महिलाओं का हुस्न बयां करते गाने सैकड़ों सालों से लिखे जा रहे हैं. मगर ऐसे गीत कम ही बने, जिसमें किसी पुरुष की खूबसूरती का ज़िक्र हो रहा हो. उन चुनिंदा गानों में से एक 'छलरे-छलरे वाल' इन दिनों इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है. एक औरत के नज़रिए से लिखा गया ये गाना दशकों पुराना है. रोचक बात ये है कि इंस्टाग्राम पर आने से पहले इसकी धुन पाकिस्तान से होते हुए बॉलीवुड का सफ़र भी तय कर चुकी है.
सैकड़ों साल पुराने 'छलरे छलरे वाल' गाने की कहानी, जिसका नाता पाकिस्तान और सुनील शेट्टी से है!
भारत में जैसे ही 'छलरे छलरे वाल' गाना वायरल हुआ, लोगों को लगा कि उन्होंने ऐसा कुछ पहले भी सुन रखा है.

# क्या है ‘छलरे छलरे वाल’ का मतलब?
'छलरे-छलरे वाल' का सरल मतलब छल्ले जैसे घुंघराले बालों से है. इसलिए गाने के डिटेल में जाने से पहले इसके लिरिक्स समझिए, जो इस प्रकार है,
तू सांवल फूल कस्तूरी
(तुम सांवले रंग के ऐसे खूबसूरत फूल हो, जिसमें कस्तूरी जैसी खुशबू है)
तेरी थी गई बहु मशहूरी
(तुम्हारी खूबसूरती की शोहरत बहुत दूर तक फैल गई है)
झा-झा ते, हर झा ते, पाए देंदे लोक मिसाल
(जहां-जहां भी लोग तुम्हें देखते हैं, तुम्हारे हुस्न की मिसाल देते हैं)
छलरे-छलरे वाल, मोंढे रखदैं काली शॉल
(तुम्हारे घुंघराले और लहराते हुए बाल हैं, कंधों पर काली शॉल है)
हथ चेनै रत्ता रुमाल, तेरियां रीसां कौन करे?
(हाथों में लाल रुमाल है, तुम्हारी बराबरी कौन करेगा?)
# पाकिस्तान से है खास नाता
गाने का अकेले यही हिस्सा काफी है ये बताने के लिए इसमें एक प्रेमिका अपने महबूब के हुस्न की तारीफ़ कर रही है. आगे इस तरह के और स्टेंजा हैं, जहां लड़के के रंग-रूप पर बात की गई है. ऊपरी नजरों से देखें तो लोगों को ये भ्रम हो सकता है कि ये पंजाबी लिरिक्स हैं. मगर ये पूरा सच नहीं. असल में ये पाकिस्तान की सरायकी भाषा का लोकगीत है. चूंकि इसे वहां के पंजाब प्रांत में बोला जाता है, इसलिए इसमें पंजाबी, पश्तो और उर्दू का मिश्रण देखने को मिलेगा. भारत में भी राजस्थान और पंजाब के कुछ बॉर्डर वाले इलाकों में सरायकी बोलने वाले लोग मिल जाते हैं.
# सैकड़ों साल पुरानी धुन
'छलरे छलरे वाल' सरायकी भाषा का एक ऐसा लोकगीत है, जिसके लिरिक्स तो समय के साथ बदलते रहे. मगर धुन बिल्कुल वैसी ही रही. लोकगीतों के साथ अक्सर ऐसा होता है. यही कारण है कि आपको ऐसी मिलती-जुलती धुन कुछ अन्य गानों में भी सुनाई देगी. कहते हैं कि ये मैलडी सरायकी जनसंख्या इलाकों में सैकड़ों सालों से चली आ रही है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इस धुन को आगे बढ़ाते रहे. लेकिन 'छलरे छलरे वाल' गाने का अस्तित्व करीब 60 साल पहले आया था.
# पाकिस्तान में कैसे पहचान मिली?
शुरुआत में ये गाना किसी अन्य लोकगीत की तरह एक सीमित दायरे में ही पॉपुलर हुआ. मगर पाकिस्तान में इसे बड़ी पहचान तब मिली, जब 2016 में वेटरन सरायकी सिंगर मुहम्मद हुसैन बंदियालवी ने 'छलरे छलरे वाल' का अपना वर्जन रिलीज़ किया. थार प्रोडक्शन के लेबल तले उन्होंने इसका वीडियो सॉन्ग शेयर किया था. हालांकि वीडियो की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी मगर इसके लिरिक्स और धुन ने लोगों का खूब ध्यान खींचा. पाकिस्तान में इस गाने को अगली ख्याति मिली 2018 में. तब वेटरन सिंगर सफाउल्लाह खान रोखरी ने अपने म्यूजिक लेबल रोखरी प्रोडक्शन तले इसका स्टूडियो वर्जन रिलीज़ किया. उसे भी लोगों ने काफी पसंद किया. अगर आप इन दोनों वर्जन की तुलना करें तो उनके लिरिक्स में थोड़ा फर्क नज़र आएगा. यही इस गाने की सबसे खास बात है. हर पीढ़ी और व्यक्ति इसे अलग नजरिए से देखता है. इसलिए धुन सेम रहते हुए भी इसके शब्दों में बदलाव आते रहते हैं.
