नसीर ने क्या बोला था?
उन्होंने कहा था - "अनुपम खेर इस मामले में (मौजूदा सरकार के पक्ष में बोलने में) काफी मुखर रहे हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि उन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत है. वो एक मसखरे हैं. NSD और FTII के दौर से उनके कई समकालीन लोग इस बात की तस्दीक करेंगे कि वो चापलूसी करते हैं. ये उनके स्वभाव का हिस्सा है. ये आदत आप बदल नहीं सकते हैं."
इसमें नसीर ने जो कहा था, उसका शाब्दिक अनुवाद होगा - 'ये उनके ख़ून में है'. लेकिन अनुवाद में बहस हो सकती है. जुमलों का सही अनुवाद कर पाना मुश्किल है. यहां पक्ष लेने की बात नहीं है. यहां रीज़नेबल डाउट वाला सिद्धांत काम करता है. खैर, शाह को जो कहना था और जैसे कहना था, उन्होंने कहा.
अनुपम ने क्या जवाब दिया?
नसीर को संबोधित करते हुए एक वीडियो बनाकर ट्वीट किया. इसमें कहा कि वो भी शाह को गंभीरता से नहीं लेते. क्योंकि शाह नशा करते हैं. फ्रस्ट्रेटेड आदमी हैं.
नसीर ने हमेशा अथॉरिटी की आलोचना की है. चाहे वो सत्ता धार्मिक हो, राजनीतिक हो या कला क्षेत्र की. ये नसीर की बड़ी नेमत है. कोई दूसरा एक्टर ऐसा नहीं करता. जाने माने सेलेब्रिटी झूठ बोले जाते हैं, एक दूसरे की पीठ सहलाते जाते हैं. नसीर नहीं. उन्होंने कभी आम लोगों का मजाक नहीं बनाया. सच्चे आंदोलनों को अवैध करने की कोशिश नहीं की. वो कभी किसी प्रोपोगैंडा का हिस्सा नहीं रहे. बीते काफी वक्त से वे बिलकुल छोटी और साधारण फिल्में कर रहे हैं. ये उनके ग़ैर-महत्वाकांक्षी मिजाज को दिखाता है.
उनके रिएक्शन में अनुपम खेर का जवाब शांत और कूल था क्योंकि वे बहुत शक्तिशाली हैं इस वक्त. बड़े बड़े स्टार उनसे भिड़ने से कतराते हैं. क्योंकि अभी उनके पास सत्ता का बैकअप है. उन्हें कोई बेचैनी नहीं कि आपा खोएं.
एक समय था जब उन्होंने आपा खोया था. उन्होंने फ़िल्म मैगजीन स्टारडस्ट के पत्रकार ट्रॉय रोबेरो को थप्पड़ मार दिया था. ट्रॉय अपनी उस स्टोरी पर खेर का रिएक्शन जानने यश चोपड़ा की फ़िल्म 'परंपरा' के सेट पर गए थे कि क्या अनुपम ने एक एक्ट्रेस (ममता कुलकर्णी) की बहन (मिथिला) को मोलेस्ट करने की कोशिश की. लेकिन जवाब देने के बजाय अनुपम हिंसक हो गए. बाद में अपनी छवि साफ साबित करने के लिए उन्होंने बंबई की फ़िल्म मैगजीनों को बैन करवाने का एजेंडा भी कुछ महीने चलाया. जो बुरी तरह फेल रहा. वो कोर्ट भी गए. लेकिन संबंधित मैगज़ीन के एडिटर ने अवमानना की परवाह किए बग़ैर वो रिपोर्ट छाप दी. बाद में उस मैगजीन ने पांच साल के लिए अनुपम खेर को बैन कर दिया. आज वही अनुपम उस मैगजीन के मालिक नारी हीरा के दोस्त हैं.

