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आरजी कर से संदेशखाली तक: वो 5 बड़े कारण जिनसे बंगाल की महिलाएं ममता से दूर और बीजेपी के करीब हुईं

Bengal BJP Women Supporters: बंगाल की राजनीति में 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं का जिक्र जरूर होता है जो महिलाओं की जेब में सीधा पैसा पहुंचाती हैं. लेकिन अब सवाल सिर्फ जेब का नहीं, बल्कि जान और सम्मान का बन गया है. इसी वजह से जो महिलाएं कल तक ममता के लिए ढाल बनी खड़ी थीं, आज वही बीजेपी के पाले में खड़ी नजर आ रही हैं.

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क्यों दीदियों ने इस बार बीजेपी का दामन थाम लिया (फोटो- इंडिया टुडे)

दीदी ओ दीदी. ये नारा आपको याद होगा. 2021 के चुनावों में ये नारा ममता बनर्जी के खिलाफ उछाला गया था, लेकिन तब बंगाल की महिलाओं ने इसे अपनी अस्मिता से जोड़ लिया और ममता को छप्पर फाड़कर वोट दिए. बंगाल की राजनीति का एक सीधा सा गणित रहा है कि जिसकी मुट्ठी में महिला वोटर, उसकी मुट्ठी में सत्ता की चाबी. ममता बनर्जी ने सालों तक इस चाबी को संभालकर रखा, लेकिन अब हवा का रुख बदलता दिख रहा है. जमीन से जो खबरें और आंकड़े निकलकर आ रहे हैं, वो बताते हैं कि ममता बनर्जी का सबसे मजबूत वोट बैंक यानी महिलाएं अब उनसे छिटककर बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो रही हैं.

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ये बदलाव रातों-रात नहीं हुआ है और न ही ये किसी एक चुनावी वादे का नतीजा है. इसके पीछे वो गुस्सा है जो बंगाल की गलियों और अस्पतालों से निकला है. जब हम बंगाल की राजनीति की बात करते हैं, तो 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं का जिक्र जरूर होता है जो महिलाओं की जेब में सीधा पैसा पहुंचाती हैं. लेकिन अब सवाल सिर्फ जेब का नहीं, बल्कि जान और सम्मान का बन गया है. इसी वजह से जो महिलाएं कल तक ममता के लिए ढाल बनी खड़ी थीं, आज वही बीजेपी के पाले में खड़ी नजर आ रही हैं.

इस पूरे बदलाव को समझने के लिए हमें उन जख्मों को कुरेदना होगा जिन्होंने बंगाल की महिलाओं के भरोसे को हिलाकर रख दिया. आखिर ऐसा क्या हुआ कि 'मां, माटी, मानुष' का नारा देने वाली सरकार के राज में महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करने लगीं. चलिए, आज के इस मेगा एक्सप्लेनर में हम इसी पहेली को सुलझाते हैं कि कैसे आरजी कर मेडिकल कॉलेज से लेकर संदेशखाली तक की घटनाओं ने बंगाल की सियासत का पूरा भूगोल ही बदल दिया.

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आरजी कर कांड और ममता की साख पर लगा गहरा दाग

कोलकाता का आरजी कर मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक अस्पताल नहीं रह गया है, बल्कि ये ममता सरकार की गिरती साख का प्रतीक बन चुका है. एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ जो दरिंदगी हुई, उसने पूरे देश को हिला दिया, लेकिन बंगाल की महिलाओं के लिए ये एक पर्सनल धक्का था. लोगों को उम्मीद थी कि एक महिला मुख्यमंत्री होने के नाते ममता बनर्जी इस मामले में न्याय की मिसाल पेश करेंगी, लेकिन हुआ इसके उलट. जिस तरह से शुरुआती जांच में लीपापोती के आरोप लगे और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की बातें सामने आईं, उसने आम महिलाओं के मन में डर और गुस्सा भर दिया.

