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जहरीली हवा वाले शहर में घर ले रहे, तो AQI होम्स के बारे में जरूर जान लें

इन घरों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि घर के अंदर की हवा बाहर के मुकाबले काफी साफ रहे. इनमें कई तरह की नई तकनीक, जैसे नॉर्डिक टेक्नोलॉजी, एडवांस एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, स्मार्ट वेंटिलेशन और कम प्रदूषण फैलाने वाले मैटेरियल का इस्तेमाल किया जाता है.

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क्या AQI होम्स अब लग्जरी नहीं बल्कि जरूरत बन चुके हैं? (फोटो क्रेडिट: Unsplash.com)

अगर आपसे कहा जाए कि अब आपके घर के अंदर की हवा बिना एयर प्यूरीफायर के एकदम साफ रहेगी, तो क्या आप यकीन करेंगे? शायद नहीं. लेकिन अब ऐसा संभव हो चुका है. बड़े शहरों में बढ़ते प्रदूषण के बीच रियल एस्टेट कंपनियां अब ‘लो AQI होम्स’ लॉन्च कर रही हैं. इन लो AQI होम्स का ट्रेंड नोएडा, दिल्ली और गुरुग्राम जैसे बड़े शहरों में तेजी से बढ़ रहा है. यहां की खराब हवा के कारण रियल एस्टेट कंपनियां इस तरह के प्रोजेक्ट्स लॉन्च कर रही हैं.

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लो AQI होम क्या होते हैं?

इन घरों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि घर के अंदर की हवा बाहर के मुकाबले काफी साफ रहे. इनमें कई तरह की नई तकनीक, जैसे नॉर्डिक टेक्नोलॉजी, एडवांस एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, स्मार्ट वेंटिलेशन और कम प्रदूषण फैलाने वाले मैटेरियल का इस्तेमाल किया जाता है. आसान भाषा में कहें तो लो एक्यूआई वाले घरों के भीतर एक तरह का क्लीन एयर जोन बन जाता है.

किन कंपनियों ने लो एक्यूआई होम लॉन्च किए

बूट्स रियलटी (BOOTES Reality) ने ग्रेटर नोएडा वेस्ट में एस्पायर लेजर वैली (Aspire Leisure Valley) नाम से आवासीय योजना लॉन्च की है. यह प्रोजेक्ट ग्रेटर नोएडा वेस्ट के सेक्टर टेकजोन 4 में स्थित है. कंपनी का कहना है कि उनकी इस परियोजना में बनने वाले सभी फ्लैट में 50 से कम एक्यूआई रहेगा. बूट्स रियलटी ने नोएडा सेक्टर 76 में भी एस्पायर सिलिकॉन सिटी में लो एक्यूआई होम्स लॉन्च किए हैं.

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बूट्स रियलटी के एमडी दीपक राय ने लल्लनटॉप से बातचीत में कहा कि पहली बार बूट्स रियलटी भारत की पहली रियल एस्टेट कंपनी है जो नॉर्डिक टेक्नोलॉजी को आवासीय प्रोजेक्ट्स में लागू करने जा रही है. कंपनी ने फ्रेश एयर प्रो (FreshAir Pro) नाम का एक इंटीग्रेटेड सिस्टम विकसित किया है. उनका कहना है कि कंपनी ने अपने घरों को इस तरह डिजाइन किया है कि इनका इनडोर एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 50 से नीचे रखा जा सके. इन घरों में हवा को ताजा और कार्बन डाई आक्साइड यानी CO₂ स्तर को कम बनाए रखने के लिए विशेष सिस्टम लगाए गए हैं. कंपनी का लक्ष्य घर खरीदारों को साफ हवा के साफ पानी मुहैया कराना है.  

