देश में गोल्ड लोन लेने वालों की तादाद में भारी बढ़ोतरी हुई है. इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में क्रिफ हाई मार्क के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 में गोल्ड लोन लेने वालों की तादाद सालाना आधार पर 50% बढ़कर 19 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई है. इन आंकड़ों से पता चलता है कि जब भी लोगों को पैसे की जरूरत पड़ती है तो बड़ी तादाद में लोग गोल्ड लोन का सहारा ले रहे हैं.
मिडिल क्लास की ऐसी नौबत कैसे आ गई? सोना गिरवी रखकर 19 लाख करोड़ का कर्ज लिया
भारत में सोना सिर्फ गहना नहीं, बल्कि “इमरजेंसी बैंक बैलेंस” माना जाता है. बच्चों की पढ़ाई हो या इलाज कराना, जरूरत पड़ते ही अब ज्यादातर लोग गोल्ड लोन का ही सहारा लेते हैं


भारत में सोना सिर्फ गहना नहीं, बल्कि ‘इमरजेंसी बैंक बैलेंस’ माना जाता है. बच्चों की पढ़ाई हो या इलाज कराना, जरूरत पड़ते ही अब ज्यादातर लोग गोल्ड लोन का ही सहारा लेते हैं. यही वजह है कि जब परिवारों पर अचानक खर्च का दबाव आता है, तो लोग सबसे पहले गोल्ड लोन का सहारा लेते हैं. निवेश सलाहकार विनोद रावल लल्लनटॉप से कहते हैं कि इसकी वजह है कि गोल्ड के बदले लोन आसानी से मिल जाता है. बहुत ज्यादा कागजी कार्रवाई नहीं करनी पड़ती है.
विनोद रावल का ये भी मानना है कि इस उछाल का एक बड़ा कारण सोने की कीमतों में लगातार इजाफा होना भी है. गिरवी रखे गए सोने का दाम बढ़ने से लोगों को उसी गहनों या सोने के बदले ज्यादा कर्ज मिल जा रहा है. वहीं, बैंक भी ग्राहकों को गोल्ड लोन फटाफट इसलिए देते हैं कि ये सिक्योर लोन माने जाते हैं.
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दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज में कॉमर्स डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर अक्षय मिश्रा लल्लनटॉप से बातचीत में कहते हैं कि सोना कई दशकों से मिडिल क्लास परिवारों के लिए इलाज और दूसरी आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘इमरजेंसी फंड’ की तरह इस्तेमाल में आता रहा है. अब बैंक भी गोल्ड लोन पर फोकस बढ़ा रहे हैं. इसी वजह से रिटेल लोन में गोल्ड लोन की भागीदारी बढ़ी है. फिलहाल होम लोन के बाद लोग सबसे ज्यादा गोल्ड के बदले लोन का विकल्प चुन रहे हैं.
वहीं, दिल्ली यूनिवर्सिटी के माता सुंदरी कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर सिद्धार्थ राठौर लल्लनटॉप से बातचीत में कहते हैं कि लोगों की सेविंग घटी है इसलिए उनको अपनी इमरजेंसी जरूरतों के लिए बार बार इस तरह के कर्ज लेने की नौबत आती है.
बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी एक खबर में भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि मार्च 2025 के अंत में भारत का घरेलू कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 41.3% पर पहुंच गया है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 9 वर्षों में बैंकों में जमा की गई परिवारों की बचत का हिस्सा 43% से घटकर 35% पर आ गया.
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लोन लेने वाले बढ़े तो रिस्क भी बढ़ गयागोल्ड लोन का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन नए आंकड़ों से पता चलता है कि इस वृद्धि के साथ जोखिम भी बढ़ रहे हैं. मार्च 2022 से अब तक गोल्ड लोन लेने वालों में लगभग चार गुना का इजाफा हुआ है. इंडिया टुडे के पत्रकार सोनू विवेक की एक रिपोर्ट में ट्रांसयूनियन CIBIL के आंकड़ों से बताया गया है कि लोगों के उधार लेने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है.
नए गोल्ड लोन लेने वाले लगभग 48% ग्राहकों पर 25 लाख रुपये से ज्यादा का लोन बकाया है. इससे पता चलता है कि लोग छोटे लोन लेने के बजाय बड़े लोन लेने की ओर बढ़ रहे हैं. डिफ़ॉल्ट का जोखिम बढ़ रहा है.
रिपोर्ट से पता चलता है कि अधिक लोन लेने वाले कर्जदाताओं द्वारा डिफ़ॉल्ट करने की संभावना अधिक होती है. जिन लोन लेने वाले लोगों पर 25 लाख रुपये से ज्यादा का बकाया है. इनमें डिफॉल्ट दर 1.5% है. यह कम लोन राशि वाले कर्जदाताओं की तुलना में लगभग 2.2 गुना ज्यादा है.
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