इस वित्त वर्ष का बजट पेश होने वाला है. इस संदर्भ में हम बजट से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं और घटनाओं की बात कर रहे हैं. मसलन, अंतरिम बजट क्या होता है? आजादी से पहले तक का भारतीय बजट का इतिहास और आजाद भारत के शुरुआती कुछ बजट. अब हम बात करेंगे उदारीकरण की. उस दौरान बजट के कुछ जरूरी पहलुओं की.
जब बजट ड्राफ्ट पर नाराज नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह से बोले, "क्या मैंने तुम्हें इसलिए चुना था?"
आर्थिक इमरजेंसी की स्थिति थी. भारत के पास मुश्किल से अगले कुछ दिनों के खर्चे के लिए पैसे बचे थे.



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पढ़ें- भाग 2: आज़ाद भारत के पहले कुछ वित्त-मंत्रियों के साथ कौन सा दुर्योग जुड़ा था?
31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और प्रणब मुखर्जी को साइडलाइन कर दिया गया. कांग्रेस में सबसे अनुभवी होने के चलते उन्हें ही इंदिरा गांधी का उत्तराधिकारी माना जा रहा था. लेकिन उनको प्रधानमंत्री न बनाकर राजीव गांधी के हाथ में सत्ता दे दी गई. ये उनके साथ कुछ वैसा ही हुआ, जैसा अतीत में मोरारजी देसाई के साथ हुआ था. बहरहाल, प्रणब के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह वित्त मंत्री बने. 28 फरवरी, 1986 को पेश हुए उनके बजट में कई नई शुरुआत की गईं.
साल 1991 में भारत में उदारीकरण की नीति अपनाई गई. इसका श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दिया जाता है. वे उस समय देश के वित्त मंत्री थे. लेकिन जानकार कहते हैं कि अगर भारतीय अर्थव्यवस्था में आए इस महत्वपूर्ण बदलाव की नींव का श्रेय विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके बजट को दिया जाए तो गलत न होगा.
वीपी सिंह ने लाइसेंस राज खत्म कर दिया, जिसे ब्रिटिश-राज के बाद भारत के विकास में सबसे बड़ी बाधा कहा जाता है. उन्होंने सोने की तस्करी में कमी लाने के लिए सोने के ऊपर लगने वाला टैक्स भी कम कर दिया.
यह कम दिलचस्प नहीं है कि इस फैसले के बाद फिल्मों में सोने की तस्करी वाले प्लॉट धीरे-धीरे खत्म होते चले गए. 1986-87 के बजट को अप्रत्यक्ष कर सुधार की शुरुआत भी कहा जाता है.

वस्तु एवं सेवा कर यानी GST 1986-87 में किए गए इसी टैक्स रिफॉर्म का परिणाम है. आज मध्यम आयु वर्ग के लोगों को याद होगा कि इस सुधार से पहले हर प्रॉडक्ट की पैकिंग में दाम के साथ, ’लोकल टैक्स एक्स्ट्रा’ लिखा आता था. ये इस बजट के बाद ‘सभी करों सहित' (Inclusive of all taxes) में बदल गया.
वीपी सिंह ने अपने कार्यकाल में ऐसे और भी काम किए, जिनके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है. उनकी छवि भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने वाले नेता की बन गई थी. ऐसा नेता और मंत्री, जो अमिताभ बच्चन और धीरूभाई अंबानी जैसे लोगों के यहां रेड भी पड़वा सकता था. राजनीतिक जानकार बताते हैं कि वीपी सिंह ने भ्रष्टाचार को लेकर जिस तरह की मुहिम चला रखी थी, उसे देखते हुए राजीव गांधी ने उन्हें वित्त मंत्रालय से हटा दिया. जनवरी 1987 में वीपी सिंह को रक्षा मंत्रालय दे दिया गया. इसके बाद राजीव ने वित्त मंत्रालय किसी और नेता को नहीं सौंपा. उन्होंने खुद इसका अतिरिक्त प्रभार लिया और 1987-88 का बजट भी पेश किया.
वीपी सिंह से आगे बढ़ें तो वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभालने वाले अगले नेता थे एनडी तिवारी. उन्होंने 1988-89 का बजट पेश किया. तब उस बजट को ‘सॉफ्ट बजट’ कहा गया था. इंडिया टुडे मैगज़ीन को दिए एक इंटरव्यू में एनडी तिवारी ने बताया था:
“लोग तरह-तरह की बातें करेंगे. मैंने उत्तर प्रदेश के आठ बजट पेश किए हैं. मुझे पता है कि आलोचना क्या होती है. यदि आप सावधान और सतर्क हैं, तो लोग कहेंगे आप ‘सॉफ्ट’ हैं. भारतीय परिस्थितियों में आप बहुत ज्यादा हार्ड या बहुत ज्यादा सॉफ्ट नहीं हो सकते.”
एनडी तिवारी के बाद एसबी चव्हाण ने 1989-90 का बजट पेश किया.

