तकरीबन 26 साल पहले. जब मैं पूरा आठ महीने का भी न हुआ था. एक फिल्म आई थी 'यलगार'. उसमें म्यूजिक डायरेक्टर विजू शाह और छन्नी सिंह का अनूठा शाहकार बजा 'आखिर तुम्हें आना है'. ये कहानी आप 'दी लल्लनटॉप डॉट कॉम' पर पढ़ रहे हैं. पोस्टमॉर्टम हाउस पर आ गिरे हैं. यहां हम हर चीज की सलीके से चीर-फाड़ करते हैं, और चीरहरण भी. तो गीत एक सस्ते शेर से आरंभ होता है और दो-तरफा शेरों की लड़ाई में तब्दील हो जाता है. जिंदगी से भागने का पता नहीं पर लगता है संजय दत्त गले में लटकती चेन बप्पी लहरी से चुराकर भागे हैं. इस भागदौड़ में वो कोट उतारना और रेनकोट पहनना तक भूल गए हैं. स्वीमिंग पूल के पार बालकनी में एकबारगी भर्ते वाला गोल बैगन नाचता सा दिखता है. पर अगले ही पल समझ आता है संजय को चढ़ा देसी ठर्रा हम पर भी असर कर रहा है. वो तो नगमा हैं जो सिर से पांव तक बैंगनी हो रखी हैं.

संजय दत्त उनसे खुद को संभालने की गुज़ारिश कर रहे हैं, पर नग़मा बेबस हैं. उनका नाच यहां-वहां से निकलता ही जा रहा है. गाने की कोरियोग्राफी देख शक होता है कि डांस के सारे स्टेप्स एनीमल प्लेनेट द्वारा लोमड़ियों के प्रजनन पर शूट की गई डॉक्यूमेंट्री से ली गई है जिसमें नर और मादा अपने हाव-भाव से एक-दूसरे को रिझाने की कोशिश करते हैं.

गाने के उस हिस्से तक आते-आते जहाँ नगमा दुल्लक चाल की बजाय किसी चोट खाई नागिन सी जमीन पर लोट रही होती हैं, हमें क्लीवेज के दर्शन होते हैं. खुश मत होइए-- बात संजय दत्त की हो रही है. साथ ही हमें ये भी पता चलता है कि गीत में बरसात इतनी जमकर क्यों हो रही है. ऐमज़ॉन के वर्षा-वन का एक बड़ा टुकड़ा संजय दत्त अपनी छाती पर लिए घूम रहे हैं.
अब तक गाने में जो कुछ हुआ वो समझ के परे था. संजय न पानी में नाच रहे हैं, न पूल में कूद रहे हैं, न कमरे में जा रहे हैं. नगमा आलस की इतनी मारी हैं कि नीचे आने की ज़हमत तक नही उठाती हैं. अचानक संजय अपने किसी काल्पनिक दुश्मन से हवाई लड़ाईयां लड़ने लगते हैं.
शायद यही वो दुश्मन थे जिनसे बचने के लिए संजय ने अपने घर में हथियार छुपाए थे. भले ही यह गीत गोंडा से लेकर गोला-गोकर्णनाथ तक के ऑटो की शान बढ़ाता आया हो, पर हर बार ये गाना देख सुनील दत्त का दिल ही जानता रहा होगा कि शर्मिंदगी क्या चीज़ होती है. गीत हमने देखा, आपको बताया, आप भी देखिए औरों को सुझाइए.