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फिल्म रिव्यू- हैवान

अक्षय कुमार और सैफ अली खान स्टारर 'हैवान' हमें कैसी लगी, जानने के लिए पढ़िए ये रिव्यू.

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'हैवान' मोहनलाल की फिल्म 'ओप्पम' का रीमेक है.

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  • फिल्म 'हैवान' का निर्देशन प्रियदर्शन ने किया है जिसमें अक्षय कुमार ने एक खूंखार सीरियल किलर और सैफ अली खान ने नेत्रहीन रेसलर का किरदार निभाया है।
  • यह फिल्म 2016 की मलयाली फिल्म 'ओप्पम' का रीमेक है, जिसमें लंबी अवधि, कमजोर स्क्रीनप्ले और अधूरी बैकस्टोरी ने दर्शकों के अनुभव को प्रभावित किया।
  • फिल्म की लंबाई और एडिटिंग की कमियों के कारण आलोचनाओं के बीच अक्षय और सैफ के बीच के फेसऑफ को दर्शकों ने पसंद किया, जो फिल्म की सबसे मजबूत विशेषता माना गया।

फिल्म - हैवान
एक्टर्स - अक्षय कुमार, सैफ अली खान
डायरेक्टर - प्रियदर्शन
रेटिंग - 2.5 स्टार
 

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ऑन-पेपर देखें, तो ‘हैवान’ के पास सब कुछ है. प्रियदर्शन जैसे वेटरन इसके डायरेक्टर हैं. सैफ अली खान जैसे वर्सेटाइल एक्टर ने इसमें लीड रोल किया है. अक्षय कुमार जैसे सुपरस्टार अपने करियर के सबसे खूंखार अवतार में हैं. रिलीज़ से पहले मेकर्स ने इस थ्रिलर को लेकर कई वादे किए थे. उनमें से कुछ पूरे हुए, कुछ अधूरे रह गए. कुछ ने भविष्य को लेकर उम्मीद जगाई, वहीं कुछ ने वर्तमान में ही निराश कर दिया. मुद्दा ये है कि हमने फिल्म देख ली. इसके तमाम प्लस-माइनस भी नोट कर लिए. और जब हमने इतनी मेहनत कर ही ली है, तो आपको भी जरूर बताएंगे कि हमें ये फिल्म कैसी लगी.

‘हैवान’ का बेसिक प्लॉट सॉलिड है. इसमें सैफ अली खान ने एक ऐसे शख्स का किरदार निभाया है, जो कुश्ती में माहिर है पर आंखों से देख नहीं सकता. आंख के बदले उसकी सूंघने और सुनने की क्षमता काफी अच्छी हो गई है. इनकी मदद से वो एक नौ-दस साल की बच्ची को आने वाली मुसीबत से बचाते हैं. पर ये मुसीबत कोई और नहीं, बल्कि इस कहानी के ‘हैवान’ यानी अक्षय कुमार हैं. अक्षय उस बच्ची की जान लेना चाहते हैं. क्यों? इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. हम अपनी तरफ़ से उसका खुलासा कर, आपका मज़ा किरकिरा नहीं करेंगे.

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रिव्यू में आगे बढ़ने से पहले हम बता दें कि ‘हैवान’ साल 2016 में रिलीज़ हुई मलयाली फिल्म ‘ओप्पम’ का रीमेक है. मोहनलाल की उस मूवी को प्रियदर्शन ने ही डायरेक्ट किया था. ऐसे में दोनों फिल्मों में तुलना होना लाज़िमी है. फिर भी, आज हम उसे एवॉइड ही करेंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि ‘हैवान’ की अपनी ही इतनी खूबियां और खामियां हैं कि इसे किसी अन्य फिल्म से कंपेयर किए जाने की ज़रूरत भी नहीं. ये एक ओरिजिनल फिल्म होती, तब भी इन बातों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था.

खैर, ‘हैवान’ की शुरुआत प्रॉमिसिंग होती है. पहले ही सीन में अक्षय कुमार को एक तगड़े बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ इन्ट्रोड्यूस किया जाता है. उसे देखकर आपके मन में अगले 2 घंटे 44 मिनट को लेकर भरोसा जग जाता है. मगर फिर अक्षय स्क्रीन से कुछ इस कदर गायब होते हैं कि आपको उन्हें दोबारा देखने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता है. ये बात ‘हैवान’ की बड़ी दिक्कत रही है. फिल्म में कई ऐसे सीन्स हैं, जो कुछ खास योगदान न देने के बावजूद कहानी का हिस्सा हैं. शुरुआती आधे घंटे में ही तीन गाने ठूस दिए गए हैं. वो फिल्म देखते हुए तो अच्छे लगते हैं, मगर कहानी को बेवजह खींचने का काम करते हैं. दूसरी तरफ़, कई मुद्दे बेहद ज़रूरी होते हुए भी हवा के झोंके जैसे निकल जाते हैं.

