्लेटफ़ॉर्म चुन लीजिए, जहां पर सबकी एक-दूसरे से बात हो सके. अगर रोज की मीटिंग ऑफिस में करते हैं, तो घर से भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर लीजिए. दिन में एक बार. इससे भी बहुत मदद मिलती है. कई ऐसे वीडियो प्लेटफ़ॉर्म हैं, जिन पर आप फ्री में या थोड़ी सी फीस देकर रजिस्टर कर सकते हैं. जैसे ज़ूम, स्लैक. छोटी टीम हो, तो गूगल हैंगआउट या स्काइप भी चलेगा.
# बीच-बीच में उठकर टहलिए. ऑफिस में भी तो इधर-उधर जाते होंगे आप. कभी पानी लेने, कभी अपने ख़्वाबों की दुनिया में खोए कलीग को याद दिलाने कि भई मेल किया है, चेक तो कर लो. या फिर प्रिंटर से प्रिंट लेने. तो बस वही यहां भी करना है. आठों घंटे, दोनों पहर चौकड़ी मारकर बैठे मत रहिए.
# डॉक्टर थु वी न्गूयेन डरहम यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं. साइकोलॉजी इनका विषय है. अकेले रहने की वजह से लोगों पर क्या असर पड़ता है, इस पर उनकी रिसर्च है अच्छी-खासी. टाइम को दिए इंटरव्यू में वो कहती हैं,
‘हमें सामाजिक इन्टरैक्शन की आदत है. इससे आपस में तालमेल और नजदीकी बढ़ती है.’तो आप अपने कलीग्स से दूर बैठे अकेले काम कर रहे हैं, इसका मतलब ये नहीं कि आप उनसे बिल्कुल ही दूरी बना लें. डॉक्टर न्गूयेन कहती हैं कि अपना एक ऐसा कलीग चुनिए, जिससे आपकी बातचीत बढ़िया होती हो. बेसिकली जो बॉस से आपकी चुगली न खाता हो और जिससे ऑफिस में गपियाने में आपको मजा आता हो, उनसे बीच-बीच में थोड़ा गपिया लीजिए. चाहें तो पांच-दस मिनट का वीडियो कॉल ही कर लीजिए. मूड फ्रेश हो जाएगा. अगर आपके घर में पालतू जानवर हैं, तो शाम में उनको टहलाने निकल लीजिए.

क्या न करें:
# बिस्तर में बैठकर काम मत करिए. आप कहेंगे भई क्यों? हमारा घर. हम तो कैसे भी काम करेंगे. तो ऐसा है कि दिमाग बड़ी शाणी चीज़ है. उसको ये भरोसा दिलाना पड़ता है कि वर्क मोड में आना ज़रूरी है. हम नहीं कह रहे. बारबरा लार्सन हैं. बोस्टन की नॉर्थ-ईस्टर्न यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट पढ़ाती हैं. जो लोग ऑफिस के बाहर से काम करते हैं, उनके बारे में रिसर्च है इनकी. ये बताती हैं कि डिसिप्लीन बनाकर काम करने से प्रोडक्टिव रहा जा सकता है. बिस्तर को सोने के लिए रखिए.# खुद को एकदम अलग-थलग मत करिए दुनिया से. बफर नाम की एक एजेंसी ने 2500 लोगों पर स्टडी की. ये सभी लोग रिमोट लोकेशन से काम करते थे. इन सबकी जो दिक्कतें थीं, उनमें दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत थी अकेलापन. तो अगर आप परिवार के साथ रहते हैं, तो उनसे कटिए मत. बीच-बीच में इंटरैक्शन बना रहना चाहिए.

# अगर आपको घर से काम करने में दिक्कत आ रही है, तो बॉस से छुपाइए मत. अगर आपको लगता है कि आमने-सामने बातचीत करके मामला सुलझाया जा सकता है, तो वीडियो कॉल करना एक अच्छा ऑप्शन है. इसे टालिए मत. हो सकता है शुरू में दिक्कत आए, लेकिन एक-दो बार के बाद आपको भी आदत हो जाएगी.
# यूनिवर्सिटी ऑफ जॉर्जिया में साइकोलॉजी की प्रोफ़ेसर हैं, क्रिस्टन शॉकली. बीबीसी को इन्होंने बताया कि पूरे घर को ऑफिस न बनाएं. लेकिन बाउंड्री ज़रूर तय कर लें. कि ये आपका वर्कस्पेस है. पूरे घर को ऑफिस की तरह ट्रीट करेंगे, तो किसी एक जगह ध्यान नहीं लगेगा. ऋतुराज शांडिल्य (बदला हुआ नाम) फ्रीलांसर हैं. पिछले कई सालों से घर से ही काम कर रहे हैं. इन्होंने बताया कि जब इनको कोई प्रोजेक्ट मिलता है, तब तो ये काम करते ही हैं. साथ ही जब इनके पास प्रोजेक्ट नहीं भी होता है, तब भी ये तय समय पर वर्क डेस्क पर चले जाते हैं. फिर डिस्टर्ब नहीं करता उन्हें कोई. ये आदत काम आती है.

# स्ट्रेस न लें. कोरोना को लेकर लोगों के भीतर गहरा डर बैठा हुआ है. ये चीज़ आपके 'वर्क फ्रॉम होम' के दौरान भी हो सकती है. दो चीज़ें हैं. अगर आपको लगता है कि 'वर्क फ्रॉम होम' की वजह से कहीं आपकी परफॉरमेंस पर असर तो नहीं पड़ेगा, तो अपने बॉस से बात करें. मैनेजर को लूप में रखें. उनसे अपनी चिंता शेयर करें. दूसरा, अगर आपको कोरोना को लेकर स्ट्रेस हो रहा है, तो डॉक्टर निमेश देसाई की सुनिए. ये एक मनोचिकित्सक हैं. साथ ही मानव व्यवहार और सम्बद्ध विज्ञान संस्थान के डायरेक्टर भी हैं. इनके हिसाब से कोरोना से जुड़े डर को हटाने के लिए आप ये चीज़ें कर सकते हैं:
- जो चीज़ आपके कंट्रोल में है, उसपर फोकस कीजिए. जैसे, सफ़ाई. अपने आस-पास सफ़ाई रखिए. कोरोना से बचने के जो सही उपाय बताए जा रहे हैं, उन्हें सख्ती से फॉलो करिए.