6 अक्टूबर को राहुल गांधी की चर्चित देवरिया टु दिल्ली कांग्रेस यात्रा पूरी हो गई. इसका हाल बच्चन की फिल्म मुंबई टु गोवा सा होना है. फ्लॉप. बड़े सितारों और प्रचार के बावजूद. वजहें ये रहीं.
1. गुटबाजी ऐसी की नेता जी को लात जूता इसका सर्वोत्तम नमूना 6 अक्टूबर को दिल्ली में दिखा. प्रगति मैदान के भैरों मंदिर के बाहर यूपी की यात्रा में हरियाणे के नेता समर्थक भिड़ गए. एक तरफ पूर्व सीएम भूपिंदर हुड्डा के सपोर्टर. दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और दलित नेता अशोक तंवर के लोग. लाठी चली तो तंवर चोटिल हो गए. ये सिर्फ नमूना है. पूरी यूपी कांग्रेस में भी यही हाल है. पुराने लोग कह रहे हैं कि भीतर से सपाई राज बब्बर को मुखिया बना दिया. सिर्फ भीड़ खींचना पैमाना होता तो ठीक है. मगर इससे हमारा क्रेडिट मर जाता. पिछली बार प्रत्य़ाशी रहे एक युवा नेता ने बताया, मैंने बब्बर की मीटिंग के लिए मना कर दिया. मैं अपनी दम 15 हजार जुटा सकता हूं. मगर हीरो बाबू आएंगे और फिर सब कहेंगे देखिए उनके आते ही लोग जुटने लगे.
2. 27 साल कांग्रेस बेहाल यूपी के लिए नारा गढ़ा था, मगर पार्टी पर फिट बैठता है. विधानसभा में चौपट होना शुरू हो गया था अस्सी के दशक में. एनडी तिवारी को सीएम बना 1989 के चुनाव में उतरे और फिर बैठ गए. पहले मंडल की धार ने धोया, फिर कमंडल की. श्राद्ध कर्म सा कर दिया 1996 के नरसिम्हा राव के फैसले ने. महज 13-14 साल पुरानी बीएसपी को सीनियर पार्टनर बनाकर. उसके बाद से कांग्रेस तीन दर्जन के नीचे ही सिमटी रही. 2007 में 22 पर पहुंची तो 2012 में राहुल के घनघोर प्रयासों के बाद भी 28 तक पहुंची. याद रखिए ये 28 तब आया, जब प्रदेश में कांग्रेस के 20-22 सांसद थे. केंद्र में सरकार थी. कर्जा माफी की बयार थी. और बीजेपी मैदान में नजर नहीं आ रही थी. इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है. सांसद कुल दो. एक मम्मी, दूसरा बेटा. केंद्र से टंडीले उखड़ चुके हैं. 10 साल के राज में यूपी के लिए बताने को सिर्फ कर्जा माफी. और टैग बस एक. वोट कटवा हैं.
3. बासी कढ़ी में उबाल वो भी अधूरा दिल्ली के न्यूज रूम में कांग्रेस के मास्टर स्ट्रोक की बड़ी चर्चा रही. जमीन पर आदमी इसे हंसकर उड़ा रहा है. शीला दीक्षित को सीएम फेस बनाने का फैसला. 15 साल दिल्ली की सीएम रहीं. तो यहां पर उनके विकास को पड़ोसी सूबे में प्रोजेक्ट करने का फैसला. मगर इसमें कई दिक्कतें हैं. पहली, शीला की सेहत. वह राहुल की किसान यात्रा के ज्यादातर हिस्सों से नदारद रहीं. दिल्ली नहीं छूट रही उनसे. और सूबे के नेताओं का, खासतौर पर जिले के फुट सोल्जरों का उनसे कोई राब्ता नहीं. दिल्ली में शीला हर वार्ड में दस लोगों को जानती होंगी. यूपी में हर लोकसभा में भी दस न होंगे. ब्राहमण वोटरों की बात हुई. पर सवर्ण झुरा बीजेपी की तरफ जाते दिख रहे हैं. वे दलित-मुस्लिम के कागजी गठजोड़ का हिस्सा बनने को तैयार नहीं. शीला को इसका इलहाम है. उन्हें चिंता है तो बस बेटे संदीप दीक्षित के करियर की. जो इस वक्त किनारे पड़े हैं. शीला यूपी में नहीं अटकना चाहतीं, इसलिए ये भी कहा जा रहा है कि वह विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगी. लॉजिक वही पुराना, एक सीट पर फोकस वेस्ट क्यों करना. पूरा सूबा है.
