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डिजिटल सर्विसेज टैक्स क्या है? इसके हटने से अमेरिका की कितनी मौज कटेगी?

India Digital Services Tax: अमेरिका ने कहा कि हाल ही में हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारत DST को हटा देगा.

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डिजिटल सर्विसेज टैक्स उन विदेशी कंपनियों पर लगाया जाता है, जो लोगों को डिजिटल सेवाएं देकर कमाई करती हैं (फोटो क्रेडिट: Business Today)

भारत सिर्फ रूस से तेल आयात खत्म नहीं करेगा, बल्कि डिजिटल सर्विसेज टैक्स (DST) को भी हटा देगा. अमेरिका ने मंगलवार 10 फरवरी को भारत के डिजिटल सर्विसेज टैक्स को लेकर नया दावा किया. बिजनेस स्टैंडर्ड की पत्रकार रिशिका अग्रवाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने कहा कि हाल ही में हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारत DST को हटा देगा.

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डिजिटल सर्विसेज टैक्स क्या है?

डिजिटल सर्विसेज टैक्स उन विदेशी कंपनियों पर लगाया जाता है, जो लोगों को डिजिटल सेवाएं देकर कमाई करती हैं. भले ही उनका हेड ऑफिस या ब्रांच ऑफिस भारत में न हो. उदाहरण के लिए गूगल (Google), मेटा (Meta), ऐमजॉन (Amazon) जैसी टेक कंपनियां. यह टैक्स आम तौर पर ऑनलाइन विज्ञापन, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, डिजिटल मार्केटप्लेस और इंटरनेट आधारित सेवाओं पर लागू होता है.

अमेरिकी प्रशासन ने क्या कहा है?

9 फरवरी को व्हाइट हाउस की तरफ से जारी फैक्ट शीट में कहा गया, “भारत अपने डिजिटल सर्विसेज टैक्स हटाएगा और डिजिटल ट्रेड से जुड़ी रुकावटों और नियमों को खत्म करने के लिए मजबूत द्विपक्षीय डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करेगा. इसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी लगाने पर रोक जैसे नियम भी शामिल होंगे.”

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व्हाइट हाउस अमेरिका के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास और मुख्य दफ्तर है. वहीं, फैक्ट शीट आधिकारिक जानकारी का छोटा दस्तावेज होता है. इसमें किसी फैसले, नीति, डील या घोषणा की मुख्य बातों के बारे में जिक्र किया जाता है.

हालांकि, भारत के आधिकारिक बयान में डिजिटल सर्विसेज टैक्स हटाने का सीधा उल्लेख नहीं है. भारत सरकार ने डिजिटल ट्रेड में आने वाली रुकावटों को कम करने की बात कही है. क्या डिजिटल सर्विसेज टैक्स हटाना इसमें शामिल है, ये फिलहाल साफ नहीं है, क्योंकि भारत सरकार के बयान में ऐसी जानकारी नहीं दी गई है. 

भारत पहले ही उन इक्वलाइजेशन लेवी को खत्म कर चुका है जिन पर अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) लगातार आपत्ति जताते रहे थे. विदेशी डिजिटल कंपनियों जैसे Google, Meta, Amazon की भारत में ऑनलाइन सेवाओं से कमाई पर लगने वाले टैक्स को इक्वलाइजेशन लेवी कहते हैं, जबकि USTR का काम अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति संभालना होता है.

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भारत की इक्वलाइजेशन लेवी क्या थी?

साल 2016 के फाइनेंस एक्ट के तहत शुरू किया गया एक विशेष टैक्स था. इसका मकसद भारत में कमाई करने वाली विदेशी डिजिटल कंपनियों की ऑनलाइन सेवाओं और ई-कॉमर्स लेनदेन पर टैक्स लगाना था. शुरुआत में यह टैक्स विदेशी कंपनियों की तरफ से भारतीय बिजनेस को दी जाने वाली ऑनलाइन विज्ञापन सेवाओं पर लागू था. अप्रैल 2020 में इसका दायरा बढ़ाकर ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म द्वारा दी जाने वाली सेवाओं और सामान की सप्लाई तक कर दिया गया.

किन ट्रांजैक्शन पर टैक्स लगता था?

