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झोपड़पट्टी में रहने वाले दो बच्चों की ज़िद, मेहनत और जुझारूपन की कहानी

300 रुपए का पिज़्ज़ा खरीदने के लिए इतना संघर्ष!

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ये फिल्म तमिल मूवी 'काका मुट्टई' का रीमेक है.
मराठी सिनेमा को समर्पित इस सीरीज़ 'चला चित्रपट बघू या' (चलो फ़िल्में देखें) में हम आपका परिचय कुछ बेहतरीन मराठी फिल्मों से कराएंगे. वर्ल्ड सिनेमा के प्रशंसकों को अंग्रेज़ी से थोड़ा ध्यान हटाकर इस सीरीज में आने वाली मराठी फ़िल्में खोज-खोजकर देखनी चाहिए... 
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जब भी किसी अच्छी फिल्म का रीमेक बनता है ये आशंका बनी रहती है कि मूल फिल्म के साथ न्याय नहीं हो पाएगा. ऐसा रेयरली ही होता है कि रीमेक से सारे ही लोग संतुष्ट हो जाएं. आज हम जिस फिल्म की बात करने वाले हैं उसके केस में ऐसा यकीनन हुआ है. आज की फिल्म 'हाफ तिकिट' 2015 में आई तमिल फिल्म 'काका मुट्टई' का ऑफिशियल रीमेक है. और क्या शानदार रीमेक है! ओरिजिनल तमिल सेटअप को मराठी में इस खूबसूरती से एडाप्ट किया गया है कि फिल्म विजुअल ट्रीट बन गई है.
'हाफ तिकिट' कहानी है मुंबई की झोपड़पट्टी में रहते दो भाइयों की. दो बच्चे जो रेलवे ट्रैक पर बिखरा पड़ा कोयला इकट्ठा करके बेचते हैं. अपनी मां की मदद करते हैं. परिवार में इन दो बच्चों के अलावा मां और दादी है. पिता किसी नामालूम वजह से जेल में है.
फिल्म का पोस्टर.
फिल्म का पोस्टर.

झोपड़पट्टी में जीवन जीते लोगों की ज़िंदगियों में जितनी भी लानतें होती हैं वो सब इन बच्चों के जीवन में भी हैं. संसाधनों का भयानक अभाव, रोज़ का संघर्ष, अपमान का दंश सबकुछ. बावजूद इसके ये दोनों बच्चे ऊर्जा का स्त्रोत हैं. कोयला चुनने के अपने बोरिंग काम में भी रंग भरे रहते हैं. और फिर एक दिन उनकी ज़िंदगी में आता है पिज़्ज़ा.
उनकी बस्ती के ठीक सामने, सड़क पार, एक नया पिज़्ज़ा आउटलेट खुला है. पिज़्ज़ा. एक दुर्लभ चीज़. इस पिज़्ज़ा को हासिल करना ही अब उनका मकसद है. लेकिन पिज़्ज़ा आता है 300 रुपयों का. रोज़ाना कोयला बेचकर 10 रुपए कमाने वाले इन बच्चों के लिए 300 रुपए जुटाना बहुत बड़ा टास्क है.
सड़क पार का पिज़्ज़ा कैफे.
सड़क पार का पिज़्ज़ा कैफे.

ये बच्चे खुदमुख्तार हैं. अपने सपने को पूरा करने के लिए खुद लड़ना जानते हैं. इनमें फ्री का खाना न खाने जितना स्वाभिमान भी है और इसका एहसास भी कि चोरी-चकारी, झपटमारी ग़लत काम होते हैं. ये अमीर बच्चों के खिलौनों को हसरत से देखते तो हैं लेकिन उस नज़र में कौतुहूल होता है, महरूमी की कसक नहीं. महीनेभर तक ढेर सारा काम करने के बाद ये बच्चे किसी तरह ज़रूरी रकम जुटा लेते हैं. लेकिन क्या उन्हें पिज़्ज़ा हासिल हो पाता है? बच्चों का छोटा सा मिशन क्योंकर एक बड़ा स्कैंडल बन जाता है? क्यों एक मासूम ख्वाहिश के बीच पॉलिटिक्स और मीडिया घुस आती है? और क्या वो पिज़्ज़ा सच में ही इतनी जद्दोजहद के काबिल था? इन सब सवालों के जवाब फिल्म देखकर जानिएगा. यकीन मानिए, बिल्कुल निराश नहीं होंगे आप.
फिल्म के कई सीन प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़े बन पड़े हैं. एक सीन में एक रिपोर्टर इन बच्चों से जुड़ी खबर की रिपोर्टिंग कर रही होती है. पास से ही ये बच्चे गुज़रते हैं. वो फ्रेम में न आ जाएं इसलिए उन्हें डांट कर भगा दिया जाता है. विडंबना का इससे उम्दा उदाहरण और क्या ही होगा!
लेडी रिपोर्टर वाला सीन.
लेडी रिपोर्टर वाला सीन.