महिला सुरक्षा को लेकर जो भरोसा तृणमूल कांग्रेस ने सालों में बनाया था, वो इस एक घटना के बाद ताश के पत्तों की तरह ढह गया. सड़कों पर उतरीं लाखों महिलाओं के हाथों में मशालें थीं और जुबान पर सिर्फ एक ही सवाल था कि अगर सिस्टम ही गुनहगारों को बचाने लगे तो हम कहां जाएं. बीजेपी ने इसी गुस्से को भांपा और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय एक सामाजिक आंदोलन की शक्ल दे दी. जब महिलाएं आधी रात को सड़कों पर 'रिक्लेम द नाइट' का नारा बुलंद कर रही थीं, तब ममता सरकार की पुलिस उन पर सख्ती कर रही थी. इसी रवैये ने आग में घी का काम किया.

बीजेपी ने इस मुद्दे को घर-घर पहुंचाया और ये संदेश देने में कामयाब रही कि ममता बनर्जी अब महिलाओं की रक्षक नहीं बल्कि सत्ता बचाने वाली नेता बन गई हैं. मध्यमवर्गीय परिवारों से लेकर गांव की महिलाओं तक में ये बात बैठ गई कि अगर डॉक्टर जैसी सुरक्षित जगह पर बेटी महफूज नहीं है, तो फिर कहीं भी नहीं है. आरजी कर कांड ने ममता के उस नैरेटिव को तोड़ दिया जिसमें वो खुद को बंगाल की हर बेटी की 'अभिभावक' कहती थीं.

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संदेशखाली का खौफ और टीएमसी के दबंगों की कहानी

संदेशखाली की कहानी जब बाहर आई, तो रूह कांप गई. ये सिर्फ जमीन कब्जाने का मामला नहीं था, बल्कि वहां की महिलाओं ने जो आरोप लगाए वो सीधे तौर पर यौन शोषण और मानवाधिकारों के हनन से जुड़े थे. शाहजहां शेख और उसके गुर्गों ने जिस तरह से वहां समानांतर सरकार चला रखी थी, उसने ममता सरकार के प्रशासन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए. सबसे ज्यादा तकलीफदेह बात ये थी कि महिलाएं सालों तक ये जुल्म सहती रहीं और पुलिस उनकी सुनने के बजाय उन्हें डराती रही.

जब संदेशखाली की महिलाओं ने हिम्मत दिखाकर कैमरे के सामने बोलना शुरू किया, तो बंगाल की राजनीति में भूचाल आ गया. बीजेपी ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और संदेशखाली को बंगाल में महिला सुरक्षा की बदहाली का पोस्टर बना दिया. वहां की महिलाओं ने खुलकर कहा कि ममता बनर्जी की पुलिस ने उन्हें बचाने के बजाय अपराधियों का साथ दिया. ये एक ऐसा मोड़ था जहां से ग्रामीण इलाकों की महिला वोटरों ने ममता से किनारा करना शुरू कर दिया.

संदेशखाली ने ये साबित कर दिया कि सत्ता के नशे में चूर छोटे स्तर के नेता किस कदर बेलगाम हो गए हैं. ममता बनर्जी ने इसे साजिश बताया, लेकिन वहां की पीड़ित महिलाओं के आंसू किसी साजिश का हिस्सा नहीं थे. बीजेपी ने इन महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान का भरोसा दिया, जिससे वो साइलेंट वोटर जो कभी टीएमसी के साथ था, अब भगवा झंडे की ओर झुक गया. ये संदेशखाली ही था जिसने ममता के 'महिला सुरक्षा' वाले गढ़ की नींव हिला दी.