उदाहरण के लिए, अक्षय कुमार ने फिल्म में परशुराम नाम के एक खूंखार सीरियल किलर का रोल किया है. परशुराम एक के बाद एक सात लोगों की हत्या कर चुका है. मगर उसने उन्हीं लोगों को क्यों चुना, कहानी में इस पर रत्ती-भर बात नहीं की गई. परशुराम की बैकस्टोरी के नाम पर एक ब्लैक एंड वाइट सीक्वेंस के अलावा कुछ भी नहीं है. जहां तक मुझे याद है, परशुराम ने फिल्म के अंत तक कम-से-कम 9 लोगों को मार दिया था. लेकिन स्क्रीन पर आप केवल ढाई मर्डर ही देख पाते हैं. दो वो लोग हैं, जिनकी हत्या करते हुए आप अक्षय को अपनी आंखों से देखते हैं. वहीं आधा वो शख्स है, जो छत से तो गिरता है, लेकिन उस वक्त स्क्रीन पर अक्षय कहीं नज़र नहीं आते. इनके अलावा अन्य लोगों की मौत को प्रियदर्शन ने एक डायलॉग से ज्यादा समय देना जरूरी नहीं समझा. उनसे ज्यादा समय तो एक प्रेमी जोड़े को दे दिया गया, जिनके कहानी में होने या न होने से कुछ फर्क भी नहीं पड़ता.

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वैसे, बड़े पर्दे पर ‘हैवान’ को देखते हुए मुझे महसूस हुआ कि ये केवल अक्षय और सैफ के लिए ही नहीं, बल्कि प्रियदर्शन के लिए भी एक एक्सपेरिमेंटल मूवी है. उन्हें ‘ओप्पम’ को ग्राउंडेड रखा था. मगर ‘हैवान’ स्टाइलिश लगती है. ये उन चुनिंदा फिल्मों में से एक है, जहां मुंबई के शीशे को एक्सप्लोर किया गया है. शीशे से हमारा मतलब ऊंची इमारतों में लगे कांच से है. उनके रिफ्लेकशन और फिल्म के डार्क टोन के मिश्रण से आपको मार्वल के ‘डेयरडेविल’ शो की याद आ जाती है. वहां न्यू यॉर्क शहर को इसी तरह पेश किया गया था. मगर प्रियदर्शन की फिल्मों में आपको ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिलेगा. ‘हैवान’ के ये सीन्स फिल्म की सिनेमैटोग्राफी के कारण और निखर गए हैं. इस डिपार्टमेंट में मेकर्स को पूरे मार्क्स मिलने चाहिए. पहाड़ों के कुछ आउटडोर सीक्वेंस तो इतने खूबसूरत हैं कि आपको मूवी छोड़कर सीधे वहां छुट्टी पर चले जाने का मन करेगा. फिल्म का एक बड़ा हिस्सा अंधेरे में शूट किया गया है. मगर वहां भी मेकर्स ने रोशनी और परछाई का इस्तेमाल करके सीन को चमका दिया है. ये बात फिल्म की सबसे बड़ी हाइलाइट्स में से एक है.

हाइलाइट्स से याद आया, ‘हैवान’ की असली हाइलाइट सैफ अली खान हैं. ये फिल्म उनके कंधों पर ही आगे बढ़ी है. उन्होंने श्याम नाम के एक नेत्रहीन शख्स का किरदार इतनी संजीदगी से निभाया है कि मैं फिल्म देखते हुए ये भूल ही गया था कि वो असल ज़िंदगी में देख सकते हैं. सैफ के लिए मेरी तरफ़ से इससे बड़ी तारीफ़ कुछ और नहीं हो सकती. हां, एक रेसलर के तौर पर वो खास इंप्रेस नहीं करते. लेकिन एक नेत्रहीन के रूप में उन्होंने ‘हैवान’ में अपने करियर के सबसे बेहतरीन काम में से एक किया है.  

