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रूस-ईरान से तेल खरीदने पर US ने लगाया बैन, भारत को कहां से मिलेगा 20 लाख बैरल क्रूड ऑयल?

19 अप्रैल की डेडलाइन करीब आने के साथ, भारत के सामने एक चुनौती है. भारत को नए इलाकों, कॉन्ट्रैक्ट्स और शिपिंग रूट्स के जरिए हर दिन लगभग 20 लाख बैरल तेल की सप्लाई का इंतजाम करना होगा.

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रूसी तेल खरीदने पर अमेरिका ने एक महीने की छूट दी थी (PHOTO-AajTak)
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ऐश्वर्या पाटिल

वेस्ट एशिया की जंग का असर पूरी दुनिया पर दिख रहा है. खासकर कच्चे तेल के दामों पर. जब युद्ध के दौरान दाम बढ़े, तब अमेरिका ने भारत को रूस से तेल खरीदने की छूट दी थी. इसके अलावा उसने ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में भी ढील दी. लेकिन 15 अप्रैल को अमेरिका ने ऐलान कर दिया कि उसका इस छूट को आगे बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है. अब इससे भारत के सामने समस्या खड़ी हो गई है कि जो तेल रूस से मिल रहा था, उसकी भरपाई कैसे होगी?

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US के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने 15 अप्रैल को इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि अब रूस और ईरान से तेल आयात पर लगी पाबंदियों में छूट को अमेरिका आगे नहीं बढ़ाएगा. व्हाइट हाउस में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान बेसेंट ने कहा, 

हम रूसी और ईरानी तेल के लिए जारी सामान्य लाइसेंस को आगे नहीं बढ़ाएंगे. यह छूट तेल के केवल उन टैंकर्स पर लागू थी जो 11 मार्च से पहले समुद्र में थीं.

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12 मार्च से पहले लोड किए गए रूसी कार्गो के लिए 30 दिन का आम लाइसेंस अब खत्म हो गया है. वहीं ईरानी तेल के लिए अलग से मिली छूट 19 अप्रैल को खत्म होने वाली है. बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक इस कदम से वह सीमित कानूनी रास्ता बंद हो गया है, जिसने भारत की तेल मार्केटिंग कंपनियों को रूसी तेल की खरीद बढ़ाने की अनुमति दी थी. जहाजों को ट्रैक करने वाली कंपनी Kpler के डेटा को देखें तो रूस से भारत के बीच टैंकर्स की मूवमेंट में बढ़ोतरी देखी गई थी. मार्च 2026 में तो भारत का रूसी तेल का आयात नौ महीने के उच्चतम स्तर,  लगभग 1.96 मिलियन बैरल प्रति दिन पर पहुंच गया था. यह फरवरी की तुलना में लगभग 53% ज्यादा था. 

लेकिन अब, 19 अप्रैल की डेडलाइन करीब आने के साथ, भारत के सामने एक चुनौती है. भारत को नए इलाकों, कॉन्ट्रैक्ट्स और शिपिंग रूट्स के जरिए हर दिन लगभग 20 लाख बैरल तेल की सप्लाई का इंतजाम करना होगा. 

कहां से तेल लाएगा भारत?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में चल रही टेंशन के दौरान भारत सरकार ने यह तर्क दिया है कि भारत का ‘इंपोर्ट बास्केट’ पहले से कहीं ज्यादा बड़ा और मजबूत है. यानी सरकार के मुताबिक अब भारत के पास काफी ऑप्शंस हैं जिनमें से एक को वो अपनी सहूलियत के हिसाब से चुन सकता है. इस बारे में जानकारी देते हुए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने पहले कहा था, 

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कच्चे तेल की सोर्सिंग तकनीकी-व्यावसायिक फैसले होते हैं और OMCs ने पहले ही ऊर्जा स्रोतों के आयात में विविधता लाकर इसे 40 से ज्यादा देशों तक फैला दिया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, लैटिन अमेरिका के देश पहला विकल्प बन सकते हैं. साथ ही ब्राजील, कोलंबिया और इक्वाडोर भारतीय रिफाइनरों के लिए महत्वपूर्ण सप्लायर बन गए हैं.भारत का एक ऑप्शन गुयाना भी है. गुयाना ने 2026 में लगभग 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन का उत्पादन कर रहा है और ये देश-दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते नए तेल निर्यातकों में से एक है. 

इसके अलावा, वेस्ट अफ्रीका से भी उम्मीद है। नाइजीरिया और अंगोला से आपूर्ति रिफाइनरों को खाड़ी देशों के ग्रेड का ही एक विकल्प देती है. वहीं ये उम्मीद भी जताई जा रही है कि भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां, अमेरिका से खरीद बढ़ा सकती हैं. हालांकि इनमें से कोई भी विकल्प रूसी तेल का पूर्ण विकल्प नहीं हो सकता. लेकिन ये सारे विकल्प साथ मिलकर, भारत को इतनी सहूलियत दे सकते हैं कि रूसी और ईरानी तेल पर प्रतिबंधों के बावजूद तेल कमी न हो. भले ही इसकी कीमत रूसी-ईरानी तेल की तुलना में अधिक हो. 

वीडियो: अब तेल को लेकर ट्रंप ने क्या ऐलान कर दिया?

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