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अटल के दौर वाली 'दीदी' कैसे बन गईं बीजेपी की 'दुश्मन नंबर वन', ममता और बीजेपी के रिश्तों की इनसाइड स्टोरी

West Bengal Election Results 2026: ममता बनर्जी कभी अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे करीबी सहयोगी थीं, लेकिन आज बीजेपी उन्हें बंगाल से बेदखल कर चुकी है. जानिए कैसे भगवा ब्रिगेड के साथ दीदी की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई.

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अटल की 'अग्निपुत्री' से बीजेपी की 'दुश्मन नंबर 1' तक (फोटो- इंडिया टुडे)

ममता बनर्जी और भारतीय जनता पार्टी. आज के दौर में इन दो नामों को एक साथ सुनने पर जेहन में तीखे बयान, सडकों पर संघर्ष और कोर्ट-कचहरी की तस्वीरें आती हैं. लेकिन क्या आपको याद है कि ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्हें कभी बीजेपी के सबसे कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी 'अग्निपुत्री' कहते थे. एक दौर था जब ममता बनर्जी और बीजेपी का साथ इतना गहरा था कि उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और एनडीए की सरकार में रेल मंत्री बनीं. आज उसी ममता बनर्जी को बंगाल से उखाड़ने के लिए बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.

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बीजेपी के साथ ममता का सफर और फिर उसी पार्टी से बेदखली या यूं कहें कि मोहभंग की ये कहानी सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि बदलती विचारधाराओं और सत्ता के समीकरणों की है. ये समझना बहुत जरूरी है कि जो ममता कभी दिल्ली के गलियारों में बीजेपी के साथ मुस्कुराती नजर आती थीं, वो आज उसी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों हैं. इस मेगा एक्सप्लेनर में हम एक-एक परत खोलेंगे कि कैसे दोस्ती दुश्मनी में बदली और इसके पीछे के असली खिलाड़ी कौन थे.

बंगाल की राजनीति की इस सबसे बड़ी शिफ्ट को समझने के लिए हमें फ्लैशबैक में जाना होगा. ये वो दौर था जब ममता बनर्जी कांग्रेस के भीतर घुटन महसूस कर रही थीं और उन्हें बंगाल में लेफ्ट यानी वामपंथियों के 'लाल किले' को ढहाने के लिए एक मजबूत साथी की तलाश थी. बीजेपी तब उभर रही थी और ममता को उनमें एक उम्मीद नजर आई. लेकिन आज हालात ये हैं कि बीजेपी के लिए बंगाल की सत्ता का रास्ता ममता के अभेद्य किले से होकर गुजरता है जिसे ढहाने के लिए वो हर मुमकिन दांव चल रही है. 

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ममता और एनडीए: वो शुरुआती दौर जब 'दीदी' सबकी चहेती थीं

ममता बनर्जी ने साल 1998 में जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाई, तो उनका मकसद साफ था कि बंगाल से लेफ्ट को हटाना है. उस समय केंद्र में बीजेपी एक बड़ी ताकत के रूप में उभर रही थी. अटल बिहारी वाजपेयी का चेहरा सबको लुभा रहा था. ममता बनर्जी ने बिना देर किए एनडीए का दामन थाम लिया. 1999 के चुनाव के बाद जब अटल जी की सरकार बनी, तो ममता बनर्जी को रेल मंत्रालय जैसा अहम विभाग दिया गया.

अटल जी, ममता बनर्जी का बहुत सम्मान करते थे. कहा जाता है कि ममता की जिद और उनके स्वाभिमान के आगे अक्सर अटल जी को झुकना पड़ता था. ममता उस दौर में बीजेपी की सबसे भरोसेमंद सहयोगी थीं. उन्होंने ममता के घर जाकर उनकी मां के पैर छुए थे, ये तस्वीर आज भी बंगाल की राजनीति में एक मिसाल की तरह देखी जाती है. उस समय बीजेपी के लिए ममता बंगाल का प्रवेश द्वार थीं. बीजेपी को लग रहा था कि ममता के कंधे पर सवार होकर वो बंगाल में अपनी जड़ें जमा लेगी.

लेकिन राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा 'प्रो-पीपल' और थोड़ी 'विद्रोही' रही है. साल 2001 में तहलका कांड के बाद ममता ने पहली बार एनडीए का साथ छोड़ा, हालांकि वो बाद में वापस भी आईं. लेकिन रिश्तों में जो दरार आनी शुरू हुई थी, वो धीरे-धीरे बढ़ती गई. ममता को लगने लगा था कि बीजेपी के साथ रहने से उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुंच सकता है और बंगाल के मुस्लिम वोटरों के बीच उनकी पकड़ ढीली हो सकती है.

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कैसे शुरू हुआ दूरियों का दौर: जब विचारधारा टकराने लगी

2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की हार और केंद्र में यूपीए की सरकार बनने के बाद समीकरण तेजी से बदले. ममता बनर्जी उस वक्त बंगाल में अकेले संघर्ष कर रही थीं. बीजेपी भी विपक्ष में थी. 2009 आते-आते ममता बनर्जी को समझ आ गया कि अगर बंगाल जीतना है तो उन्हें कांग्रेस के साथ हाथ मिलाना होगा. उन्होंने बीजेपी से किनारा कर लिया और यूपीए-2 में शामिल हो गईं.

