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शेयर-म्युचुअल फंड में पैसा लगाएं या घर खरीदें, किससे ज्यादा कमाई?

जब 25-30 साल का नौकरी करने वाला कोई युवा अपनी बचत और होम लोन के जरिये 1 करोड़ रुपये का घर खरीदने की स्थिति में पहुंचता है, तो उसके सामने एक गंभीर सवाल खड़ा हो जाता है. वह सवाल ये कि क्या इतनी बड़ी रकम घर में लगाना सही है या फिर किराए पर रहकर बाकी पैसे को किसी और निवेश में लगाना ज्यादा समझदारी भरा फैसला होगा?

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शेयर बाजार और शेयरों से जुड़े म्युचुअल फंड्स ने 15 साल की अवधि में 12% से 15% तक का सालाना रिटर्न दिया है (फोटो क्रेडिट: India Today)

अपने सपनों का आशियाना बनाने की ज्यादातर लोगों की हसरत होती है.  लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. बड़े शहरों में तेजी से प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें इसमें बड़ी रुकावट डालती है. आज की तारीख में एक साधारण किस्म के 2 या 3 बीएचके घर का दाम एक करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है. ऐसे में जब 25-30 साल का नौकरी करने वाला कोई युवा अपनी बचत और होम लोन के जरिये 1 करोड़ रुपये का घर खरीदने की स्थिति में पहुंचता है, तो उसके सामने एक गंभीर सवाल खड़ा हो जाता है. वह सवाल ये कि क्या इतनी बड़ी रकम घर में लगाना सही है या फिर किराए पर रहकर बाकी पैसे को किसी और निवेश में लगाना ज्यादा समझदारी भरा फैसला होगा? 

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इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में एक्सपर्ट की मदद से इस गुत्थी को सुलझाया गया है. इसमें बताया गया है कि घर खरीदना ठीक रहेगा या उस पैसे को शेयर बाजार या म्युचुअल फंड वगैरा में निवेश करके पहले वेल्थ बनानी चाहिए? तो चलिए समझते हैं.

आपको 1 करोड़ रुपये लगाने से पहले किन चीजों का मूल्यांकन करना चाहिए?

सेबी रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और वित्तीय सेवा कंपनी सहज मनी के फाउंडर अभिषेक कुमार इंडिया टुडे से कहते हैं, "इस तरह का फैसला लेने से पहले फायदे और नुकसान को समझना जरूरी है. किसी को सबसे पहले संभावित रिटर्न की तुलना शेयरों से होने वाले फायदे और घर के किराए से होने वाली आय और प्रॉपर्टी की कीमतों में हुए इजाफे को मिलाकर इसका मूल्यांकन करना चाहिए."

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उन्होंने बताया कि चूंकि शेयर बाजार और प्रॉपर्टी दोनों में निवेश से पहले ये पता नहीं चल पाता है कि आने वाले दिनों में इनमें निवेश से कितना रिटर्न मिलेगा. इसलिए प्रॉपर्टी खरीदने से पहले ये ध्यान में रखना जरूरी है कि घर किस मकसद से खरीद रहे हैं यानी निवेश के लिए खरीद रहे हैं या उस घर में खुद रहना चाहते हैं.

उनका कहना है कि अगर घर में खुद रहना है और परिवार को लंबे समय तक स्थिरता का माहौल देना मकसद है तो शेयर मार्केट से ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना होने के बावजूद भी घर खरीदना फायदे का सौदा है. लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि मौजूदा डेट टू इनकम रेश्यो और दूसरे जरूरी वित्तीय लक्ष्यों का आकलन करना चाहिए ताकि घर खरीदने पर जरूरत से ज्यादा खर्च हो जाये. डेट टू इनकम रेश्यो का मतलब कमाई का कितना परसेंट हिस्सा लोन चुकाने में जा रहा है.

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इक्विटी बनाम प्रॉपर्टी में कौन भारी ?

इतिहास में जाएं तो लंबी अवधि में ज्यादातर मामलों में रेजीडेंशियल प्रॉपर्टी की तुलना में इक्विटी ने ज्यादा रिटर्न दिया है. सहज मनी के फाउंडर अभिषेक कुमार बताते हैं, " जिन लोगों ने शेयरों या इक्विटी लिंक्ड म्युचुअल फंड  में 15 साल के लिए निवेश किया है उन्हें 12% से 15% तक का सालाना रिटर्न मिला है. हालांकि, आने वाले वक्त में कितना रिटर्न मिलेगा यह पुराने रिटर्न से तय नहीं होता है."

