इस बदलाव से पहले पोलिंग एजेंट की नियुक्ति को लेकर अलग नियम था और लंबे समय से लागू था. दरअसल, साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि पोलिंग बूथ पर नियुक्त एजेंट का उसी बूथ या उसके नजदीकी बूथ का वोटर होना जरूरी है. ECI ने नए नियम के तहत ये शर्त हटा ली है. अब किसी विधानसभा क्षेत्र का कोई भी वोटर उस इलाके के किसी भी पोलिंग बूथ का पोलिंग एजेंट बनाया जा सकता है. अब इससे किसे घाटा है और किसको फायदा, इसे लेकर TMC और BJP के अपने-अपने तर्क हैं.

तस्वीर- पीटीआई
अपने-अपने तर्क नए नियम के खिलाफ TMC विशेष रूप से मुखर है. उसका कहना है कि नए निर्देश 'दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों' के तहत बनाए गए हैं. पार्टी का आरोप है कि इलेक्शन कमीशन का ये नियम चुनाव में BJP को फायदा पहुंचाएगा. उसने विरोध जताते हुए नए नियम को 'मनमाना, (राजनीति से) प्रेरित और पक्षपातपूर्ण' करार दिया है. आयोग को बीती 26 मार्च को लिखे पत्र में पार्टी ने कहा था,
'ये नियम कुछ विशेष राजनीतिक दलों, यानी BJP की मदद करने के लिए लागू किया गया है, क्योंकि उसके संगठन की क्षमता इतनी नहीं है कि वो हरेक बूथ के लिए एजेंट नियुक्त कर सके.'TMC के इस दावे का आधार एक ऑडियो क्लिप है. इसमें कथित रूप से BJP के दो बड़े नेताओं की बातचीत रिकॉर्ड है. बीते हफ्ते TMC ने ये ऑडियो जारी किया था. पार्टी ने इसके हवाले से दावा किया था कि बंगाल में BJP के संगठन की पहुंच ज्यादा नहीं है. उसने कहा था कि बंगाल में कई पोलिंग बूथों पर BJP अपने एजेंट नहीं बिठा पाएगी. क्या था क्लिप में? इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऑडियो क्लिप में कथित रूप से BJP के मुकुल रॉय और शिशिर बजोरिया की आवाज थी. इसमें रॉय, बजोरिया से कहते हैं कि बूथ एजेंट की नियुक्ति के मामले में BJP को चुनाव आयोग के पास जाना चाहिए. ऑडियो में रॉय ने कहा था कि केवल लोकल लोग ही नहीं, अन्य लोगों को भी बूथ एजेंट बनाए जाने की अनुमति होनी चाहिए, वर्ना पार्टी कई बूथों पर अपने एजेंट नहीं दे सकेगी. बीते शनिवार (27 मार्च 2021) को TMC इस ऑडियो के साथ सामने आई थी.
वर्तमान विधानसभा चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल में एक लाख से भी ज्यादा पोलिंग स्टेशन बनाए गए हैं. जबकि 2 साल पहले ही संपन्न हुए लोकसभा चुनावों के समय राज्य में कुल 78 हजार 903 पोलिंग स्टेशन बनाए गए थे.शनिवार को TMC ने चुनाव आयोग से नए नियम को वापस लेने की अपील की थी. इसके बाद पार्टी के नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा था कि आयोग के इस फैसले के चलते पहले चरण के मतदान के दौरान समस्याएं देखने को मिली थीं. उन्होंने बताया था कि वोटिंग के दौरान बूथ पर मौजूद कई एजेंट एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे.

बीजेपी नेता मुकुल रॉय. (फोटो- PTI)
वहीं, BJP का कहना है कि नए नियम से बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित होंगे. पार्टी ने दावा किया कि बंगाल में TMC अपना जन-समर्थन तेजी से खो रही है, इसलिए नियम के विरोध में इस तरह की बातें कर रही है. उधर, चुनाव आयोग ने भी अपने फैसले का बचाव किया. उसका कहना था कि नया नियम इसलिए बनाया गया ताकि हर पॉलिटिकल पार्टी को पोलिंग एजेंट अपॉइंट करने में मदद मिले. ECI का तर्क है कि कोविड-19 महामारी में पोलिंग बूथ पर बैठने के लिए लोगों को राजी करना मुश्किल है, इसीलिए नया नियम लाया गया. क्या होता है पोलिंग एजेंट? पोलिंग एजेंट चुनाव वाले दिन मतदाता केंद्र में पार्टी या उम्मीदवार का प्रतिनिधि होता है. चूंकि चुनाव के दिन उम्मीदवार हर पोलिंग बूथ पर खुद मौजूद नहीं रह सकता, इसलिए उसकी तरफ से एक एजेंट अपॉइंट किया जाता है. ECI उम्मीदवार को ये अनुमति देता है कि मतदान प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए वो अपनी तरफ से एक पोलिंग एजेंट नियुक्त कर सकता है.
चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, पोलिंग एजेंट को पता होना चाहिए कि EVM और VVPAT के जरिये किस तरह चुनाव कराए जाते हैं. इन मशीनों के इस्तेमाल की जानकारी भी पोलिंग एजेंट को होनी चाहिए. साथ ही, उसे ECI के नियमों से अच्छी तरह वाकिफ होना चाहिए. पार्टी और चुनाव उम्मीदवार का प्रतिनिधि होने के नाते पोलिंग एजेंट रिटर्निंग ऑफिसर की ओर से कराए जाने वाले डेमोन्स्ट्रेशन्स में भाग लेता है. इनमें चुनावी प्रक्रिया में EVM और VVPAT के इस्तेमाल और संचालन के बारे में विस्तार से बताया जाता है.
अब चलते-चलते आपको बता दें कि राजस्थान की 3 विधानसभा सीटों पर अप्रैल में उप-चुनाव होने वाले हैं. इनके लिए चुनाव आयोग ने पुराने नियम के तहत ही पोलिंग एजेंट नियुक्त करने की बात कही है. हालांकि लोकल वोटर नहीं मिलने की सूरत में कैंडिडेट को उस चुनाव क्षेत्र के किसी भी मतदाता को एजेंट बनाने की अनुमति दी गई है.