दीपक राय बताते हैं कि आम तौर पर बाहर की गर्म या ठंडी हवा को अंदर लाने पर बिजली खपत बढ़ जाती है, लेकिन उनका दावा है कि इसका हीट एक्सेंजर 85% तक ऊर्जा रिकवर कर लेता है. इससे कमरे में आने वाली हवा पहले से ठंडी या सामान्य तापमान पर होती है, जिससे बिजली की काफी बचत होती है. बूट्स भारत की पहली नेट जीरो कंपनी है. नेट जीरो कंपनी वह होती है जो जितनी ऊर्जा खपत करती है उतना खुद पैदा करती है. 

बूट्स रियलटी के अलावा, गुरुग्राम और दिल्ली-एनसीआर में कुछ और बिल्डर भी अपने प्रोजेक्ट्स में लो एक्यूआई वाला विकल्प दे रहे हैं. गोदरेज ने दिल्ली में अपना साउथ एस्टेट नाम से एक प्रीमियम प्रोजेक्ट लॉन्च किया है. इस प्रोजेक्ट की खास बात है इसका सेंट्रली ट्रीटेड फ्रेश एयर (CTFA) सिस्टम है, जो VRF एयर कंडीशनिंग के साथ इंटीग्रेटेड है. 

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VRF एक उन्नत HVAC तकनीक है जो एक ही आउटडोर यूनिट का इस्तेमाल करके घरों के अंदर हवा देती है. कंपनी का दावा है कि ये दोनों सिस्टम मिलकर सूक्ष्म कणों को फिल्टर करते हैं. साथ ही गैस में तब्दील होने वाले कार्बनिक यौगिकों (VOCs) और कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को कम करते हैं. 

निंबस ग्रुप ने भी नोएडा एक्सप्रेसवे में एक आवासीय प्रोजेक्ट (द अरिस्टा लक्स) लॉन्च किया है. ये कंपनी भी अपने फ्लैट के भीतर 50 से कम एक्यूआई बनाए रखने का दावा करती है. 

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लो AQI वाली ये तकनीक कैसे काम करती है?

बूट्स रियलटी के एमडी दीपक राय इस प्रक्रिया को समझाते हैं. वे बताते हैं कि इसमें घर के अंदर एक मशीननुमा सिस्टम फिट किया जाता है. लेकिन यह कोई छोटा पोर्टेबल डिवाइस नहीं होता, बल्कि बिल्ट इन (इंटीग्रेटेड) सिस्टम होता है. इसका नाम फ्रेश एयर प्रो है. यह सिस्टम दो तरीके से काम करता है. पहला है री-सर्कुलेशन मोड. दूसरा है फ्रेश एयर इनटेक मोड. री-सर्कुलेशन मोड तब काम करता है जब कमरे में कार्बन डाई अक्साइड (CO₂) का स्तर सामान्य होता है.

री-सर्कुलेशन मोड में कमरे की हवा मशीन के अंदर खींची जाती है. इसमें फिल्टर बड़े कण (धूल, बाल) हटाता है. IFD टेक्नोलॉजी हवा को साफ और बैक्टीरिया खत्म करती है. इलेक्ट्रोस्टैटिक सिस्टम बहुत छोटे कण (PM2.5 आदि) पकड़ता है. मल्टी-लेयर फिल्टर बची हुई गंदगी और गैस हटाता है. साफ हवा वापस कमरे में भेज दी जाती है. 

वहीं, दूसरा है फ्रेश एयर इनटेक मोड. जब कमरे में CO₂ ज्यादा हो जाती है. CO₂ सेंसर हाई लेवल डिटेक्ट करता है. यह सिस्टम अपने आप फ्रेश एयर मोड ऑन कर देता है. बाहर की हवा पाइप (duct) के जरिए अंदर लाई जाती है. यह हवा कई स्टेज के फिल्टर से साफ की जाती है. हीट एक्सचेंजर बाहर की हवा को कमरे के तापमान के करीब लाता है. साफ और ताजी हवा कमरे में भेजी जाती है और पुरानी CO₂ वाली प्रदूषित हवा बाहर निकाल दी जाती है.

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FreshAir Pro
 एयर प्यूरीफायर से क्यों अलग है नई तकनीक ?