फिर आई वीपी सिंह की सरकार. उसमें वित्त मंत्री रहे थे मधु दंडवते. जब उन्होंने 1990-91 का बजट पेश किया तो लोगों को उनसे बहुत कम उम्मीदें थीं. लेकिन ये बजट उम्मीद से उलट निकला था. दिग्गज निवेशक राकेश-झुनझुनवाला एक इंटरव्यू में बताते हैं-
'वीपी सिंह (तत्कालीन प्रधानमंत्री) ठाकुर थे, लेकिन उनकी समझ बनिया वाली थी. (ये बात उन्होंने शायद 1986-87 के बजट को देखकर सोची होगी) उस साल मधु दंडवते का बजट था. लोगों को लगा कि अच्छा नहीं होगा. पर मुझे अलग लगा. तीन करोड़ रुपये थे. बजट वाले दिन. सारे मार्केट में लगा दिए. जैसे-जैसे बजट आता रहा, पैसे बढ़ते रहे. रात के नौ बजे नेटवर्थ देखी तो पता चला अंटी में 20 करोड़ रुपये आ चुके थे. मेरी पत्नी को उन दिनों AC की धुन सवार थी. रात को 2 बजे घर पहुंचा और पत्नी रेखा से बोला, ‘अपना AC आ गया.’
इसके बाद अगले कुछ सालों तक राजनीतिक अनिश्चितता का दौर रहा. राजीव गांधी की मृत्यु ने हालात और बुरे कर दिए. इन्हीं सब घटनाओं ने देश की आर्थिक स्थिति काफी खराब कर दी. ये आर्थिक इमरजेंसी की स्थिति थी. भारत के पास मुश्किल से अगले कुछ दिनों के खर्चे के लिए पैसे बचे थे. कुछ ही महीनों पहले सुब्रमण्यम स्वामी खाड़ी युद्ध के एवज में अमेरिका से पैसों के लिए मोल-भाव कर रहे थे.

तब प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, उनके वित्त सलाहकार मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और आरबीआई गवर्नर – एस वेंकिटरमनन ने मिलकर एक निर्णय लिया. चुपके से. देश को बिना बताए. निर्णय था, सोना गिरवी रखने का. सोना गिरवी रखे जाने वाली एक्सक्लूसिव खबर को ब्रेक करने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार शंकर अय्यर ने बाद में बताया-
मैं एयरपोर्ट पर पहुंचा. वहां एक जहाज पर लोडिंग हो रही थी. हमने काफी सारी इनफॉर्मेशन वहां से पता लगाई. एटीसी (एयर ट्रैफिक कंट्रोल) से बात की. जहाज कहां जा रहा है, क्या लोड है. वहां हमने देखा कि RBI की काफी सारी वैन खड़ी थीं. सिक्यॉरिटी भी बहुत थी. अफसरों ने मुझसे कहा कि इतनी सिक्यॉरिटी पहले कभी नहीं देखी गई. जब सारा कुछ तहकीकात किया तो एकदम कन्फर्म हो गया कि यहां से सोना बाहर ले जाया जा रहा है.
बाद में मनमोहन सिंह को संसद में ये सफाई भी देनी पड़ी थी-
बजट 1991-92‘दुखद रूप से' ये ज़रूरी हो गया था.'
इसके बाद आया 1991-92 का अंतरिम बजट, जिसे यशवंत सिन्हा ने पेश किया. चंद्रशेखर तब भी प्रधानमंत्री थे. चुनाव सिर पर थे, जिनके बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी. अब पीएम बने पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह उनके वित्त मंत्री.