अगर भारतीय कंपनी Google, Meta जैसी विदेशी कंपनी को ऑनलाइन एड देने के लिए पैसे देती थी, तो उस पर 6% टैक्स लगता था. ई-कॉमर्स सप्लाई और सेवाओं के तहत विदेशी ई-कॉमर्स ऑपरेटर द्वारा ऑनलाइन बेचे गए या मुहैया कराए गए सामान और सेवाओं की कुल वैल्यू पर 2% टैक्स लगाया जाता था.

जनवरी 2021 में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत का डिजिटल टैक्स अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ ‘भेदभावपूर्ण’ है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह कानून भारतीय कंपनियों को छूट देता है और विदेशी कंपनियों के लिए परेशानी पैदा करता है. अमेरिका का कहना था कि यह अंतरराष्ट्रीय टैक्स नियमों के खिलाफ है. इससे अमेरिकी कंपनियों को कई तरह के नियम कायदों का पालन करना पड़ता है. उनको दोहरे टैक्स पर दोहरे कराधान जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था.

अमेरिका के टैक्स डिपार्टमेंट ने अनुमान लगाया था कि इससे अमेरिकी कंपनियों को हर साल 30 मिलियन डॉलर (करीब 270 करोड़ रुपये) से ज्यादा का नुकसान हो सकता है. हालांकि, भारत पहले ही इक्वलाइजेशन लेवी खत्म कर चुका है. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट बताती है कि भारत ने इसे धीरे-धीरे खत्म किया है. 

ई-कॉमर्स पर लगने वाले 2% टैक्स को 1 अगस्त 2024 से हटा दिया गया था, जबकि ऑनलाइन विज्ञापन पर 6% लगने वाले टैक्स के नियम को 1 अप्रैल 2025 से खत्म कर दिया गया था. इस तरह भारत ने अपना अलग डिजिटल सर्विसेज टैक्स सिस्टम पूरी तरह हटा दिया. इस पूरी कवायद का मकसद बाकी दुनिया के साथ टैक्स तालमेल बैठाना और जिन देशों के साथ भारत का काफी व्यापार होता है उनके साथ विवाद कम करना था.

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अमेरिकी टेक कंपनियों को फायदा

गूगल, मेटा, और ऐमजॉन वगैरा को इस टैक्स के हटने से काफी फायदा हो रहा है. बिजनेस मैगजीन और न्यूज सर्विस India Briefing के अनुसार, भारत के लगभग 5.82 अरब डॉलर (करीब 52 हजार 680 करोड़ रुपये ) के डिजिटल विज्ञापन बाजार का करीब 65% हिस्सा इन कंपनियों के पास है. टैक्स हटने से विज्ञापन की लागत कम होगी और ग्लोबल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की कमाई बढ़ सकती है.

क्या भारत अब भी विदेशी डिजिटल कंपनियों पर टैक्स लगाता है?

बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर में बताया गया है कि भारत में अब भी डिजिटल कंपनियों पर टैक्स लगता है. इक्वलाइजेशन लेवी हटने का मतलब यह नहीं कि विदेशी डिजिटल कंपनियां टैक्स से मुक्त हैं. साल 2018 में लागू Significant Economic Presence (SEP) नियम के तहत, यदि कोई विदेशी कंपनी भारत में तय सीमा से ज्यादा कमाई या यूजर इंटरैक्शन करती है तो उस पर टैक्स लग सकता है. हालांकि, SEP को डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए तैयार किया गया है. लेकिन इसका व्यापक दायरा इसे केवल डिजिटल बिजनेस से इतर भी लागू करने की अनुमति देता है.

इसके अलावा ऑनलाइन सूचना और डेटाबेस एक्सेस या रिट्रीवल (OIDAR) सेवाओं के लिए विदेशी और घरेलू डिजिटल सेवा देने वाली कंपनियों को भारत में इस्तेमाल की जाने वाली सेवाओं पर 18% जीएसटी का भुगतान करना होगा. यह स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, क्लाउड सेवाओं, सॉफ्टवेयर सब्सक्रिप्शन, ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल विज्ञापन वगैरा पर लागू होता है. नेटफ्लिक्स (Netflix), ऐमजॉन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video), एडोब क्रिएटिव क्लाउड और माइक्रोसॉफ्ट 365 जैसी सेवाएं इसमें शामिल हैं.

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