अभिषेक का कहना है कि इक्विटी के उलट प्रमुख महानगरों में आमतौर पर घरों की कीमतें  5% से 8% के बीच बढ़ी हैं. इसके अलावा, घरों के मेंटेनेंस की लागत और प्रॉपर्टी पर लगने वाले टैक्स की कटौती को जोड़ दें तो प्रॉपर्टी से कमाई इक्विटीज के मुकाबले और घट जाती है.

1 करोड़ रुपये के घर की वास्तविक कीमत

1 करोड़ रुपये कीमत का घर जब कर्ज लेकर खरीदा जाता है तो हकीकत में उसकी कीमत शायद ही कभी 1 करोड़ रुपये होती है. अभिषेक आंकड़ों की मदद से समझाते हैं. उनका कहना है कि 80 लाख का होम लोन 20 साल में 9 परसेंट ब्याज चुकाने के बाद 1.73 करोड़ रुपये का हो जाता है. इससे घर की कुल लागत 1.93 करोड़ रुपये हो जाती है. इसका मतलब है कि घर खरीदने वालों को 20 साल में दोगुनी कीमत चुकानी पड़ती है. 

वहीं, अगर इसी 20 लाख रुपये की डाउन पेमेंट और 72 हजार रुपये की ईएमआई को 12% सालाना रिटर्न वाले इक्विटीज (शेयर और शेयर बाजार से जुड़े म्यूचुअल फंड्स) में निवेश करने से उसी अवधि में 10 करोड़ रुपये से अधिक फंड तैयार होने की संभावना है. हालांकि इस दौरान घर से किराये के मद में होने वाली कमाई को इसमें शामिल नहीं किया गया है.

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EMI बनाम SIP मैं 'बीस' कौन ?

इंडिया टुडे से बातचीत में सहज मनी के फाउंडर अभिषेक कुमार एक उदाहरण से समझाते हैं कि मान लीजिए अगर 20 साल के लिए 72,000 रुपये की ईएमआई (मंथली किस्त) का निवेश करने से 10% सालाना रिटर्न (पारंपारिक रिटर्न) करीब 7.2 करोड़ रुपये बन जाएगा." मान लीजिए कि अगर 14% रिटर्न आंका जाये तो करीब 11.5 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो सकता है." कुल मिलाकर ये आंकड़े दिखाते हैं कि 20 साल तक अनुशासित तरीके से शेयर और इक्विटी लिंक्ड म्युचुअल फंड में निवेश करने से मोटा फंड तैयार किया जा सकता है.

क्या किराये से होने वाली आय खरीदारी को उचित ठहराती है?

मुंबई, गुरुग्राम और बेंगलुरु जैसे शहरों में घरों के किराये से होने वाली आय अक्सर 2% से 3% के बीच होती है. कुमार का कहना है कि इससे प्रॉपर्टी में निवेश कम फायदेमंद हो जाता है. जबकि होम लोन की दरें 8-9 परसेंट के बीच रहती है. इसके अलावा पैसे की जरूरत पड़ने पर प्रॉपर्टी को बेचने कई महीने लग सकते हैं और ब्रोकर को भी कुछ पैसा देना पड़ सकता है. ऐसे में अचानक नौकरी चली जाने या किसी दूसरे शहर में ट्रासंफर पर प्रॉपर्टी में किया गया निवेश बोझ बन जाता है. इसके मुकाबले, इक्विटी से पैसा निकालना ज्यादा आसान काम है.

पोर्टफोलियों में कितनी प्रॉपर्टी होनी चाहिए?

सहज मनी के फाउंडर अभिषेक कुमार इंडिया टुडे से कहते हैं कि आम तौर पर आपकी कुल संपत्ति में अचल संपत्ति यानी प्रॉपर्टी वगैरा कि हिस्सेदारी 30% से 40% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. बाकी पैसे को इक्विटी और फिक्स्ड इनकम जैसी फाइनेंशियल एसेट्स में निवेश किया जाना चाहिए. आंकड़े देखें तो इक्विटी में निवेश ने ऐतिहासिक रूप से ज्यादा रिटर्न दिया है. 

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