दूसरी तरफ़, अक्षय ने विलन के तौर पर एक बार फिर साबित किया कि वो एक्सपेरिमेंट करने से डरते नहीं हैं. ‘हैवान’ के फर्स्ट हाफ़ में वो जब भी स्क्रीन पर आए, मेरे रोंगटे खड़े हो गए. उन्होंने इस कहानी में एक क्रीपी स्टॉकर और सीरियल किलर का किरदार बखूबी निभाया है. फर्स्ट हाफ़ में तो वो काफी अनप्रेडिक्टेबल थे और सेकेंड हाफ़ में इंटेलिजेंट. फिल्म में सैफ, नंदिनी नाम की उस बच्ची को सबसे छिपाए रहते हैं. उसके एड्रेस को लेकर घर-परिवार में भी लोगों को कानों-कान खबर नहीं होती. मगर परशुराम यानी अक्षय जिस तरह से उसका पटा ढूंढते हैं, वो काफी सरप्राइजिंग था. उस सीन को देख मेरे बगल में बैठा एक शख्स बोल पड़ा- “क्या दिमाग है यार.” अक्षय के किरदार की सबसे खास बात यही थी कि मेकर्स ने उन्हें केवल ‘हैवान’ ही नहीं बल्कि बुद्धिमान भी बनाया. पर उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही हो गई कि प्रियदर्शन ने उन्हें सही ढंग से सेटअप नहीं किया. अगर परशुराम की बैकस्टोरी को और एक्सप्लोर किया जाता या सीरियल किलर के तौर पर उनके पुराने केस दिखाए जाते, तो अक्षय इस रोल में और जान फूंक देते.

देखा जाए तो ‘हैवान’ में कई दिक्कतें हैं. सच तो ये है कि इसमें खूबियों से ज्यादा खामियां ही हैं. मगर उन पर बात करने से पहले मैं आपको इस मूवी की सबसे बड़ी खासियत बता देता हूं. वो खासियत है अक्षय और सैफ अली खान का फेसऑफ. अक्षय पूरी फिल्म में सैफ से बस कुछ कदमों की दूरी पर ही होते हैं. सैफ भी उन्हें महसूस कर पा रहे हैं. बावजूद इसके, वो किसी को समझा नहीं पा रहे कि कातिल आसपास ही है. एक सीन तो ऐसा भी है, जब दोनों एक लिफ्ट में आमने-सामने होते हैं. दोनों को इस बात का आभास भी है और ये बात फिल्म का थ्रिल बढ़ा देती है.

अक्षय और सैफ का सबसे शानदार फेसऑफ इंटरवल से लगभग 25 मिनट पहले आता है. तब श्याम और परशुराम को पहली बार जाने-अनजाने एक-दूसरे की मौजूदगी का एहसास होता है. प्रियदर्शन ने उस सीन को जिस तरह फिल्माया है, वो उनके बाकी फिल्मों से अलग है. अगर आपको ये न बताया जाए कि इस मूवी को प्रियदर्शन ने डायरेक्ट किया है, तो उस सीक्वेंस को देखकर आपका ठीक अनुमान लगाना भी कठिन हो जाएगा. इंटरवल की घोषणा तो एक ऐसे हाई पॉइंट पर होती है, जिसे देखकर सेकेंड हाफ़ के लिए आपकी उम्मीदें बढ़ जाएंगी. मगर उम्मीद कई बार निराशा की जननी होती है और ‘हैवान’ के साथ भी आगे यही हुआ.

‘हैवान’ को इसकी खूबियों से ज्यादा कमियों के लिए याद किया जाएगा. इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी है. शुरुआती आधा घंटा भी स्लो है. फिर भी अक्षय और सैफ का फेसऑफ उसे बैलेंस कर देता है. मगर फिल्म का दूसरा हिस्सा तो इतना धीमा हो गया कि खुद अक्षय और सैफ भी उसे देखते हुए बोर हो जाएंगे. सेकेंड हाफ़ की शुरुआत में असरानी जी और शारीब हाशमी की एक बातचीत है. वहां प्रियदर्शन ने अपनी कॉमेडी फिल्मों के उसी टेम्प्लेट को रिपीट कर दिया, जहां अक्सर दो-तीन कैरेक्टर किसी कन्फ्यूजन के कारण आपस में लड़-भिड़ते हैं. ऐसा आपने प्रियदर्शन की ‘खट्टा-मीठा’, ‘दे दना दन’, ‘ढोल’ और ‘भूत बंगला’ जैसी फिल्मों में कई बार देखा है. मगर ‘हैवान’ में उसी च्यूइंग गम को जरूरत से ज्यादा चबाकर बेस्वाद कर दिया गया. ऐसा फिल्म में कोई एक बार नहीं बल्कि कई बार हुआ है.

