सागामिहारा शहर टोक्यो से करीब 50 किलोमीटर दूर है. वहां के सुकुई लिली गार्डन मेंटल केयर सेंटर में 18 से 70 साल की उम्र के लोग रहते हैं. 26 साल का सातोशी उमात्सू पहले इसी केयर सेंटर में काम करता था. लेकिन किसी वजह से उसने नौकरी छोड़ दी थी. 26 जुलाई को रात में 2.30 बजे सातोशी उस केयर सेंटर में घुस गया. उसके हाथ में चाकू था. वो लोगों पर हमला कर रहा था और चिल्ला रहा था. 'विकलांगों को इस दुनिया से ख़त्म कर देना चाहिए.'

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लोगों को मारने के बाद वो अपनी कार से पुलिस स्टेशन गया. उसने खुद पुलिस से कहा कि उसने सारे लोगों को मार डाला है. क्योंकि विकलांगों का सर्वनाश होना चाहिए. पुलिस ने उसको गिरफ्तार कर लिया है.
विकलांगों से नफरत के किस्से कम नहीं हैं
जब एक दादी ने अपनी अपाहिज पोती को मार डाला था
2014 में मुंबई के कल्याण में रहने वाली एक दादी ने अपनी ढाई साल की पोती को मार डाला था. क्योंकि पोती विकलांग थी. पुलिस ने जांच-पड़ताल की थी. पता चला था कि वो औरत अपनी पोती के अपाहिज होने की वजह से पहुत परेशान हो गई थी. बच्ची की किडनैपिंग का झूठा नाटक किया. और खुद ही बच्ची को मार डाला था. पुलिस के पूछने पर उसने बताया कि अड़ोस-पड़ोस के लोग बच्ची का मज़ाक उड़ाते थे. कहते थे इस बच्ची को कैसे पालोगे. इन्हीं सब वजहों से वो परेशान हो गई थी. और उसने बच्ची को मार डाला. इस तरह की ना जाने कितनी घटनाएं होती हैं. जो रिपोर्ट होने तक पहुंच ही नहीं पातीं.'विकलांगों को मार देना चाहिए क्योंकि वो समाज पर बोझ हैं'

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19 लोगों का खून करने वाला वो लड़का यही चिल्ला रहा था. पढ़कर हिटलर याद आ गया. हिटलर कहता था, युद्ध का समय सबसे बढ़िया समय होता है. उन लोगों को ख़त्म करने का. जिनको ठीक नहीं किया जा सकता. जर्मनी में नाज़ी शासन का समय था. शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार लोगों को समाज पर बोझ माना जाता था. कहा जाता था वो शुद्ध इंसानी प्रजाति के लिए एक खतरा थे. ऐसे लोगों की ज़िन्दगी भी बेकार थी.
फिर वर्ल्ड वॉर 2 के समय नाजियों ने यूथेनेशिया प्रोग्राम शुरू किया था. जर्मनी के मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार लोगों को ढूंढ-ढूंढ कर मार डाला था. हिटलर ने डॉक्टर और नर्सों को खास हिदायत दी थी. अगर मानसिक और शारीरिक रूप से अपाहिज लोग उनके पास इलाज करवाने आएं. उनका इलाज ना किया जाए. ताकि वो लोग खुद ही मर जाएं.
बाकियों को मारने के लिए खास तरह के गैस चैम्बर बनाए गए थे. जिसमें अपाहिजों को बंद कर दिया जाता था. वो लोग दम घुटने की वजह से मर जाते थे. छोटे बच्चों को इंजेक्शन देकर या भूखा रखकर मार दिया जाता था. 1941 में इस यूथेनेशिया प्रोग्राम का बहुत विरोध हुआ था. फिर भी 1940 से 1945 के बीच 2,00,000 से ज्यादा अपाहिज लोगों को मार डाला गया था.
फिल्म 300 के स्पार्टन्स अपने बीमार और अपाहिज बच्चों को खुद मार डालते थे