'हाफ तिकिट' बेहद सिंपल कहानी है जो बेहद सादे ढंग से कही गयी है. बावजूद इसके ये कई गंभीर मुद्दों को हंसते-खेलते छू जाती है. जैसे हमारे मुल्क में मौजूद अमीर-गरीब के बीच की दरार, ग्लोबलाइज़ेशन के नुकसान, गहरा धंसा हुआ भ्रष्टाचार जैसा बहुत कुछ.
डायरेक्टर समीर कक्कड़ ने तमिल फिल्म को मराठी में बदलते वक़्त इस बात का ख़ास ध्यान रखा है कि इसकी आत्मा अपनी जगह कायम रहे. इसका मराठीकरण करते वक़्त उन्होंने हर छोटी डिटेलिंग पर ध्यान दिया है. ये फिल्म जितनी समीर कक्कड़ की है उतनी ही सिनेमेटोग्राफर संजय मेमाने की भी है. उन्होंने बेहद खूबसूरती से असल मुंबई को कैमरे में कैद किया है. लगभग हर फ्रेम शानदार है. बड़े से नाले के किनारे स्थित झोपड़पट्टी, वहां की झुग्गियां, पानी के बड़े-बड़े पाइप्स, रेलवे ट्रैक, कारशेड्स सब कुछ विश्वसनीय ढंग से फिल्माया गया है. अक्सर ऐसा लगता है कि आप फिल्म नहीं देख रहे, उसके अंदर हैं.
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एक्टिंग की बात की जाए तो ये सिर्फ और सिर्फ उन दो बच्चों की फिल्म है. शुभम मोरे और विनायक पोतदार. इन दोनों ने इस फिल्म को पूरी कामयाबी से कैरी किया है. हर इमोशन को बेहद सटीक ढंग से अभिव्यक्त किया है. फिर चाहे वो छोटी सी ख्वाहिश पूरी न होने का फ्रस्ट्रेशन हो या थप्पड़ खाने से हुए अपमान का दंश. पहली बार पिज़्ज़ा देखते वक़्त जो चमक इन दोनों के आंखों में उभरती है उसे चाहे तो आप हाथ बढ़ाकर छू सकते हैं. सड़कों पर ज़िंदगी बिताने वाले बच्चों में जीवन के प्रति जो एक लापरवाही होती है वो इन दोनों के अंग-अंग से टपकती है. शुभम मोरे तो इस फिल्म के बाद शाहरुख ख़ान की रईस में भी नज़र आए थे. शाहरुख़ के बचपन का रोल किया था उन्होंने.
रईस में शुभम मोरे.
रईस में शुभम मोरे.

मां के रोल में प्रियंका बोस-कामत बेहद उम्दा कास्टिंग का नमूना है. वो जब भी स्क्रीन पर आती हैं प्रभावित कर जाती हैं. यही बात आप दादी बनी उषा नाईक के बारे में भी कह सकते हैं. अन्य किरदार भी अपनी-अपनी भूमिकाओं में फिट हैं. फिर चाहे वो रेलवे के गैंगमैन बने भालचंद्र कदम हो या फिर लोकल नेता बने श्रीकांत यादव.
झुग्गियों में जीने वाले बच्चों का जीवन संघर्ष का एक कभी न ख़त्म होने वाला हादसा होता है. छोटी-छोटी चीज़ों के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है. छोटी ख्वाहिशों के लिए बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ती है. बावजूद इसके ये बच्चे अपने हिस्से आई इस भयानक विषमता का हंसते-हंसते सामना करते हैं. रोज़ लड़ते हैं, टूटते हैं, बिखर जाते हैं लेकिन दूसरे दिन फिर खड़े हो जाते हैं. इसी ज़िद, मेहनत और जुझारूपन की कहानी है 'हाफ तिकिट'. ज़रूर देखिएगा.


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