सामान्य एयर प्यूरीफायर केवल कमरे की अंदर की हवा को घुमाते हैं. वे ताजी हवा नहीं लाते. जब कमरे में कार्बन डाई ऑक्साइड (CO₂) का स्तर 1000 ppm से ऊपर जाता है, तो थकान, सिरदर्द जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. वहीं खिड़की खोलने पर बाहर की प्रदूषित हवा जैसे कि PM 2.5, धूल और गैसें अंदर आ जाती हैं. इससे समस्या और बढ़ जाती है. इस सिस्टम में CO₂, PM2.5, तापमान और VOC सेंसर लगे होते हैं, जो रियल टाइम में हवा की गुणवत्ता मॉनिटर करते हैं. जैसे ही CO₂ स्तर बढ़ता है, सिस्टम खुद-ब-खुद फ्रेश एयर मोड में चला जाता है. यानी यह पूरी तरह ऑटोमैटिक और स्मार्ट ऑपरेशन पर आधारित है.

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क्यों बढ़ रही है लो AQI वाले घरों की मांग?

दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाकों में एयर क्वालिटी इंडेक्स कई बार 500 के पार पहुंच जाता है, तो इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है. अस्थमा, एलर्जी और सांस से जुड़ी बीमारियों के बढ़ने से लोग घर के अंदर की हवा को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं. कोरोना के बाद से वर्क फ्रॉम होम का कल्चर बढ़ा है. ऐसे में अब लोग घर में ज्यादा समय बिताते हैं. साफ हवा एक जरूरत बन गई है. यही वजह है कि अब क्लीन एयर रियल एस्टेट में एक नया सेलिंग पॉइंट बन चुकी है. 

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल लगभग 20 लाख लोगों की मौत प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों से होती है. The Lancet journal की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2022 में भारत में 17 लाख लोग PM 2.5 की वजह से मारे गए. देश में औसत PM2.5 स्तर WHO की सुरक्षित सीमा से करीब 10 गुना ज्यादा है. हर 8 में से 1 मौत का कारण प्रदूषण है. इससे लोगों का औसत जीवन 8-10 साल तक कम हो रहा है. ये कुछ प्रमुख वजहें हैं जिनकी वजह से लो एक्यूआई होम्स की मांग बढ़ रही है.

भारत में लो एक्यूआई का कॉन्सेप्ट नया है, लेकिन जानकारों का कहना है कि ऐसे घरों की मांग बढ़ने की संभावना है. रियल एस्टेट कंपनी ग्लोबल बिजनेस स्कवायर के सीईओ ब्रजभूषण गुप्ता ने लल्लनटॉप से बातचीत में कहा, “बढ़ते प्रदूषण के बीच लो AQI होम्स अब विकल्प नहीं, बल्कि लोगों की जरूरत बनते जा रहे हैं. आने वाले समय में लोग सिर्फ घर नहीं, बल्कि ऑफिस स्पेस भी लो एक्यूआई वाले खरीदेंगे. यही भारत के रियल एस्टेट का भविष्य है.”

जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ प्रॉपर्टी की कीमतों को पर्यावरण की क्वालिटी से जोड़ने की वकालत कर चुके हैं. उन्होंने कहा था कि जिन इलाकों में जल और वायु प्रदूषण ज्यादा है वहां प्रॉपर्टी की कीमतों में छूट मिलने चाहिए. उन्होंने कहा था कि जितना ज्यादा AQI होगा, रियल एस्टेट की कीमतें उतनी ही कम होनी चाहिए.

इसी तरह प्रॉपर्टी डीलर संदीप त्यागी बताते हैं कि घर खरीदार ऐसे घरों को तरजीह देते हैं जहां का माहौल हरा भरा हो. लेकिन जिस तरह से शहरों में पेड़ पौधों की तादाद घट रही है और प्रदूषण बढ़ रहा है, घर खरीदारों के पास लो एक्यूआई होम का विकल्प काफी पसंदीदा बनकर उभरा रहा है.

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