‘हैवान’ की सबसे बड़ी कमज़ोरी है इसका स्क्रीनप्ले और एडिटिंग. फिल्म को कम-से-कम आधा घंटा कम किया जा सकता था. थ्रिलर फिल्में दो-सवा दो घंटे में ही कस दी जानी चाहिए. ‘ओप्पम’ भी इससे छोटी थी. मगर ‘हैवान’ को ज़रूरत से ज्यादा लंबा करके मेकर्स ने फिल्म का नुकसान ही कर दिया है. मूवी में कई ऐसी बातें हैं, जिनका कोई तर्क नहीं समझ आता. सैयामी खेर फिल्म में एक पुलिस ऑफिसर बनी हैं. मगर अपना काम छोड़कर, वो ज्यादातर समय इधर-उधर ही रहती हैं. नेत्रहीन बने सैफ को अक्षय की मौजूदगी का पता तो चल जाता है, मगर खुद से कुछ चार फीट दूरी पर खड़े पुलिसवालों की भनक नहीं लगती. एक सीन तो ऐसा भी है, जहां सैफ को रेस्टोरेंट में अक्षय द्वारा टच किए गए एक पैकेट से ही उनकी खुशबू आ जाती है. वो भी इसलिए, क्योंकि कई दिन पहले हुई लड़ाई में उन्होंने अक्षय के हाथ में पिज़्ज़ा का सेंट पाया था. क्या इसका मतलब ये है कि अक्षय के किरदार ने इतने दिनों से अपने हाथ नहीं धोए? ऐसी बातों के लिए प्रियदर्शन क्या तर्क देंगे, ये बड़ा सवाल रहेगा.

कुल मिलाकर, ‘हैवान’ एक ऐसी फिल्म है, जिसमें पोटेंशियल तो खूब था मगर उसे सही तरह से भुनाया नहीं गया. फिल्म का प्लस पॉइंट ये है कि सैफ और अक्षय अपने रोल्स में अच्छे लगते हैं. शारिब हाशमी, बोमन ईरानी, राजपाल यादव और असरानी को जितना काम दिया गया, वो उसमें फिट बैठे. कंचन पगारे बहुत नैचुरल और फनी थे. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी शानदार है. बैकग्राउंड म्यूज़िक भी ज़बरदस्त. अक्षय और सैफ के फेसऑफ वाला हर सीन देखने लायक है. टुकड़ों में ही सही, ये फिल्म कुछ मौकों पर इंटेलिजेंट भी महसूस होती है.

रही ‘हैवान’ के नकारात्मक पक्ष की बात, तो इसको ज्यादातर नुकसान स्क्रीनप्ले और एडिटिंग की वजह से हुआ है. 2 घंटे 44 मिनट की लंबाई एक थ्रिलर के हिसाब से काफी ज्यादा लगती है. सैयामी खेर, श्रिया पिलगांवकर, राजेश शर्मा और मनोज जोशी जैसे एक्टर्स का सही इस्तेमाल नहीं किया गया है. नंदिनी के रोल में नज़र आईं पहल चौधरी, जिनको मारने-बचाने के लिए पूरी कहानी चली, उन्हें फिल्म में काफी कम स्क्रीनटाइम मिला है. अक्षय को बतौर सीरियल किलर सेट न करना, इस फिल्म की सबसे बड़ी खामियों में से एक है. गाने, फिल्म देखते हुए अच्छे लगते हैं मगर उनका असर इतना कम है कि सिनेमाघर से बाहर आते ही आप उन्हें भूल जाते हैं. भूलने से याद आया, फिल्म की एन्डिंग भी कुछ ऐसी ही है. कुल मिलाकर, ‘हैवान’ का पूरा लेखा-जोखा यही है. हम अपनी तरफ़ से इसे देते हैं ढाई स्टार.

वीडियो: अक्षय कुमार और सैफ अली खान की फिल्म ‘हैवान’ का टीज़र हुआ जारी

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