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लड़की को फोबिया, या पूरे समाज को?

कमाल की अभिनेत्री राधिका आप्टे की बतौर मुख्य अभिनेता पहली हिन्दी फिल्म, साइकॉलोजिकल थ्रिलर 'फोबिया' की समीक्षा

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फोटो - thelallantop

फिल्म : फोबिया

निर्देशक : पवन कृपलानी

कलाकार : राधिका आप्टे, सत्यदीप मिश्रा, अंकुर विकल, यशस्विनी दायमा

समय : 1 घंटा 53 मिनट

हिन्दी सिनेमा में नब्बे से पहले तक हॉरर फिल्मों का जॉनर रामसे ब्रदर्स की फिल्मों के लिए आरक्षित होता था. 'पुरानी हवेली' 'पुराना मंदिर' 'बन्द दरवाजा' जैसी फिल्में, जिनमें भूत या बुरी आत्मा सदा शहरी परिवेश अौर घर की चारदीवारी से दूर होती थी. फिर राम गोपाल वर्मा आए अौर 'रात' 'भूत' अौर 'कौन' जैसी फिल्मों के साथ डर को हमारे आधुनिक शहरी परिवेश में स्थापित कर दिया. आधुनिक उपभोक्ता उपकरणों जैसे टीवी, लिफ्ट, फोन, मिक्सी की आवाज़ों से डर का संबंध जोड़ा जाने लगा. राधिका आप्टे स्टारर 'फोबिया' इसी नए जॉनर की हॉरर फिल्म है, जिसमें डर घर के भीतर घुस आया है.

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बल्कि इसे हॉरर के बजाए साइकॉलोजिकल थ्रिलर कहना ज़्यादा अच्छा होगा.

कहानी के केन्द्र में है महक देव (राधिका आप्टे). एक आधुनिक, शहरी, स्वतंत्रचेता, ज़िन्दादिल लड़की जिसे किसी अंजान आदमी द्वारा 'कुतिया' कह दिए जाने से परेशानी नहीं होती अौर वो उसे हंसकर टाल सकती है. पेशे से पेंटर महक के साथ एक रात एक ऐसी घटना होती है जो उसका स्वभाव एकदम ही बदल देती है. यौन हिंसा की यह घटना उसके मन में सार्वजनिक स्थानों के प्रति एक डर भर देती है. यह बीमारी मेडिकल टर्म में एग्रोफोबिया कहलाती है. महक अपने ही घर में कैद हो जाती है. उसे इस डर से छुटकारा दिलाने के लिए उसका दोस्त वास (सत्यदीप मिश्रा) महक को समन्दर किनारे एक नए घर में लेकर आता है. लेकिन यहां बात अौर बिगड़ने लगती है. महक को विश्वास हो जाता है कि घर में भूत है अौर यह भूत घर में उससे पहले रहनेवाली लड़की जिया का है.

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पहले तो मुझे यह ही नहीं समझ आता कि एक फोबिया के शिकार व्यक्ति को अकेले एक अंजान घर में छोड़ देना किस किस्म का इलाज हो सकता है. फिर घर भी ऐसा जिसकी दीवारों पर चीनीमिट्टी की तश्तरियां अौर 'दि रिंग' टाइप गाउन वाली बूढ़ी दादी की पेंटिंग लगी हो. अौर घर में एक ऐसा कमरा हो जिसमें किसी पुराने किराएदार का 'छुपा हुआ' सामान पड़ा हो.

स्पष्ट है कि अब फिल्म को हॉरर की राह पर जाना था, अौर वो चल देती है. ऐन मौके पर बुझते लाइट लैंप अौर बिजली बल्ब, बाथरूम में नहाती लड़की अौर अचानक दरवाजे का खुल जाना, टॉयलेट के छेदों से कातर आवाज़ों का आना, अचानक घर में काली बिल्ली का प्रगट हो जाना जैसे सारे हॉरर ट्रैपिंग्स 'फोबिया' इस्तेमाल करती है. इसके साथ साउंड से डर पैदा करने वाला खेला भी 'फोबिया' में अपनी पीढ़ी की अन्य हॉरर फिल्मों की तरह बहुत है.

लेकिन 'फोबिया' शुद्ध हॉरर फिल्म भी नहीं है. पहले वो एक सस्पेंस थ्रिलर में बदलती है अौर दूसरे हाफ में एक मजेदार ट्विस्ट के साथ फिर पलट जाती है. 'रागिनी एमएमएस' अौर 'डर @ दि मॉल' जैसी फिल्मों के निर्देशक पवन कृपलानी यहां भी सीसीटीवी कैमरा, लिफ्ट, कॉलबैल, शॉपिंग मॉल जैसी निरापद आवाजों अौर जगहों के बीच डर की सत्ता को स्थापित करते हैं.

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राधिका इसे अपने सटीक अभिनय से सजीव कर देती हैं. राधिका हमारे दौर की सबसे प्रतिभाशाली युवा अभिनेत्री हैं. इससे पहले भी 'शोर इन दि सिटी', 'बदलापुर', 'हंटर' जैसी फिल्मों में अौर 'अहिल्या' जैसी शॉर्ट फिल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी हैं. यहां मुख्य भूमिका में वो फिल्म को अपने दम पर संभालती हैं. 'फोबिया' में एक पूरा ट्रैक पड़ोसी अौर उसकी लापता प्रेमिका से जुड़ा हुआ है, जो हिचकॉक की 'रियर विंडो' जैसी क्लासिक सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों की याद दिलाता है. राधिका आप्टे के अलावा फिल्म में बाकी कलाकारों का काम भी अच्छा है, खासकर मेंटल लगते पड़ोसी की भूमिका में अंकुर विकल अौर 'हैप्पी टू हैल्प' पड़ोसन लड़की की भूमिका में नई अदाकारा यशस्विनी दायमा. लेकिन 'फोबिया' अंतिम छलांग लगाने से पहले, जहां यह सच में बड़ी फिल्म हो सकती थी, सकुचा जाती है.

एक लार्जर नैरेटिव में देखें तो महक के इस फोबिया को एक प्रतीक के तौर पर पढ़ा जा सकता है. ये फोबिया महक का नहीं है. एक लड़की का नहीं है. एक यौन हिंसा की घटना के बाद वो क्यों सार्वजनिक स्पेस में जाने से डरती है, यह हमें सोचना चाहिए. ये दरअसल हमारी सोसाइटी को हुआ फोबिया है, जिसका जल्द से जल्द इलाज ज़रूरी है. यह फोबिया है यौन हिंसा की शिकार लड़की को भिन्न नजरों से देखने का फोबिया. अपराध करने वाले के बजाए अपराध के शिकार व्यक्ति को टार्गेट बनाने का फोबिया. उसके सार्वजनिक जीवन से तमाम तरह की नॉर्मेलसी छीन लेने का फोबिया.

बीच में एक जगह जब महक अपने दोस्त शान को संबोधित कर ऐसी कई बातें बोलती है, जिनके वृहत्तर सामाजिक निहितार्थ हैं, लगता है यह फिल्म उस लार्जर नैरेटिव की अोर जा रही है. लेकिन फिर फिल्म उसे छोड़कर फौरन ही सुपरनैचुरल एंगल की अोर मुड़ जाती है. हां, मुझे अच्छा लगता अगर 'फोबिया' हमारे समाज को हुई इस बीमारी को भी कुछ अौर तबीयत से एक्सप्लोर करती.

https://www.youtube.com/watch?v=fBP6rYLfgFE

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