# अब क्यों वायरल हुआ ‘छलरे छलरे वाल’?
'छलरे छलरे वाल' नई पीढ़ी तक पहुंची, इसका सबसे बड़ा श्रेय इंस्टाग्राम को जाता है. दरअसल, पाकिस्तानी सिंगर शेंजी सिबल ने ये गाना गाते हुए एक रील शेयर की थी, जो पड़ोसी मुल्क में फट पड़ी. धीरे-धीरे ये भारत में भी अपनी पहुंच बनाने लगी. पर यहां ये गाना तब वायरल हुआ, जब पंजाबी सिंगर सुंनंदा शर्मा ने अपनी आवाज़ में इसे रिकॉर्ड किया. फिर तो लोगों ने जितना स्क्रॉल किया, इस गाने की पहुंच बढ़ती चली गई.
# ये गाना तो कहीं सुना है…
पर एकाएक लोगों को ध्यान आया कि ये धुन तो सुनी-सुनी लग रही है. गौर किया तो पता चला कि सुनील शेट्टी और अक्षय कुमार की क्लासिक फिल्म 'मोहरा' का 'न कजरे की धार' भी ऐसा ही है. 1994 में रिलीज़ हुई उस मूवी में इसे सुनील शेट्टी और पूनम झावर पर फिल्माया गया था. पंकज उधास और साधना सरगम की आवाज़ में ये गाना पापा लोगों की पहली पसंद हुआ करता था. ऐसे में नई पीढ़ी ने ये कहना शुरू कर दिया कि ‘छलरे छलरे वाल’ असल में 'न कजरे की धार' की नकल है. लेकिन ये सच नहीं.
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# अक्षय-सुनील शेट्टी की फिल्म से कनेक्शन
दरअसल, 'न कजरे की धार' भी 1994 का गाना नहीं है. इसे तो उस दौर में तैयार कर लिया गया था, जब सुनील शेट्टी का जन्म भी नहीं हुआ था. ये गाना ओरिजिनली आइकॉनिक म्यूजिक कम्पोजर्स जोड़ी कल्याण-आनंद का है. उन्होंने 'डॉन', 'ज़ंजीर' और 'मुकद्दर का सिकंदर' जैसी कई बड़ी फिल्मों में काम किया है. 1960 में जब वो इंडस्ट्री में नए-नए आए थे, उन्होंने एक फिल्म के लिए कुछ गाने तैयार किए थे. 'न कजरे की धार' भी उनमें से एक था. इंदीवर ने उसी दौर में इसके लिरिक्स लिखे थे. वहीं इसे ओरिजिनली मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था. मगर मामला तब फंसा, जब वो फिल्म बनी ही नहीं. ऐसे में ये गाना करीब 34 सालों तक धूल फांकता रहा.
# 34 साल बाद नया जीवनदान मिला
फिर आया 1993-94 का दौर. राजीव राय 'मोहरा' बना रहे थे. इसके गानों के लिए उन्होंने कल्याण जी के बेटे वीजू शाह को अप्रोच किया. वीजू ‘न कजरे की धार’ वाला धुन भूले नहीं थे. इसलिए उन्होंने 34 साल बाद उस पुरानी रिकॉर्डिंग को बाहर निकाला. फिर उसे पंकज उधास और साधना सरगम की आवाज़ में दोबारा रिकॉर्ड करवाया. उन्होंने गाने के सिंगर्स जरूर बदले. मगर इस बात का ध्यान रखा कि इसकी आत्मा जस-की-तस रहे. एक रोचक बात ये भी है कि 'छलरे छलरे वाल' जहां एक लड़की के नजरिए से लिखा गया है, वहीं 'न कजरे की धार' का कथानक एक पुरुष होता है.
# पहले मुर्गी आई या अंडा?
तो बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती है कि पहले मुर्गी आई या अंडा? यानी 'न कजरे की धार' और 'छलरे छलरे वाल' में से किसने दूसरे की नकल की है? तो जवाब है- “किसी ने नहीं.” असल में दोनों की प्रेरणा सैकड़ों साल पुराना वही सरायकी धुन है, जिसे गुनगुनाते हुए हर पीढ़ी ने पन्ने पर अपना नज़रिया लिखा. संभव है कि 50 साल बाद की पीढ़ी जब सोशल मीडिया पर डूम स्क्रॉलिंग कर रही होगी, तब उन्हें भी इसका कोई अलग ही वर्जन सुनने को मिले।
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