4. प्रशांत किशोर का विपक्ष घर में ही मौजूद यूएन से नौकरी कर लौटे, मोदी कैंपेन से मशहूर और नीतीश कैंपेन से 56 तोले की करधन बने प्रशांत किशोर. अब कांग्रेस की गोद में. मगर पंजाब और यूपी में उन्हें पार्टी नेता झेल नहीं पा रहे हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साफ कहा, टिकट पीके नहीं हम बांटेंगे. वो बस पीछे से मदद के लिए हैं. वहां आम आदमी पार्टी के उभार ने 10 साल बाद भी कांग्रेस की वापसी के अभियान में मुश्किलें पैदा कर रखी हैं. जबकि माहौल अकाली-भाजपा के भरपूर खिलाफ है. मोदी लहर में भी यहां एनडीए ढेर रहा. यूपी की बात करें तो राज बब्बर ने भी बोला, क्या पीके पीके करते हैं आप लोग. वे सब टेक्निकल सपोर्ट भर के लिए हैं. खुद पीके क्या सोचते हैं नहीं पता. पता बस इतना है कि उनके बिल पास नहीं हो रहे. कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने कलम चला दी है. पत्रकार राशिद किदवई ने एबीपी न्यूज के लिए लिखे कॉलम में ये सब बताया. पीके को लगा था कि खाट यात्रा खबरों में रहेगी. रही. मगर राहुल के बोले से ज्यादा खाट चोरी के लिए. और 6 अक्टूबर को राजकुमार ने बोल दिया. खून की दलाली. लोगों को मौत का सौदागर बयान याद आ गया. सोनिया ने दिया था. गुजरात में. और मोदी को भरपूर बारूद मिल गया था.
5. सर्जिकल स्ट्राइक पर कांग्रेस का सेल्फ गोल राहुल गांधी ने पहले उड़ी हमले के बाद हुए सर्जिकल स्ट्राइक का सपोर्ट किया. फिर पार्टी नेताओं ने एक एक कर विरोध शुरू किया. और दिल्ली में राहुल बोले. मोदी खून की दलाली कर रहे हैं. जमीन पर आलम ये है कि पब्लिक चीख रही है. भाई मोदी ने दिखा दिया. राहुल इतिहास का सबक भूल गए. उनकी दादी इंदिरा गांधी ने देश को बहुत चीजें दीं. इमरजेंसी. राज्य सरकारों की बर्खास्तगी. वनमैनशिप. पर जनता फिर भी उन्हें हर पोल में बेस्ट पीएम बताती है. क्यों. क्योंकि इंदिरा ने पाकिस्तान को 71 की लड़ाई में हौंका. इसके दो सबक हैं. पहला, जो पाकिस्तान को लथेरा, उसकी जय होगी. दूसरा, फौज जंग लड़ती है, मगर राजनीतिक फायदा उसे इजाजत देने वाले राजनीतिक नेतृत्व को होता है. 71 में इंदिरा को हुआ. 1999 में करगिल विजय के बाज वाजपेयी को हुआ. और अब मोदी को हो रहा है.
6. बस्ता कौन संभालेगा हाथ का सबसे अहम सवाल. बूथ लेवल पर कांग्रेस की गैरमौजूदगी का. इसके लिए पीके के पास योजना थी. कि हर बूथ पर कांग्रेस का एक एक्टिव मेंबर हो. जो कैंडिडेट का बस्ता संभाले. बस्ता माने के चुनाव के दिन के लिए कियोस्क. जिसमें प्रचार सामग्री, गांव की वोटर लिस्ट, वोटर स्लिप वगैरह हो. पर ऐसा हो नहीं पाया. यहीं पर सपा, बसपा और भाजपा उनसे मीलों आगे हैं. बूथ लेवल संगठन की एक ही काट होती है. तगड़ी लहर. जैसे 2014 के चुनाव में पंजाब में आम आदमी पार्टी के लिए थी. तो बिना बूथ के भी चार सीटें जीत गए और दो तीन पर नंबर दो रहे. पर कांग्रेस के लिए यूपी में न तो कई लहर है और न ही कोई जबर नारा.
7. ट्रंप कार्ड प्रियंका राहुल की बहन में लोगों को इंदिरा की छवि दिखती है. पर इंदिरा की छवि याद रखने वाली पीढ़ी अब बुजुर्ग हो गई है. उसके बाद राजीव-अटल-सोनिया के दौर बीत चुके हैं. अब मोदी-केजरीवाल- अखिलेश-मायावती का जमाना है. ऐसे में लोग नोस्टैलजिक तो होंगे. मगर वोट कितना देंगे, कोई भी बता सकता है. अब तक प्रियंका गांधी ने राजनीतिक जमीन कितनी नापी. सिर्फ दो लोकसभा. अमेठी और रायबरेली. यहां गांधी परिवार और केंद्र के प्रोजेक्ट्स के नाम पर वोट भी मिले. मगर लोकसभा में. विधानसभा में तो फर्स्ट डिवीजन भी न आई. प्रियंका स्मार्ट हैं. राहुल के मुकाबले ज्यादा राजनीतिक समझ दिखती है. मगर इसकी रियल टेस्टिंग अब होगी. और फिर खुद उन्हीं के शब्दों में, वह बरसाती मेंढक हैं. चुनाव के वक्त नजर आती हैं. बाकी अपने परिवार में व्यस्त रहती हैं तो पब्लिक उनके कहे पर कितना ऐतबार करे. और परिवार की बात आएगी तो लैंड डील के इल्जामों में घिसे दामाद जी के किस्से भी साथ लाएगी.
