इस स्टोरी को करने के बाद हमें Pisceann Pictures नाम के प्रोडक्शन हाउस से एक मैसेज आया. इस मैसेज में प्रोडक्शन हाउस ने 'पहरेदार पिया की' के मेकर्स पर उनका कांसेप्ट कॉपी किए जाने का आरोप लगाया है. उन्होंने बताया कि इस शो का कांसेप्ट उनकी आगामी फिल्म 'सांकल' से कॉपी किया गया है. हमने इस मामले की तह तक जाने की कोशिश में इस फिल्म के डायरेक्टर देदीप्य जोशी से बात की तो उन्होंने हमें बताया कि उनकी फिल्म 'सांकल' आज़ादी के समय राजस्थान-पाकिस्तान बॉर्डर पर बसे कुछ गांवों में चलाई जा रही एक कुप्रथा की बात करती है. इस प्रथा को फॉलो करने वाले मेहर जाति के लोग थे, जो इन गांवों में निवास करते थे. इन गांवों के लोग अपने लड़कों की शादी तो दूसरे समाज में कर सकते थे, लेकिन लड़कियों की शादी अपने समाज में ही करनी होती थी. इस सिस्टम की वजह से गांव के लड़कों की शादी तो हो जाती थी, लेकिन लड़कियां कुंवारी रह जाती थी. इस तरह की समस्याओं से पीछा छुड़ाने के लिए गांव के लोगों ने एक नई प्रथा ईजाद की. इसमें गांव के कम उम्र के लड़कों की शादी गांव की ही उम्रदराज़ कुंवारी रह गई लड़कियों से कर दी जाती थी.
'सांकल' फिल्म का पोस्टरलेकिन धीरे-धीरे इस प्रथा का दूसरा और खतरनाक पहलू नज़र आने लगा. कई बार ससुर और बहु के बीच अनैतिक संबंध पाए गए तो कभी आत्महत्याओं के दौर. इस तरह की प्रथा समाज के लिए खतरनाक और बेहद शर्मनाक है.
देदीप्य हमें आगे बताते हैं,
'इस विषय से जुड़ा हुआ एक आर्टिकल मैंने इंडिया टुडे मैगज़ीन के 2002 संस्करण में पढ़ा और यहां से मैंने इसके बारे में रिसर्च करना शुरू किया. भरपूर रिसर्च के बाद इस सामाजिक कुप्रथा पर मैंने फिल्म बनाने का फैसला किया.'इस विषय पर देदीप्य ने फिल्म बनाई, उसे नाम दिया 'सांकल'. यह फ़िल्म अगस्त 2015 में बनकर तैयार हो गई. फिल्म में कोई कमर्शियल एंगल न होने की वजह से इसे अब तक भारत में रिलीज़ करने के लिए कोई भी वितरक तैयार नहीं हुआ. इन सब के बीच इस फिल्म को 45 फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाया गया जहां इसे 15 अवार्ड्स से नवाज़ा भी जा चुका है.'
इंडिया टुडे अक्टूबर 2002 एडिशन. जहां से देदीप्य ने ये खबर पढ़ी.
फिल्म 'सांकल' को अब तक 45 फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाया जा चुका है जहां इसने 13 अवार्ड जीते हैं.इन सबके बीच सोनी टीवी पर एक शो आया 'पहरेदार पिया की'. जिस पर इस फिल्म के मेकर्स ने स्टोरी आईडिया चुराने के साथ ही उस कांसेप्ट को गलत तरीके से पेश करने का भी इल्ज़ाम लगाया है. जैसा कि देदीप्य ने हमें बताया कि उन्होंने वो फिल्म इस सामाजिक कुप्रथा की आलोचना करने के लिए बनाई थी, जबकि इस सीरियल में इसे एक नए और एक्जौटिक कांसेप्ट की तरह दिखाया जा रहा है. ये टीवी पर कुछ नया दिखाने की कड़ी में उठाया हुआ कदम है.

सीरियल 'पहरेदार पिया की' के एक दृश्य में खुद से बड़ी उम्र की लड़की की फोटो खींचता हुआ 9 साल का बच्चा.
फिल्म 'सांकल' में बच्चे और उससे उम्र में बड़ी पत्नी के बीच के रिश्ते की समस्याओं पर बात की जा रही है. जबकि टीवी पर इसे एक स्वस्थ और पवित्र रिश्ते के रूप में दिखाया जा रहा है. यहां एक 9 साल का बच्चा अपनी उम्र से तक़रीबन 15 साल बड़ी लड़की के पीछे जाकर उसकी तस्वीरें खींचता नज़र आता है. उसको स्टॉक करता है. जो देखने में बहुत अजीब और डरावना लगता है. उनकी फिल्म जहां समाज में फैल रही इस गलत प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए बनी थी, वहीं इस तरह के शो इन प्रथाओं को बढ़ावा देने का काम करेंगे. भले ही वो डिस्क्लेमर दिखा दें कि "ये सीरियल किसी भी तरह से बाल विवाह को बढ़ावा नहीं देता.''
लेकिन ये सीरियल जो कर रहा है वो सबको नज़र आ रहा है. इस सीरियल में अभिशाप को वरदान की तरह दिखाया जा रहा है जो कि ग़लत है.'
हमने ये पूरा मामला यहां पर आपको बता दिया है. अब आप खुद ही तय करें कि कौन गलत और कौन सही है.
यहां देखें फिल्म 'सांकल' का ट्रेलर :





