योजनाओं का लालच बनाम सुरक्षा की मांग

ममता बनर्जी की 'लक्ष्मी भंडार' योजना को गेम चेंजर माना जाता था. इसमें महिलाओं को हर महीने एक निश्चित राशि दी जाती है. लंबे समय तक इस योजना ने ममता के वोट बैंक को बचाए रखा. लेकिन इस बार के चुनाव में एक नया ट्रेंड देखने को मिला. महिलाओं ने पैसा तो लिया लेकिन वोट सुरक्षा के नाम पर दिया. इसे आप 'खामोश क्रांति' कह सकते हैं. महिलाओं का तर्क सीधा था कि हाथ में कुछ रुपये होने का क्या फायदा, अगर घर से बाहर निकलने पर इज्जत और जान की गारंटी न हो.

बीजेपी ने अपनी रैलियों में इस बात को जोर-शोर से उठाया कि ममता सरकार महिलाओं को चंद रुपये देकर उनकी चुप्पी खरीदना चाहती है. उन्होंने वादा किया कि वो न सिर्फ आर्थिक मदद बढ़ाएंगे बल्कि पुलिस और प्रशासन में ऐसा सुधार करेंगे कि किसी शाहजहां शेख की हिम्मत न हो सके. ये बात बंगाल की उन महिलाओं को छू गई जो रोजमर्रा की गुंडागर्दी और सिंडिकेट राज से तंग आ चुकी थीं.

खासकर युवा लड़कियां और पहली बार वोट देने वाली महिलाएं ममता के पुराने जादू से बाहर निकल आईं. उनके लिए सड़कों पर आजादी और सुरक्षा ज्यादा अहम थी. ममता सरकार जहां पुराने आंकड़ों के दम पर खुद को बेहतर बता रही थी, वहीं बीजेपी ने भविष्य का वो सपना दिखाया जहां महिलाएं बिना डरे अपना काम कर सकें. यही वजह है कि सरकारी योजनाओं के बावजूद ममता का वोट शेयर कम हुआ और बीजेपी का ग्राफ बढ़ गया.

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क्या बीजेपी अब बंगाल में परमानेंट महिला पसंद बन गई है

ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ममता का प्रभाव पूरी तरह खत्म हो गया है, लेकिन बीजेपी ने उनके सबसे बड़े हथियार को उनके खिलाफ इस्तेमाल करना सीख लिया है. बीजेपी की महिला विंग ने जमीनी स्तर पर जाकर महिलाओं को ये समझाया है कि मोदी सरकार की उज्ज्वला और आवास योजनाएं सिर्फ चुनावी फायदे के लिए नहीं हैं. साथ ही उन्होंने ये भी दिखाया कि केंद्र सरकार महिला सुरक्षा के कड़े कानूनों की बात करती है.

बंगाल में इस बार महिलाओं ने अपनी राजनीतिक समझ का परिचय दिया है. उन्होंने दिखा दिया कि वो सिर्फ लाभार्थी बनकर खुश रहने वाली नहीं हैं, बल्कि वो स्टेकहोल्डर हैं जो जवाबदेही मांगती हैं. बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता इस बात का सबूत है कि बंगाल की महिलाएं अब बदलाव चाहती हैं. वो एक ऐसा माहौल चाहती हैं जहां क्राइम के बाद 'जस्टिस' के लिए उन्हें सड़कों पर हफ्तों तक भूखा-प्यासा न बैठना पड़े.

ममता बनर्जी के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती है. अगर वो अपनी क्रेडिबिलिटी वापस पाना चाहती हैं, तो उन्हें सिर्फ योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय अपने प्रशासन और पार्टी के कार्यकर्ताओं पर नकेल कसनी होगी. बंगाल चुनाव के नतीजों और ट्रेंड्स ने ये साफ कर दिया है कि आरजी कर और संदेशखाली जैसी घटनाएं किसी भी सरकार की जड़ें हिलाने के लिए काफी हैं. बीजेपी ने इस बार महिलाओं के भरोसे को जीता है, और यही बंगाल की राजनीति का नया सच है.

वीडियो: पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने अखिलेश, केजरीवाल का नाम क्यों लिया?

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