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सेक्स एजुकेशन पर इससे सहज, सुंदर फिल्म भारत में शायद ही कोई और हो!

हिंदी सिनेमा भले ही ढर्रे से चिपका दिखाई दे रहा हो, लेकिन रीजनल भाषाओं में बहुत बढ़िया काम हो रहा है. मराठी सिनेमा तो इस मामले में जैसे मशाल लेकर आगे चल रहा है. फ़िल्में कैसी होनी चाहिए इसका ट्यूटोरियल हिंदी वालों को मराठी फिल्मकारों से लेना चाहिए. पिछले दशक भर में नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फिल्मों की लिस्ट पर नज़र भर मार लीजिए. ज़्यादातर फ़िल्में मराठी की दिखाई देंगी. मराठी सिनेमा को समर्पित इस सीरीज़ ‘चला चित्रपट बघू या’ (चलो फ़िल्में देखें) में हम आपका परिचय कुछ बेहतरीन मराठी फिल्मों से कराएंगे. वर्ल्ड सिनेमा के प्रशंसकों को अंग्रेज़ी से थोड़ा ध्यान हटाकर इस सीरीज में आने वाली मराठी फ़िल्में खोज-खोजकर देखनी चाहिए. 

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सेक्स. ऐसा शब्द जिससे पूरा भारतवर्ष बिदकता है. जिसका ज़िक्र परदे में करने की सलाह दी जाती है. जिसके ऊपर पब्लिक स्पेस में बात करना लगभग पाप माना जाता है. सेक्स के वजूद का सीधा संबंध संस्कृति के वजूद से जुड़ा है. जिस-जिस मात्रा में इस शब्द का ज़िक्र बढ़ता है, उसी मात्रा में संस्कृति के नष्ट होने का ख़तरा भी बढ़ता है. जब बड़ों में ही सेक्स को लेकर आपस में बात करने में इतनी हिचकिचाहट है, तो बच्चों के साथ क्या ही बात करेंगे! ऐसे भारत में बच्चों की सेक्स जिज्ञासाओं को लेकर एक फिल्म बनती है और एक भी फ्रेम में बिना अश्लील हुए अपनी बात कहने का कारनामा कर दिखाती है. यकीन मानिए ये बहुत बड़ी करिश्मा है. डायरेक्टर रवि जाधव की ‘बालक-पालक’ एक बेइंतेहा सहज लेकिन सशक्त फिल्म है.

'बीपी' महाराष्ट्र में 'ब्लू पिक्चर' के लिए इस्तेमाल किया जानेवाला लफ्ज़ है.
‘बीपी’ महाराष्ट्र में ‘ब्लू पिक्चर’ के लिए इस्तेमाल किया जानेवाला लफ्ज़ है.

किशोरों का कौतुहूल

अस्सी का दशक है. इंटरनेट अभी दुनिया में नमूदार नहीं हुआ है. चार पक्के दोस्त हैं. एक ही चाल में रहते हैं. टीन एज की दहलीज पर मंडरा रहे हैं.

डॉली गावसकर, जिसे गुड़ियों में कभी दिलचस्पी नहीं रही.
भाग्येश रेगे उर्फ़ भाग्या, रंगकर्मी पिता की नौटंकी औलाद. बात-बात पर अपने पिता के डायलॉग मारता है.
आरती पुराणिक उर्फ़ चिऊ, किसी बाबा में अगाध श्रद्धा रखते परिवार का प्रॉडक्ट. बाबा का फोटो ज्योमेट्री बॉक्स में लेकर चलती है.
अविनाश गंधे उर्फ़ अव्या, अपने सारे सवालों के जवाब किताबों में ढूंढने का आदी है क्योंकि मां-बाप कभी घर होते ही नहीं.

ये चारों छमाही एग्जाम देकर घर लौटे हैं. दीवाली की छुट्टियों में धमाल करने को उत्सुक हैं. चाल में घुसते ही सामने मातमी नज़ारा है. उनकी प्यारी ज्योति ताई चाल छोड़कर जा रही है. रीज़न कोई नहीं बता रहा. इधर-उधर घुसकर जो कुछ थोड़ा-बहुत सुन लिया गया है, उससे मालूम चला कि ज्योति ताई ने ‘गोबर खा लिया है’. अब चारों चित्त. कम्बख्त ये ‘गोबर खाना’ क्या होता है? बचपन में मिट्टी, चॉक तो सबने खाया है लेकिन इसलिए किसी को घर छोड़ते तो कभी नहीं देखा! इस गोबर खाने वाले कोड को क्रैक करने के लिए चौकड़ी दर-दर भटकती है. तबेले में घुसकर पूछताछ करने से लेकर, बड़ों से सवाल कर थप्पड़ खाने तक सब हो जाता है. लेकिन जवाब नहीं मिलता. ऐसे में आख़िरी सहारा बस ‘विशु’ ही बचता है.

