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तेरे इश्क़ में : पुरुष के पैरों पर प्रेमिका का शीश (Tere Ishk Mein Movie Review)
"रांझणा" और "सैय्यारा" के क्रम में आई director Anand L Rai की ये रोमैंटिक ड्रामा कैसी है जाने हमारे इस Tere Ishk Mein Movie Review में. फ़िल्म की कहानी, Dhanush और Kriti Sanon की एक्टिंग और तमाम अच्छे-बुरे पहलुओं पर बात.


डायरेक्टर आनंद एल राय की "तेरे इश्क में" एक बेहद डिप्रेसिंग और टॉक्सिक फ़िल्म है. यह मनोरंजन में कच्ची है. किसी अनूठे मूवी एक्सपीरियंस में भी तब्दील नहीं हो पाती. जो फ़िल्म का "एंटरटेनमेंट" या ज़ोन है वो अवसादपूर्ण है. अगर किसी को सिर्फ आंसू बहाने वाली और टॉक्सिक लव स्टोरीज़ में रुचि है तो ये फिल्म उनके लिए है. फिर जरूर देंखें. अलावा इसके, फ़िल्म में कोई वैल्यू मैं ढूंढ न सका.
ए आर रहमान और इरशाद कामिल के गीतों से युक्त एक रोमैंटिक ड्रामा होने के इतर यह एक ट्रैजिक और हॉरर एक्सपीरियंस भी मेरे लिए हुई. कुछ पल ऐसे भी आए जब सीट से उठकर चले जाने का विचार आया. मेरे जीवन में देखी सबसे मुश्किल फिल्मों में से एक. ऐसा फ़िल्म की थीम की वजह से भी है जो विचलित करने वाली है और ऐसा फ़िल्म के क्राफ्ट के स्तर पर कन्फ्यूजिंग और कमजोर होने के चलते भी है.
यह कहानी “रांझणा” के यूनिवर्स में घटती है. कुंदन और जोया की कहानी से संभवतः एक पीढ़ी बाद. भगवान महादेव और उनकी प्रिया गंगा को समर्पित होते हुए फ़िल्म फ्लाइट लेफ्टिनेंट शंकर गुरुक्कल (धनुष) की कहानी में प्रवेश करती है. वह अपने नाम के अनुरूप शिव का रूप ही है. हर समय गुस्से में रहने वाला. जिसे काबू में कर पाना चीनी सेना के लिए भी मुश्किल हो रहा है (एक मज़ेदार और दमदार ओपनिंग सीन में वो चीनी सैनिकों की चाल को नाकाम करता है और उन्हें कहता है - It was nice talking to you "neighbors.") और स्वयं अपने ऑफिसर्स के लिए भी.
फिर कहानी फ्लैशबैक में जाती है. मुक्ति से मिलते हैं. दिल्ली के एक कॉलेज में पढ़ रही है, जहां का छात्रसंघ अध्यक्ष शंकर है. मुक्ति कॉलेज में 2200 पन्ने का एक पेपर प्रस्तुत कर रही होती है. कहती है कि - आधुनिक मनोविज्ञान में हिंसा का उपचार किया जा सकता है. हिंसा अपेंडिक्स की तरह है जिसे शरीर से काटकर फेंका जा सकता है. लेकिन कॉलेज का पैनल बोलता है कि यह संभव नहीं. अगर आपको लगता ही है तो कोई जीता जागता सबूत लेकर आओ. तो वो शंकर को साधने का प्रयास करती है. मुक्ति को सिर्फ अपने पेपर के सलेक्ट होने से मतलब है. लेकिन शंकर गंभीर है. प्यार हो जाता है. और प्यार ऐसा, जिसे लेकर उसने चेताया भी था कि - “मेरा प्यार ऐसा है कि पूरी दिल्ली फूंक दूंगा.”
आगे जाकर यह एक ड्रामेटिक, इंटेंस और डराने वाले प्यार का रूप ले लेता है. मुक्ति ( कृति सेनन जिन्हें क्रेडिट्स में त्रुटिपूर्ण ढंग से क्रिती लिखा गया है उनका बढ़िया काम है. वे खुद भी विक्षिप्त हो जाती हैं और हमें भी खींच लेती हैं अपनी विक्षिप्तता में). मुक्ति एक ट्रॉमा से पीड़ित इंसान का इस्तेमाल करती है और फिर नतीजे भुगतती है.
फिल्म में मुक्ति और शंकर का ट्रैक, शिव-पार्वती, शिव-गंगा की कहानियों से अपने प्राण लेता है. एक सीन आता है जहां बहुत बरस बाद मुक्ति को पता चलता है कि शंकर अब फ्लाइट लेफ्टिनेंट बन गया है. वो अस्पताल में बिस्तरग्रस्त अपने पिता से कहती है - “पापा मुझे शंकर का पता चला है, मुझे जाना होगा.” जैसे गंगा या पार्वती अपने पिता से कह रही हो कि मुझे शिव के पास जाना होगा.
फ़िल्म का एक सीन अद्भुत है -
शंकर बनारस जाता है अपने पिता (प्रकाश राज) का दाह संस्कार करने. वो बेसुध है. जीवन जैसे खत्म हो गया है. होश गुम. जैसे “मसान” में शालू की मृत्यु के बाद दीपक का गुम होता है. एक दोस्त भी शंकर का साथ देने के लिए है. तभी फ्रेम में एंट्री होती है “रांझणा” के मुरारी की. जो अब उम्रदराज हो चुके हैं. पंडित बन चुके हैं. और यह ओपनिंग सीन के बाद फिल्म का दूसरा और सबसे ज्यादा थ्रिलिंग पल होता है. वो आते हैं और वहां बैठे पंडित से कहते हैं - “इनकी क्रिया हम करेंगे.” बैठते हैं और संवाद घटता है -
पं. मुरारी - मृतक का नाम?