फिल्म 300 का शुरुआती सीन. ग्रीक सम्राट लिओनीडास का जन्म हुआ. स्पार्टा के लोग पैदा हुए लिओनीडास की जांच कर रहे हैं. कहीं वो कमज़ोर या अपाहिज तो नहीं है. फिर मरे हुए बच्चों की हड्डियां दिखाई जाती हैं. इन दो सीन्स में ये साफ़ हो जाता है कि अगर पैदा हुआ बच्चा मानसिक या शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं. उसे मार डाला जाएगा. वो कमज़ोर या अपाहिज होगा. युद्ध करने के लायक नहीं होगा. वो एक असली स्पार्टन नहीं होगा. एक बोझ ही होगा. इसलिए उसको ख़त्म कर देना चाहिए.
स्पार्टन्स की लड़ाई थी पर्शियन्स से. फिल्म के रिव्यू में पर्शियन्स को 'बदसूरत, एब्नॉर्मल और घटिया लोगों का ग्रुप' कहा गया था. और स्पार्टन्स ताकतवर, खूबसूरत और डिवाइन थे.
एक 'खूबसूरत' राजकुमारी श्राप से अपाहिज बन गई
पुराने ज़माने में लोग किसी के अपाहिज या मानसिक रूप से बीमार होने को उसके मन की बुराइयों से जोड़ते थे. कोई अंधा है. लंगड़ा है. तो ज़रूर वो एक बुरा इंसान रहा होगा. जिसको अपने कर्मों की सजा मिल रही है. नंदन और बालहंस की कहानियों में भी कई बार ऐसे ज़िक्र मिलते हैं. एक ख़ूबसूरत राजकुमारी किसी के 'लंगड़े' या 'अंधे' होने का मज़ाक उड़ा देती है. उसको श्राप मिल जाता है. अगले जन्म में वो 'कुबड़ी', 'लंगड़ी', 'लूली' या 'अंधी' पैदा होगी. अपाहिज होना एक श्राप माना जाता था. और ऐसे लोग हमेशा नेगेटिव रोल में ही फिट किए जाते थे. या उनका मज़ाक उड़ाया जाता था.
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एक समाज के तौर पर हम हर अलग चीज़ को अपने सही या गलत के पैरामीटर से तौलना चाहते हैं. जो भी हमारी आज तक देखी हुई चीज़ों से अलग है. वो गलत है. बेकार है. उसको जिंदा रहने का भी कोई हक नहीं है. बहुत सारे 'नॉर्मल' लोगों को मानसिक या शारीरिक रूप से अपाहिज लोगों से डर लगता है. उनको लगता है अगर हम इन पर हमला नहीं करेंगे, ये हम पर हमला कर देंगे. अभी भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो अपाहिजों को शैतान के दूत मानते हैं. इसलिए उनको दुनिया से ख़त्म कर देना चाहते हैं.
दरअसल हमें डर या नफरत उन्हीं चीज़ों से होती है जिसमें हमें खुद की झलक दिखती है. कोई आदमी जब नया-नया अमीर बनता है, उसको गरीबों से नफरत हो जाती है. जिस सास को उसकी सास ने परेशान किया होगा. वो अपनी बहू को भी उतना परेशान तो करेगी ही. दूसरों को 'बुली' करने वाले लोग खुद बहुत डरपोक होते हैं. जिस इंसान को किसी अपाहिज को देखकर उसको ख़त्म कर देने की इच्छा होती है. वो खुद भीतर से डरा हुआ होता है. उसके भीतर बहुत सारी इनसिक्योरिटी भरी होती है. जब वो अपने से किसी कमज़ोर को मारता है. दरअसल वो अपने अन्दर की उस बेचारगी को मारना चाहता है.लेकिन किसी भी तरह से 'नॉर्मल' ना होना अक्सर शारीरिक या मानसिक रूप से 'एब्नॉर्मल' लोगों को आगे बढ़ने से रोक नही सकता. इतनी सारी नफरत, इतने सारे भेदभाव और हिंसा की ऐसी घटनाओं के बावजूद अगर जज्बा है. लोग अपनी पहचान बना ही लेते हैं.
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