स्टारडस्ट का वो आर्टिकल. इस मसले पर सितंबर 1992 के एक इंटरव्यू में संजय दत्त ने कहा था कि अनुपम ने तो थप्पड़ मारा था, मैं होता तो उस रिपोर्टर को मार डालता. अगर अभी भी इन रिपोर्टरों की हड्डी वगैरह तोड़ने जाना है तो मैं रेडी हूं. (फोटोः एनडीटीवी)
नसीर के पास कोई शक्ति नहीं. सिर्फ उनका नजरिया है. उनके बयान में पोलिटिकल इनकरेक्टनेस है. जो उन्हें पसंद है दूसरों में भी. वे हमेशा से ही वैसे ही रहे हैं. सम्मोहनों से बनी सेलेब्रिटीडम की दुनिया में मिथ्याओं, आवरणों को तोड़ने का काम करते हैं. जो जनता के भले की चीज है. जो उन्होंने अमिताभ, राजेश खन्ना, शोले, विराट कोहली आदि के बारे में बोलकर किया. उन्होंने किसी का अपमान नहीं किया. आलोचना की. अनुपम ने बीते 6 साल से बीजेपी को सपोर्ट करने के लिए हर विरोधरत स्वतंत्र आंदोलन, व्यक्ति, कलाकार, छात्र, बुद्धिजीवी को नीचे गिराने की कोशिशें की हैं. उन्हें भला बुरा कहा है. हिंदुस्तानी होने, न होने के सर्टिफिकेट बांटे हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि वे मौजूदा सरकार की छत्रछाया में एक औसत फ़िल्मी कलाकार से एक ताकतवर आदमी बने हैं. वे किसी भी एंगल से पद्मभूषण नहीं डिज़र्व नहीं करते हैं लेकिन उन्हें मिला है. एक-दो बार बीजेपी और सत्ता में आई तो भारत रत्न या फाल्के भी ज़रूर पा लेंगे.
वे कहते हैं मैं भक्त हूं. हालांकि फिर उसमें मोदी की जगह 'भारत' जोड़ देते हैं. जब वे सरकार के दरबारी बने हुए हैं तो उनको साइकोफैंट न समझने की वजह नहीं मिलती.

अनुपम खेर अपनी आत्मकथा लेकर पीएम मोदी से मिलते हुए. दूसरी फोटो में वे मधुर भंडारकर, डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री, पल्लवी जोशी और प्रोड्यूसर अशोक पंडित के साथ नजर आ रहे हैं.
वे क्लाउन नहीं हैं तो गंभीर और बुलंद रीढ़ के व्यक्तित्व भी नहीं है. जब नवंबर 2015 में शाहरुख ने कहा इनटॉलरेंस है तो ट्वीट करके उनको सपोर्ट किया और बीजेपी से कहा कि उसके लोग (कैलाश विजयवर्गीय) अपनी जबान पर लगाम लगाएं शाहरुख देश के आइकन हैं. क्योंकि शाहरुख से फैमिली रिलेशन है. उनके साथ बड़ी फिल्में की हैं. 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में उन्होंने शाहरुख के पिता का रोल किया जिसने अनुपम को देश विदेश में बड़ी पहचान दी. लेकिन नवंबर 2015 में ही आमिर ने भी यही बात दूसरे शब्दों में कही तो अनुपम ने ट्वीट्स की झड़ी लगा दी. आमिर को देशभक्ति क्या है ये बताने लगे. उन्हें शर्मिंदा किया. एक समय में कहा कि योगी आदित्यनाथ जैसे लोगों को जेल में डाल देना चाहिए. लेकिन योगी के सीएम बनने के बाद से चुप हैं. पता है कि उनसे भिड़ नहीं पाएंगे. पता है कि ये आदमी आने वाले समय में बीजेपी में शीर्ष स्थान पर हो सकता है. 'सारांश' और 'मैंने गांधी को नहीं मारा' जैसी फिल्मों में गांधीवादी पात्रों का अभिनय करने की वजह से थोड़ा गंभीरता से लिए जाने वाले अनुपम ने गांधी के हत्यारे गोडसे को देशभक्त बताने के बाद 2008 मालेगांव बम धमाके की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को कुछ नहीं कहा जिसे बीजेपी ने टिकट दिया और जो संसद सदस्य बनी.
