UN में 193 देश शामिल हैं. सारे देशों ने मिलकर बैठक की और सेक्रेटरी चुना एंटोनियो को. वैसे इस पद के लिए कुल मिलकर मैदान में 13 उम्मीदवार थे. ये भी जान लो 67 साल के एंटोनियो पिछले साल तक UN के रिफ्यूजी एजेंसी के चीफ रहे. अब पढ़ो कि एंटोनियो ने ऐसा क्या-क्या किया कि यहां तक पहुंच गए -
कारनेशन रेवोल्युशन ने बनाया नेता, फिर ऐसे हिट हुए कि रुके ही नहीं
इन्होंने 1974 में पुर्तगाल की सोशलिस्ट पार्टी ज्वाइन की. वह भी उस समय जब पुर्तगाल में सत्ता के खिलफ आंदोलन चल रहा था. काएटानो उस समय पुर्तगाल के प्रधानमंत्री थे. जिनका रवैया एकदम तानाशाही था. जो वो चाहते थे वही होता था, कानून उनके आगे पस्त था. पूरे पुर्तगाल में भभ्भड़ मचा हुआ था. जिससे तंग आकर लोगों ने काएटानो को कुर्सी से गिराने के लिए उसके खिलाफ आन्दोलन स्टार्ट कर दिया. यह आंदोलन आगे जा कर कारनेशन रेवोल्युशन के नाम से मशहूर हो गया. असल में कारनेशन एक लाल रंग का फूल है जो कि रेड रोज जैसा होता है. लाल कारनेशन को सोशलिज्म का सिंबल भी माना जाता है. और कारनेशन रेवोल्युशन की बारात भी लाल सलाम वाले सोशलिस्ट ने ही निकला था. इसी राजनीतिक उठा-पटक के बीच एंटोनियो सोशलिस्ट पार्टी के युवा चेहरा बन गए. एक साल उन्होंने एक मंत्रालय में दफ्तर का काम संभाला. और फिर सांसद बन गए. 16 साल की रगड़ाई के बाद पार्टी हेड और अपोजीशन के नेता बने.
कम्युनिस्ट आदमी पर देश को जरूरत हुई तो मार्केट को ओपन कर दिया
1995 के चुनाव में पार्टी ने बंपर जीत हासिल की. एंटोनियो बन गए पीएम. उन्होंने लीक से हटकर काम किया. भारत के कम्युनिस्टों की तरह पुरानी थ्योरी छाती से चिपका कंकाल न बन गए. देश की जरूरत लगी तो मार्केट को भी ओपन कर दिया. ओपन मार्केट बोले तो विदेशी कंपनियों को देश में आकर बिज़नेस करने देना है. एंटोनियो जनता की राय को भरपूर तवज्जो देते थे. कोई भी बड़ा सुधार करते तो उससे पहले पॉलिसी पर पब्लिक रेफरेंडम करवाते. इससे जनता को लगता कि नए नियम में उनकी पूछ भी है और जरूरत भी. इन सब चीजों की वजह से जनता में उनकी लोकप्रियता का करंट दौड़ने लगा.
लोकल म्युनिसिपल में खराब रही परफॉर्मेंस तो PM एंटोनियो ने इस्तीफा दे दिया
एंटोनियो 1999 में दोबारा पीएम चुने गए. चौंकिएगा नहीं पुर्तगाल में भी अमेरिका की तरह चार साल पर चुनाव होते हैं. हालांकि उनका दूसरा कार्यकाल उतना सफल नहीं रहा. सोशलिस्ट पार्टी के अंदर कलह होने लगा. और इकोनॉमी की खस्ता हालत के चलते एंटोनियो की पॉपुलैरिटी कम होती गई. दिसंबर 2001 में लोकल म्युनिसिपेलिटी के चुनावों में सोशलिस्ट पार्टी का परफॉरमेंस बहुत ही ख़राब रहा. जिसके बाद एंटोनियो ने पीएम के पोस्ट से इस्तीफा दे दिया. और कहा कि ‘मैं इस्तीफा दे रहा हूं, ताकि हमारा देश राजनीतिक दल-दल में धंसने से बच सके’.
पहले भी दुनिया में शांति बनाने को रहे हैं डेडिकेटेड
मई 2005 में एंटोनियो यूएन रिफ्यूजी काउंसिल (UNRC) के हाई कमिश्नर बनाए गए. इस एजेंसी में 10 हजार के लगभग लोग काम करते हैं. कुल 126 देशों में दफ्तर खुला है इसका. ये वही दौर है, जब पोस्ट तालिबान दौर में मिडल ईस्ट और अफ्रीका के कई देशों में गृह युद्ध और आतंकवाद रहा. जिसके चलते लाखों लोगों को घर छोड़ना पड़ा. फिर चाहे वह सूडान की लड़ाई हो या फिर हाल फिलहाल सीरिया की. एंटोनियो ने इन सबके लिए खूब एक्टिव होकर काम किया. 31 दिसंबर 2015 तक वह इस पोस्ट पर रहे. ड्यूरेशन के हिसाब से नंबर दो पर रहने वाले हाई कमिश्नर.
भारी मतों से मार ले गए सेक्रेटरी बनने की बाजी
एंटोनियो का नाम दुनिया भर में ढंग से सुनाई देना शुरू तब हुआ जब 5 अक्टूबर को 15 मेंबर्स वाले यूनाइटेड नेशंस सिक्यूरिटी कौंसिल ने एंटोनियो के नाम का ऐलान किया. इसके लिए सभी मेंबर्स के बीच गुप्त रूप से वोटिंग किया गया. जो कि के जिसमें 13 वोट एंटोनियो को मिले और 2 नो ऑपिनियन वोट किए गए. उनका कार्यकाल 1 जनवरी 2017 से स्टार्ट हो जाएगा. एंटोनियो की एक ख़ास बात यह भी है कि वो इंग्लिश,पुर्तगाली, फ्रेंच, स्पैनिश भाषाओं को फर्राटेदार बोल लेते हैं. एंटोनियो को यूएन के महासचिव बनाने की सबसे बड़ी वजह रही उनका यूएन में 10 साल से भी ज्यादा समय का अनुभव. जिसमें रिफ्यूजी संकट, मानवाधिकारों जैसे गंभीर मसले पर उनका बेहतरीन परफॉरमेंस रहा. आज जब यूएन को अमेरिका का रबड़ स्टाम्प माना जाने लगा है. एंटोनियो की सोशलिस्ट-लिबरल की छवि यूएन को एक अलग पहचान दिला सकती है.ये स्टोरी आदित्य प्रकाश ने की है
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