यहीं से बीजेपी और ममता के बीच असली फासला शुरू हुआ. बीजेपी को लगा कि ममता ने उन्हें सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और फिर छोड़ दिया. वहीं ममता का तर्क था कि उनकी राजनीति बंगाल के हितों के लिए है और वो किसी ऐसी विचारधारा के साथ नहीं रह सकतीं जो उनके राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाए. 2011 में जब ममता ने 34 साल पुराने लेफ्ट के शासन को उखाड़ फेंका, तो वो देश की सबसे शक्तिशाली नेताओं में शुमार हो गईं.

बीजेपी तब तक केंद्र की राजनीति में वापस आने की तैयारी कर रही थी. नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था. 2014 की मोदी लहर ने पूरे देश को अपनी चपेट में लिया, लेकिन बंगाल में ममता का जादू बरकरार रहा. बीजेपी को अब समझ आ गया था कि अगर उन्हें बंगाल में विस्तार करना है, तो उन्हें ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोलना ही होगा. अब वो 'सहयोगी' नहीं बल्कि 'मुख्य प्रतिद्वंदी' बन चुकी थीं.

2014 से 2024: दोस्ती से सीधे 'जंग' तक का सफर

2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद ममता बनर्जी ने 'फेडरल स्ट्रक्चर' के नाम पर केंद्र से टकराव का रास्ता चुना. सीबीआई की एंट्री, नारद और शारदा घोटाले की जांच ने आग में घी डालने का काम किया. बीजेपी ने बंगाल में अपनी पूरी मशीनरी लगा दी. अमित शाह ने बंगाल को अपना मिशन बना लिया. जो बीजेपी कभी ममता की जूनियर पार्टनर हुआ करती थी, उसने अब ममता को सीधे चुनौती देना शुरू कर दिया.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बंगाल की 42 में से 18 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया. ये ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा खतरे का संकेत था. बीजेपी ने ममता पर 'तुष्टिकरण' के आरोप लगाए, तो ममता ने बीजेपी को 'बाहरी' और 'बंगाल विरोधी' करार दिया. दोनों के बीच की भाषा तीखी होती गई. 'जय श्री राम' का नारा बंगाल की राजनीति में एक युद्ध घोष बन गया.

बीजेपी ने ममता के ही पुराने सिपहसालारों को तोड़ना शुरू किया. मुकुल रॉय से लेकर शुभेंदु अधिकारी तक, ममता के खास लोग बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी का नैरेटिव ये था कि ममता ने उन लोगों को बेदखल कर दिया है जिन्होंने टीएमसी को खड़ा किया था. वहीं ममता का कहना था कि बीजेपी उनकी पार्टी को तोड़ने की साजिश रच रही है. अब ये लडाई सिर्फ वोटों की नहीं, बल्कि अस्तित्व की बन गई थी.

वो मुद्दे जिन्होंने ममता और बीजेपी के बीच खाई खोद दी

ममता बनर्जी और बीजेपी के बीच विवाद के कई बड़े कारण हैं. पहला है नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (NRC). बीजेपी ने इसे बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में एक बड़े कार्ड की तरह खेला, वहीं ममता ने इसे अपनी जान पर खेलकर रोकने का वादा किया. दूसरा मुद्दा है भ्रष्टाचार के आरोप. बीजेपी ने संदेशखाली से लेकर राशन घोटाले तक ममता सरकार को कटघरे में खड़ा किया.

तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा है हिंसा की राजनीति. बीजेपी का आरोप है कि बंगाल में उनके कार्यकर्ताओं की हत्या की जाती है और उन्हें काम नहीं करने दिया जाता. वहीं टीएमसी का कहना है कि बीजेपी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करके उनके नेताओं को डरा रही है. इस 'एजेंसी बनाम पुलिस' की लड़ाई ने आम आदमी को भी दो धड़ों में बांट दिया है.

चौथा मुद्दा है पहचान की राजनीति. बीजेपी बंगाल में 'हिंदुत्व' और 'राष्ट्रवाद' को मिलाना चाहती है, जबकि ममता 'बंगाली अस्मिता' और 'मां-माटी-मानुष' के नारे के साथ खड़ी हैं. बीजेपी के लिए ममता अब वो नेता नहीं रहीं जो अटल जी के साथ कैबिनेट में बैठती थीं, बल्कि वो एक ऐसी 'दीदी' बन गईं जो उनके हर कदम में रोड़ा अटकाती हैं.

बंगाल का बदलता मिजाज

बीजेपी और ममता की इस लड़ाई का असर बंगाल के समाज पर बहुत गहरा पड़ा है. कभी बंगाल अपनी बौद्धिक चर्चाओं और कला-संस्कृति के लिए जाना जाता था, आज वहां की पहचान राजनीतिक हिंसा और ध्रुवीकरण बनती जा रही है. मिडिल क्लास बंगाली अब डरा हुआ है. उसे लगता है कि सत्ता की इस जंग में विकास के मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं.