निश्चित तौर पर अनुपम ऐसे व्यक्ति हैं जो अपनी निष्पक्षता अरसे पहले खो चुके है. वे सरकार का प्रोपोगैंडा चलाते हैं ये उनके बयानों और तर्कों से पूरी तरह स्पष्ट है. जब 2012 में कांग्रेस की सरकार थी तब उन्होंने एडवर्ड एबी का कोट ट्वीट किया था कि - "एक देशभक्त को हमेशा अपनी ही सरकार से अपने देश की रक्षा करने के लिए तैयार रहना चाहिए." जब वे अन्ना आंदोलन के मंच पर गए तो कहा कि सड़कों पर उतरना ज़रूरी है. आज इन सब वैल्यूज़ को फ़ॉलो करने वालों लोगों के खिलाफ ज़हरीली बातें करते हैं. कुप्रचार करते हैं. नोटबंदी की असफलता, देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति का लगातार खराब होते जाना ऐसे इतने बड़े मसले हैं कि चारों तरफ बात हो रही है. दुनिया भर में. लेकिन उन्होंने इन विषयों पर एक शब्द न कहा. यहां उनके सारे थियेट्रिक्स गायब हैं. सरकार के खिलाफ किसी भी जायज आलोचना को भी वे खड़ा नहीं होने देते. वे सिर्फ वही नैरेटिव चलाते हैं जो सरकार को फायदा पहुंचाए.
अनुपम की आवाज़ एक फ्री थिंकिंग आदमी की आवाज़ बिलकुल नहीं है.

स्विट्ज़रलैंड के एक गांव में चार्ली चैपलिन की क़ब्र पर नसीर.
नसीर कभी ताकतवर लोगों की प्रशंसा करते नहीं दिखते. न ही उनके एजेंडा चलाते हैं. वे हमेशा से एक फ्री वॉयस रहे हैं. वे संवैधानिक मूल्यों के अनुसार बात करते हैं. अपने थियेटर ग्रुप के जरिए प्रगतिशील मूल्यों को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं.
इसी इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि जैसे जैसे वे आगे बढ़ रहे हैं उनके नाटकों में ज्यादा से ज्यादा मायने निकल रहे हैं. उनका प्ले 'आइंस्टाइन' बात करता है कि यहूदियों के साथ क्या हुआ था. वो याद करता है कि छात्रों को कैसे हाशिये पर धकेला गया. कैसे किताबों को जलाया गया. कैसे सिर्फ नाज़ियों की वजह से केंद्रीय पात्र को पता लगा कि वो एक यहूदी है. अन्यथा उसने कभी कोई यहूदी भावना अपने अंदर महसूस न की थी. नसीर कहते हैं कि "ये वो चीज है जिसके साथ मेरी पूरी तरह आत्मानुभूति है. जब वो पात्र अगले विश्व युद्ध की बात करता है, अगले से भी अगले विश्वयुद्ध की जो पत्थरों से लड़ा जाएगा तब मुझे पता है कि वो क्या कहना चाह रहा है".
जब देश में बहुलता (plurality) के भविष्य को लेकर आशंकाएं दिखती हैं तो अनुपम बोलना ज़रूरी नहीं समझते लेकिन जब अमेरिका में होते हैं और अपने अमेरिकी शो 'न्यू एम्सटर्डम' का प्रचार करते हैं तो विविधता (diversity) शब्द का इस्तेमाल करते हैं. उन्हें गंभीरता से कैसे लें जब वो ओवरएक्टिंग करके सबको देशसेवा, देशभक्ति, रगों में हिंदुस्तान का पाठ पढ़ाते हैं और जब ख़ुद को एक विदेशी टीवी शो में अच्छी कमाई का ऑफर आता है तो फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे (FTII) का चेयरमैन का पद एक साल बाद बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं.
वही पद जिसके लिए 2015 के आखिर में उन्हें एक टीवी शो में पूछा गया, क्या सरकार चेयरमैन का पद देगी तो लेंगे तो उन्होंने कहा था कि मैं नहीं चाहता क्योंकि अपना ख़ुद का स्कूल (एक्टिंग स्कूल) चलाता हूं. हालांकि ऑफर मिला तो ले लिया.
नसीर के शब्द कड़वे रहे लेकिन भद्दे नहीं. वहीं अनुपम ख़ेर हैं जो जेएनयू के छात्रों और कन्हैया कुमार जैसे छात्र नेताओं के लिए कॉकरोच, कीड़े जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. नसीर कमज़ोरों के लिए बोलते हैं और अनुपम सत्ता के सबसे ताकतवर संस्थानों की तरफ से.
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