8. उधर की तीनों पार्टी तगड़ी हैं कई बार अपनी तैयारी बहुत अच्छी न हो, तब भी काम चल जाता है. बशर्ते सामने वाले भी ढीले हों. पर यूपी में ऐसा नहीं है. तीन पार्टियां, तीनों का सब कुछ दांव पर. सत्तारूढ़ सपा. कभी पलटकर कुर्सी न पा पाई. मुलायम के लिए आखिरी मौका है. दिल्ली की गद्दी पर दावेदारी का. साल 2019. उनकी गणित. संगठित विपक्ष, जिसके वह बनें सर्वमान्य नेता. मगर इसके लिए यूपी की किल्ली बचाए रखना जरूरी. परिवार में कलह. अखिलेश की अच्छी छवि. बूथ पर मजबूती. सब कुछ है. कांग्रेस से तो बहुत ही 21 है. दूसरी पार्टी बीएसपी. मायावती के राज में गुंडाराज के खात्मे की याद. कोई दंगा फसाद नहीं. और दलितों का सॉलिड वोट. मुस्लिम भी उनकी तरफ आते दिख रहे हैं. इसीलिए बहन जी ने इस जमात को हुसड़ कर टिकट भी बांटे हैं. बामसेफ और डीएस4 के दिनों से एक्टिव संगठन. सबकी सीधी रिपोर्टिंग मायावती को. इसीलिए तमाम बगावत के बावजूद बूथ लेवल पर उनकी मौजूदगी पुख्ता. तीसरी, बीजेपी. जिसे बिहार के बाद अब यूपी कतई नहीं गंवाना. इसीलिए हर बाजी समझकर चली जा रही. बूथ लेवल पर संगठन को अमित शाह ने यूपी चुनाव के पहले दुरुस्त करना शुरू किया. सत्ता की चाशनी ने गारे का काम किया. 73 सांसद. कई मंत्री. और राज्य में वापसी का सामने नजर आता सपना. पार्टी ग्राउंड लेवल पर तैयार है. अब तक उसे सीएम फेस कौन हो, वाला सवाल परेशान कर रहा था. मगर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ये भी पीछे चला गया. शहरों गांवों में जाइए. 10 मिनट में हवा का रुख समझ आ जाता है. बीजेपी को बस एक ही चिंता करनी है. गौ सेवा के नाम पर दलितों की पिटाई और अखलाक से कांड न हों. विकास का नारा बचा रहे. मोदी को यहां बिहार की तरह बाहरी का आरोप भी नहीं झेलना पड़ेगा. बनारस के सांसद हैं तो बाहरी कैसे हुए. और इन सबके मुकाबले कांग्रेस. कराह रही है. दिल्ली में कागजों पर तमाम यूफोरिया के बावजूद.
9. क्या कोई सूरत नजर नहीं आती एक संभावना थी. कि कांग्रेस बिहार की तर्ज पर यूपी में भी विपक्षी दलों का गठजोड़ बना ले. बसपा इसके लिए राजी नहीं हुई. तमाम कोशिशों के बाद मायावती की तरफ से जो शर्तें आईं, उसमें कांग्रेस को 96 की याद आई. अखिलेश की राहुल ने तारीफ की. पर सपा को इसकी जरूरत फिलहाल समझ नहीं आती. पार्टी अपने दम सत्ता में है. बचे छोटे दल. वो पहले ही आरएलडी, जेडीयू, आरके चौधरी के बैनर तले गोलबंदी कर रहे हैं. अब कांग्रेस इसी के साथ जा सकती है. पर ये सब मिलकर भी चौथी शक्ति बनते नजर नहीं आते. आरएलडी के अजित सिंह की राजनीतिक साख खत्म हो चुकी है. जयंत चौधरी को इस नए गठबंधन ने सीएम कैंडिडेट बना दिया है. तो कांग्रेस को या तो जयंत को मनाना होगा या शीला को बैठाना होगा. दोनों ही बातें फिलहाल मुमकिन नहीं. इसलिए एकला चलो ही गुनगुनाया जा रहा है. तो कांग्रेस के सिपाही. राहुल गांधी. कहीं 22 सीट (2007 का चुनाव, अब तक के सबसे कम पंजा विधायक) से नीचे न चले जाना. तुम्हारे नेतृत्व में पहले ही कांग्रेस 44 लोकसभा सांसदों का एक लोएस्ट टोटल रेकॉर्ड बना चुकी है. बाकी आपकी मेहनत पर किसी को शक नहीं. उमस वाली गर्मी में सूबी की एक महीने तक यात्रा कर आपने काडर को जगाया है. पर जरूरत मोमेंटम बनाए रखने की है. फिजिक्स तो आपकी है ही उम्दा. मुझे आज भी इस्केप वेलॉसिटी वाला लतीफा याद है.