साइकोलॉजिकल लेवल पर देखें तो बंगाल के लोगों में एक किस्म का 'बाइनरी' सिस्टम बन गया है. या तो आप दीदी के साथ हैं या फिर बीजेपी के साथ. बीच का रास्ता यानी लेफ्ट और कांग्रेस लगभग खत्म हो चुके हैं. युवा वर्ग रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में है, लेकिन हेडलाइंस सिर्फ दंगों, छापों और तीखी बयानबाजी से भरी रहती हैं. बीजेपी की आक्रामक रणनीति ने ममता को और ज्यादा सुरक्षात्मक और कभी-कभी ज्यादा आक्रामक बना दिया है.

उद्योग जगत की बात करें तो बंगाल में निवेश को लेकर अब भी संशय बना रहता है. टाटा नैनो विवाद की यादें आज भी ताजा हैं और मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता निवेशकों को डराती है. ममता बनर्जी 'बिजनेस समिट' के जरिए अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बीजेपी का 'लॉ एंड ऑर्डर' वाला हमला उनके प्रयासों पर भारी पड़ता है.

क्या फिर कभी मिल सकते हैं दिल?

राजनीति में कुछ भी नामुमकिन नहीं है, लेकिन फिलहाल ममता और बीजेपी के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. बीजेपी के लिए बंगाल अब ईगो की लड़ाई है. वो दिखाना चाहते हैं कि वो एक क्षेत्रीय क्षत्रप को उसके घर में हरा सकते हैं. वहीं ममता के लिए ये उनकी विरासत को बचाने की जंग है.

आने वाले समय में अगर केंद्र में समीकरण बदलते हैं, तो शायद पर्दे के पीछे कोई बातचीत हो, लेकिन सार्वजनिक तौर पर दोनों पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ 'नो होल्ड्स बार्ड' यानी आर-पार की लड़ाई लड़ रही हैं. बीजेपी की रणनीति अब ममता को 'एंटी-नेशनल' या 'प्रो-इलीगल इमिग्रेंट्स' दिखाने की है, जबकि ममता खुद को बंगाल की इकलौती रक्षक के तौर पर पेश करती रहेंगी.

एक बात तो तय है कि ममता बनर्जी को बीजेपी ने अपनी लिस्ट में सबसे ऊपर रखा है. ये बेदखली सिर्फ एनडीए से नहीं हुई है, बल्कि ये विचारधारा की ऐसी बेदखली है जहां वापसी के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं. ममता अब राष्ट्रीय स्तर पर 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन का हिस्सा बनकर मोदी सरकार को चुनौती देने का मन बना चुकी हैं.

आम आदमी के लिए क्या है इसमें?

एक आम नागरिक के तौर पर इस पूरी सियासी उठापटक का मतलब सिर्फ इतना है कि आपके बुनियादी मुद्दे हेडलाइंस से गायब हो सकते हैं. जब दो बड़ी ताकतें टकराती हैं, तो जमीन पर रहने वाला इंसान अक्सर पिसता है. बंगाल के संदर्भ में ये और भी ज्यादा सच है.

आपके लिए जरूरी सलाह:

  • सोशल मीडिया पर चल रहे प्रोपेगेंडा से बचें. दोनों तरफ से 'फेक न्यूज' का बड़ा बाजार गर्म रहता है.
  • नेताओं के बयानों से ज्यादा सरकारी आंकड़ों और ग्राउंड रिपोर्ट पर भरोसा करें.
  • राजनीतिक विचारधारा को अपने निजी रिश्तों और सामाजिक शांति के बीच न आने दें.

बंगाल की इस जंग का असर आपके राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है, क्योंकि ये 'रीजनल पावर बनाम सेंट्रल पावर' की एक बड़ी लैब है.

'अग्निपुत्री' की 'अग्निपरीक्षा'

ममता बनर्जी और बीजेपी की ये कहानी एक फुल सर्कल की तरह है. एक समय की 'अग्निपुत्री' आज बीजेपी के लिए 'अग्निपरीक्षा' बनी हुई है. बीजेपी ने जिस ममता को बंगाल में अपने पैर जमाने के लिए इस्तेमाल किया था, आज वही ममता उनके रास्ते का सबसे बड़ा पत्थर हैं. ये राजनीति का क्रूर सच है कि यहां कोई स्थाई दोस्त नहीं होता. ममता को एनडीए से बेदखल करना या उनका खुद अलग होना, दरअसल एक पुरानी महत्वाकांक्षा का अंत और एक नई दुश्मनी की शुरुआत थी. बंगाल की जनता इस नाटक का सबसे बड़ा गवाह है और अंतिम फैसला भी उसी के हाथ में है.

वीडियो: मीटिंग में ऐसा क्या हुआ कि ममता बनर्जी ने गुस्से में अपनी सभा छोड़ दी?

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