मुलायम सिंह यादव के हाथ से साइकिल चली गई. प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देखने वाले 'नेताजी' अपनी सियासत के आखिरी दौर में खुद के लड़के से मात खा गए हैं. इस हार से भी बड़ी कसक उनके लिए इस बात की है कि जिस यादव कुनबे और पार्टी के वो मालिक-मसीहा बने बैठे थे, वो भी उनका साथ छोड़ गया. बाकी दुनिया की सिम्पैथी चाहे जिस के साथ हो, मगर यूपी में पले-बढ़े नौजवानों का बड़ा हिस्सा इससे खुश ही होगा. मुलायम सिंह यादव आज जिस गम में हैं, वो उन्हें मिलना जरूरी था. मन करता है कि उनसे पूछा जाए कि लड़कों से गलती हो गई क्या?
बुढ़ापा ही है, जो लोगों को लीजेंड बना देता है. उनकी सारी खताएं माफ हो जाती हैं. मगर 20 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश को दो दशक तक अपने परिवार की जागीर समझ कर चलाने वाले, समाजवाद के नाम पर गुंडागर्दी को संरक्षण देने और गंभीर सवालों को हंस के टाल देने वाले यादवकुल मुखिया को आसानी से बरी नहीं किया जा सकता. नियति ने भी उन्हें बरी नहीं किया. बात करते हैं उन वजहों की, जिनके चलते ‘माननीय मुलायम सिंह यादव’ को मिला ये आखिरी दर्द बिल्कुल जायज़ मालूम पड़ता है.
1. समाजवाद की हत्या
डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के सिद्धांतों में न परिवारवाद की जगह थी, न गुंडागर्दी की. मुलायम ने चंद्रेशखर और चरण सिंह को जिस तरह किनारे किया, उसे रणनीतिक विचलन भर कहना नाकाफी होगा. लोहिया की विचार-विरासत को मुलायम ने एक जाति विशेष की गुंडागर्दी में तब्दील कर दिया, इसके लिए इतिहास उन्हें कैसे माफ करेगा.
2. कानून का कत्ल
अखिलेश यादव की सरकार पर लॉ एंड ऑर्डर न संभाल पाने के बड़े आरोप लगते हैं. संभाले भी कैसे, गेस्टहाउस कांड याद है न आपको. सरकार जाने के डर से राजधानी में सत्ताधारी पार्टी के गुंडे एक महिला नेता की जान के पीछे पड़ जाते हैं. या रामपुर तिराहा कांड की बात करें. अलग राज्य उत्तराखंड की मांग कर रहे लोगों पर गोली चलती है. 6 मौतें होती हैं, कई बलात्कार होते हैं. और तब मुलायम कहते हैं,
“पहाड़ वालों की परवाह मैं क्यों करूं, आखिर उन्होंने कौन सा मुझे वोट दिया था.” क्यों इसकी गिनती 2002 और 84 के नरसंहारों के बाद दिए गए बयानों में नहीं होनी चाहिए. प्रदेश की अदालतों में गुंडागर्दी, दस्यु सरगनाओं का टीवी पर खुलकर पार्टी नेताओं को अपना संरक्षक बताना. वोट की खातिर तमाम डकैतों, अपराधियों, हिस्ट्रीशीटर्स को चुनाव लड़वाना, बलात्कार जैसी बातों पर तमाम घटिया बयान, यूपी में कानून की बात करना ही गैरकानूनी हो गया और इसकी ज़िम्मेदारी? आप ही बताइये नेताजी किस पर डाल दी जाए?
3. शिक्षा और रोजगार
2004 में उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाओं में स्वकेंद्र व्यवस्था शुरू हुई थी. तब मुलायम ही मुख्यमंत्री थे. नकल कर पास करवाने वाले कॉलेजों की पूरी चेन बन गई. इसके बाद सिपाही भर्ती में ऐसे तमाम लोगों को वर्दी मिल गई जिनकी लंबाई उनकी रायफल के बराबर थी. बाद में भर्तियां रद्द हुई, जिनकी नौकरी लगी थी वो भी कहीं के न रहे और जो ईमानदारी से तैयारी कर रहे थे उनमें से भी कई को ठौर-ठिकाना न मिला. कंप्यूटर अनुदेशक, व्यवसायिक शिक्षक और शिक्षा मित्र, तीनों ही सरकारी तंत्र में आपकी सरकार की रोज़ बदलते नियमों और धांधलियों के बंदरबांट में अदालतों के आदेशों फेर में कैसे पड़े रहे, याद है ना नेताजी. आज की तारीख में तो यूपी में एक चुटकुला चलने लगा है कि यूपी में आने वाले नए टीचर तो इस लायक भी नहीं कि नकल करवा सकें. विडंबना का अर्थ तो जानते हैं नेताजी, हिंदी का ही शब्द है.
4. दकियानूसी के मुखिया
नेताजी, पुराने ज़माने के आदमी हैं. उन्हें लगता है कि कंप्यूटर से नौकरियां कम होंगी. वो हिंदी के प्रति प्रेम और अंग्रेज़ी के अंध विरोध में फर्क नहीं कर पाते हैं. इससे तकलीफ नहीं है. ये ऐसी चीज़ें हैं जिनको सुधारा जा सकता है. मगर मुंबई में बैठे जब आपके वरिष्ठ नेता बलात्कार पर बेहूदे बयान देते हैं तो मुलायम चुप रहते हैं. बोलेंगे किस मुंह से, जब खुद कह चुके हैं कि रेप 'लड़कों की गलती' मात्र है. भ्रष्टाचार के आरोप में कैबिनेट में से बाहर किए गए मंत्री आपके पैर छूकर बहाल हो जाते हैं. ठीक है, आप पुराने ज़माने के नेता हैं. लेकिन नए विचारों को सुनने-समझने की आपकी क्षमता कितनी है?
4. लोकतंत्र का मज़ाक
साढ़े तीन मुख्यमंत्री पर जितने चुटकुले बने हों, मगर एक परिवार के लिए लोकतंत्र का मज़ाक उड़ता रहा. मुज़फ्फरनगर में दंगा पीड़ित खुले आकाश में ठंड से कराह रहे थे और सैफई में महोत्सव चल रहा था. चुनी हुई सरकार के मुखिया और सामंतवादी परिवार के मालिक के बीच का फर्क खत्म हो गया, आप चुप रहे. पुलिस नेताओं की भैंसे तलाशती रही, लोग भारत माता को डायन कहते रहे, खनन माफिया के कहने पर ईमानदार अफसरों के तबादले होते रहे, मगर आप चुप रहे. कभी याद नहीं आया कि जिस जनता ने एक टीचर को दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार का मुखिया बना दिया, उसके लिए आपकी भी कोई ज़िम्मेदारी भी है. अगर आपके अनुभवहीन बेटे को आपके साथी काम नहीं करने दे रहे थे तो इसके जिम्मेदार क्या आप नहीं थे?
बहुत सी बातें लिखने से रह गई हैं. बहुत सी चाहकर भी लिखने का मन नहीं होता. पर नेताजी, लड़कों से गलती हो सकती है, नियति से नहीं होती.