बजट आने में अभी देर थी. उससे पहले ही इन दोनों ने दो चरणों में मुद्रा का अवमूल्यन कर दिया. पहले 16 प्रतिशत फिर 6 प्रतिशत. साथ ही ज्यादातर औद्योगिक लाइसेंसों (की जरूरतों) को समाप्त कर दिया गया. इसके बाद मनमोहन सिंह ने 'फिर से' 1991-92 का बजट पेश किया. अबकी बार पूर्णकालिक. इस बजट से पहले का एक मजेदार वाकया विनय सीतापती द्वारा लिखित नरसिम्हा राव की बायोग्राफी ‘दि मैन हू रिमेड इंडिया’ में पढ़ने को मिलता है. इसके अनुसार,
'मनमोहन सिंह के 1991-92 वाले बजट का पहला ड्राफ्ट एक ‘समाजवादी दस्तावेज’ सरीखा था. प्रधानमंत्री ने इस ड्राफ्ट को पढ़ा. थोड़ी उदासी, थोड़ा गुस्से और थोड़े अफसोस के साथ तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह से पूछा, ‘क्या मैंने तुम्हें इसलिए ही चुना था?’
इसके कुछ दिनों बाद मनमोहन सिंह उस बजट ड्राफ्ट के साथ वापस आए, जिसे आज तक याद किया जाता है. 24 जुलाई 1991 को बजट पेश करते हुए मनमोहन सिंह बोले और खूब बोले. उनका ये भाषण आज तक का सबसे लंबा बजट भाषण बन गया. 18,650 शब्द लंबा. लेकिन ये भाषण ऐसा नहीं था, जो सिर्फ एक ट्रिवियल फैक्ट (मामूली या गैरजरूरी जानकारी/तथ्य) बनकर रह जाए. इसे कुछ लोग देश का सबसे बेहतरीन ‘आर्थिक भाषण’ भी कहने लगे. 1991-92 के इस बजट की सबसे खास बातें थीं-
आयात शुल्क को 300% से घटाकर 50% करना, सीमा शुक्ल को 220% से घटाकर 150% कर दिया था. आयात के लिए लाइसेंस प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रावधान भी इस बजट में था. बजट में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण यानी LPG (liberalisation, privatisation & globalisation) की बात की गई थी.
इस बजट ने मनमोहन सिंह के अगले कुछ बजटों के साथ मिलकर आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की. यह अपनेआप में कितना बड़ा इवेंट था, इसका अंदाजा वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के इस बयान से लग जाता है, जो उन्होंने ‘दि नाइंटीज़: दी ग्रेट इंडियन ड्रीम’
नाम की डॉक्युमेंट्री में दिया था.
"मध्यम-वर्ग में एक नई ही ऊर्जा का संचार हो गया था. ऐसी ऊर्जा, जो अवसरों के लिए कोई भी दरवाजा तोड़ने को तैयार थी. मुझे लगता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के बजट ने बाकी सभी चीजों के इतर सबसे बड़ा काम ये किया था कि उसने लोगों के मन को आजाद कर दिया था."
हालांकि उस वक्त इस बजट के कम ही लोग मुरीद थे. संसद में तो इस पर काफी बवाल मचा था. विरोध में लाल (कम्युनिस्ट) से लेकर भगवा (भाजपा) तक सब शामिल थे. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ये भी बोल गए-
“ऐसे ही ईस्ट इंडिया कंपनी भी भारत आई थी और अंततः देश गुलाम हो गया.”
इस पर प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव उन्हें बीच में टोकते हुए बोले-
‘चंद्रशेखर जी, मैंने तो आपके आदमी (मनमोहन सिंह) को ही वित्त मंत्री बनाया है. फिर आप क्यों आलोचना कर रहे हैं.’

इस पर चंद्रशेखर ने नरसिम्हा राव को जवाब देते हुए कहा-
“नरसिम्हा राव जी, बात तो आपकी सही है लेकिन जिस चाकू को हम सब्जी काटने के लिए लाए थे, उससे आप हार्ट का ऑपरेशन कर रहे हैं.”
लेकिन ये और ऐसी तमाम प्रतिक्रियाएं गलत साबित हुईं. अर्थव्यवस्था के लिए अपनाई गई उदारीकरण की नीति से जब देश के आर्थिक हालात सुधरे तो जनवरी 1991 (तब चंद्रशेखर पीएम थे) में गिरवी रखा गया देश का सोना साल के अंत तक वापस खरीद लिया गया. यहां इकबाल का वो शेर याद आता है, जिसे मनमोहन सिंह ने अपने 1991 वाले बजट में पढ़ते हुए मानों कोई भविष्यवाणी की थी-
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोम सब मिट गए जहां से अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशां हमारा
ओपन मैगजीन अपने एक आर्टिकल में
1991 और उससे पहले के कुछ बजटों की समीक्षा करते हुए लिखती है-
देश में जितना बड़ा संकट आया, विकास में उतनी बड़ी बाधा आई. ये संकट हर कमाल के बजट के लिए एक आवश्यक और पर्याप्त शर्त बने. संकट चाहे राजनीतिक रहा हो या आर्थिक या फिर, जैसा कि ज्यादातर मामलों में था, दोनों का कॉम्बो. 1991 वाले बजट के बाद अगले तीन वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था ने लंबी उड़ान भरी. एक ‘क्राइसेस’ ने फिर से अजूबा कर दिया था.
2022-23 में भी देश बहुत बड़े संकट से जूझ रहा है. और वित्त मंत्री, निर्मला सीतारामण ने कुछ दिनों पहले कहा भी था कि अबकी बार का बजट पिछले हर बजट से बेहतरीन होगा. 'उम्मीद' मनमोहन सिंह द्वारा 1991 के बजट भाषण में कही एक बात दिलाती है, जो असल में विक्टर ह्यूगो का कोट है-
No power on earth can stop an idea whose time has come.
जब किसी ‘विचार’ का सही समय आ जाए तो फिर उसे कोई ताकत नहीं रोक सकती.
आगे बात करेंगे उदारीकरण से लेकर आज तक आए बजटों की यात्रा की.
(ये स्टोरी हमारे साथी रहे दर्पण साह की लिखी है)
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