शंकर का दोस्त - राघव.
पं. मुरारी - अबे शंकर की धरती पर राघव काहे मृत होगा बे!!
(फिर शंकर के पात्र की ओर इशारा करते हुए कहते हैं) मृतक का नाम पूछ रहे हैं. (मानो, पहचान लिया हो कि इस प्रेमी की देह जरूर बैठी है, लेकिन अंदर इसी का मरण हुआ है)
शंकर का दोस्त - शंकर (नाम है).
पं. मुरारी - वाह रे भोले! सारी दुनिया को देता है. खुद को ही नहीं दे पाया.... मुक्ति.
हिमांशु शर्मा और नीरज यादव का लेखन यहां अच्छा लगता है. इस मीठे मोतीपाक़ के टुकड़े पर चांदी का वर्क बनता है पं. मुरारी का अगला संवाद कि - “अपने इश्क में इतना जल कि मुक्ति खुद याचना करे कि स्वीकाररररर करो मुझे.”
"तेरे इश्क में" में एक संवाद है जिसमें शंकर मुक्ति के सिर पर गंगाजल गिराते हुए कहता है - "शंकर करे तेरे बेटा हो. तुझे भी पता चले कि इश्क में जो मर जाते हैं, वो भी किसी के बेटे होते हैं." यहां तक आते आते फ़िल्म अनजाने-जाने ढंग से लड़कियों को स्टिगमैटाइज़ सा करने लगती है कि इन्हीं की वजह से लड़के बर्बाद होते हैं और सारा दोष इन्हीं का होता है. यूं फ़िल्म पुरुषों-लड़कों के पॉइंट ऑफ व्यू से बनी हो जाती है.
शंकर और मुक्ति की प्रेम कहानी में इतना पैशन कभी स्थापित हो नहीं पाता.
शंकर का कैरेक्टर कभी स्पष्ट नहीं हो पाता. एक पासिंग रेफरेंस दिया जाता है कि वो इतना गुस्से में क्यों रहता है. उसे एक ट्रॉमा है और वो अपने दिमाग पर काबू नहीं रख पाता. एक लिहाज से वो मनोरोगी भी हुआ. फिर उसके परसेप्शन को इतने तंदुरुस्त ढंग से क्यों मान्यता दी गई? आप कृति के किरदार को बुरा भी नहीं बनाते, लेकिन फिर दोष उसके सिर भी डालते हैं. उसकी मजबूरियां भी हैं, कुछ परिस्थितियां भी हैं और थोड़ी बहुत गलतियां भी हैं.
शुरू में फिल्म इस विमर्श को खड़ा करती प्रतीत होती है कि - हिंसा को क्योर किया जा सकता है. लेकिन आगे उसमें कोई संधान नहीं मिलता.
फ़िल्म जहां-जहां अपने डरावने और टॉक्सिक प्यार वाले क्षणों में होती है, वही उसका सच होता है. लेकिन बीच बीच में जहां कॉमेडी डालने की कोशिश होती है या जहां पात्र मैड से सामान्य हो जाते हैं, वह अनिरंतरता का काम करती है. एक सीन में शंकर मुक्ति के दोस्त पर पेट्रोल गिराकर आता है. अगले ही पल घर आकर सामान्य युवक की तरह पिता के साथ खाना खा रहा होता है. एक क्षण में वो मनोरोगी सा है, दूसरे क्षण में सामान्य सा है. इस ट्रांजिशन के बीच कैसे रिएक्ट करें, समझ नहीं आता.
फिल्म में कई हिंसक, सुसाइडल संवाद हैं, जो बहुत नेगेटिव से हैं. मन खराब करते हैं और विचार भी. उसे मनोरंजन नहीं कहा जा सकता.
विनीत कुमार सिंह ने वायुसेना के अधिकारी वी. शेखावत का रोल किया. उनके ओपनिंग सीन में एक्सेंट, अंग्रेजी, फ्लो, कमांड देने की गति सब कमज़ोर से हैं. उनमें से वायुसेना अधिकारी का कैरेक्टर उभर नहीं पाता.
धनुष का पात्र फ्लाइट लेफ्टिनेंट है लेकिन उनकी चाल टेढ़ी मेढ़ी, वाचाल, गैर-अनुशासित है. उसका वायुसेना में सलेक्शन कैसे हुआ, यह प्रश्न उठता है.
फिल्म पागल प्रेमियों के दिमाग में हमें पहुंचाने का प्रयास करती है. लेकिन इसका क्राफ्ट और लेखन बेतरतीब सा है. बीच में वो टिपिकल फॉर्म्यूलाज़ का इस्तेमाल भी करती है. बीच में वो मनोरोग, अवसाद और सुसाइड जैसी थीम्स में सेंसेटिव रहने के बजाय ब्लंट और डायलॉगबाज़ बनी रहती है. प्रेमिकाओं को वो अंततः प्रेमी के पैरों में गिराने का काम भी करती है.
Film: Tere Ishk Mein । Director: Aanand L. Rai । Writer: Himanshu Sharma, Neeraj Yadav । Cast: Dhanush, Kriti Sanon, Prakash Raj, Zeeshan Ayyub । Run Time: 2hr 47min । Release: 28 November, 2025 । Watch at: Cinemas
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