प्रथमेश परब की ये भूमिका 'टाइमपास' फिल्म की उनकी भूमिका से काफी मिलती जुलती है.
विशु. प्रथमेश परब का ये रोल ‘टाइमपास’ फिल्म की उनकी भूमिका से काफी मिलता जुलता है.

विशु उनसे दो-चार साल बड़ा टपोरी सा लड़का है. मुंबई में लावारिस अवस्था में पले-बढ़े विशु को तमाम उल्टी-सीधी चीज़ों की जानकारी है. वही समझा सकता है कि ये गोबर खाना एक्चुअली होता क्या है! विशु उन्हें निराश नहीं करता. उसके मार्फ़त जो काम की जानकारी इन चारों के हाथ लगती है वो ये कि औरत और मर्द के बीच एक ‘ढिनचैक ढिचैक’ गेम होता है. उस गेम की तमाम जानकारी जुटाने के प्रयास ही ‘बालक-पालक’ फिल्म है.

चोरी छिपे 'वो' किताब पढता भाग्या.
चोरी छिपे ‘वो’ किताब पढता भाग्या.

जिज्ञासाओं को शांत करने का सिलसिला ‘वो’ वाली किताबें पढ़कर शुरू होता है. अगला स्टेप उन किताबों को ‘सचित्र’ में तब्दील करने का है. किताबों से हासिल करने लायक सारी जानकारी हाथ लगने के बाद आगे क्या! थ्यौरी हो गई, अब प्रैक्टिकल देखना है. सो दूसरों के बेडरूम में झांकने की जुगत भिडाई जाने लगती है. खिड़कियों के बाहर खड़े होकर आवाजें सुनने के प्रयास होते हैं. और जब सारी उठापठक के बाद भी कुछ दिख नहीं पाता, तो विशु की एक्सपर्ट सलाह पर अंतिम अस्त्र निकालने का फैसला होता है. ब्लू फिल्म देखने का फैसला.

छुपते-छुपाते वीसीआर अरेंज करना, ब्लू फिल्मों की कैसेट मुहैया कराना और किसी सेफ जगह का इंतज़ाम करना जैसे कितने ही विकट कार्यों को अंजाम देना है. ये चौकड़ी और इनका चरवाहा विशु कैसे इन सबसे निपटते हैं, इसी की खूबसूरत कहानी है ‘बालक पालक’.

बहुत कठिन है डगर बचपन की.
बहुत कठिन है डगर बचपन की.

फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष बिलाशक इन बच्चों का अभिनय है. कौतुहूल, संभ्रम और आश्चर्य के तमाम भाव बच्चों ने शानदार ढंग से अभिव्यक्त किए हैं. विशु के किरदार में प्रथमेश परब अद्भुत हैं. चारों बच्चे (मदन देवधर, शाश्वती पिंपळकर, रोहित फाळके, भाग्यश्री संकपाळ) बेहतरीन कास्टिंग का नमूना है. नई जानकारी से हैरान-परेशान ये किशोर उन बदलावों को बड़े ही ईमानदाराना ढंग से परदे पर उतारने में कामयाब रहे हैं, जो असल में इस उम्र में आते हैं. जैसे भाग्या का अपनी चाल की नेहा ताई पर आसक्ति का भाव, जो उससे उम्र में काफी बड़ी है. अव्या का ये डिस्कवर करना कि चिऊ भी तो लड़की ही है.

फिल्म का सबसे शानदार सीन वो है, जब दुनिया जहान की जद्दोजहद के बाद ये सेना वीसीआर पर फिल्म देखने में कामयाब हो जाती है. फिल्म शुरू हो गई है. कैमरा टीवी के पीछे से बच्चों के चेहरे पर फोकस्ड है. स्क्रीन पर आ रहे दृश्यों को देखते हुए उनके चेहरे पर जो भाव आते-जाते रहते हैं, वो इस फिल्म का हाई-पॉइंट है.

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रितेश देशमुख ने इस फिल्म के साथ ही मराठी सिनेमा निर्मिती में कदम रखा था. उनको साधुवाद. डायरेक्टर रवि जाधव को स्पेशल मार्क्स देने होंगे. जिस संवेदनशीलता से उन्होंने ये सब्जेक्ट हैंडल किया है, उसकी भारत में दूसरी कोई मिसाल मैंने नहीं देखी. ये फिल्म बेहद आसानी से वल्गर हो सकती थी. अश्लील हो सकती थी. लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा इसका एक फ्रेम भी अश्लील नहीं है. तमाम पेरेंट्स को ये फिल्म ज़रूर-ज़रूर देखनी चाहिए. उम्र के नाज़ुक मोड़ पर खड़े बच्चों को सही गाइड करने में सहायक ही साबित होगी.

‘बालक पालक’ का ट्रेलर: 


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