भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही ट्रेड डील की बातचीत एक बार फिर अटकती नजर आ रही है. दोनों देशों के बीच फरवरी में एक समझौते का खाका तैयार हुआ. इसके तहत भारतीय सामान पर अमेरिकी टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने पर बात बनी. बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कई देशों पर ‘सजा देने की नीयत से लगाए’ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ को रद्द कर दिया. इससे 10 फीसदी का बेसलाइन टैरिफ लागू हुआ.
US से ट्रेड डील अटकी तो बढ़ेंगी मुश्किलें, इन 5 बड़े खतरों से फिर कैसे निपटेगा भारत?
India-US Trade Deal में देरी सिर्फ अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट का मामला नहीं है. इसका असर भारतीय कंपनियों, किसानों, रुपये और देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. कैसे? आइए सब जानते हैं.

जिस इंडिया-यूएस ट्रेड डील के तहत भारत-अमेरिका ऊंची उड़ान भरना चाहते थे, उसे धक्का लगा है. इसे फाइनल करने में पेच फंस गया है. भारत की केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस हफ्ते की शुरुआत में कहा कि ट्रेड बातचीत एक 'ठहराव' की हालत में पहुंच गई है. उन्होंने कहा कि इसमें आगे बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम है.
वित्त मंत्री ने ये बात अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर की टिप्पणी पर कही. जेमिसन ग्रीर ने कहा था कि कोई डील 'जल्द होने वाली' नहीं है. भारत और अमेरिका के अधिकारी मान रहे हैं कि बातचीत फिलहाल एक तरह से ठहर गई है. ऐसे में अगर समझौता जल्द नहीं हुआ, तो भारत के सामने कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.
सबसे बड़ा खतरा अमेरिकी टैरिफ को लेकर है. अमेरिका में ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 301(b) के तहत भारत समेत कई देशों के खिलाफ ट्रेड जांच (Section 301 Investigations) चल रही है. इसके अलावा रूस से तेल खरीदने को लेकर भी भारत पर भारी टैरिफ लगाने की बात सामने आ चुकी है.
नए अमेरिकी कानून के तहत भारतीय सामान पर टैरिफ 100 फीसदी तक पहुंच सकता है. अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका में भारतीय सामान महंगा हो जाएगा और भारतीय कंपनियों के लिए वहां कारोबार करना मुश्किल हो सकता है.
2. एक्सपोर्ट पर दबावअमेरिका, भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार (Export Market) है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल से अगस्त के बीच भारत ने अमेरिका को करीब 42.79 अरब डॉलर (करीब 4.14 लाख करोड़ रुपये) का सामान एक्सपोर्ट किया, जो पिछले साल की इसी अवधि के 40.39 अरब डॉलर (लगभग 3.90 लाख करोड़ रुपये) से ज्यादा है.
माने, अभी एक्सपोर्ट मजबूत बना हुआ है. लेकिन अगर टैरिफ बढ़ता है तो भारतीय सामान की कीमत अमेरिकी बाजार में बढ़ जाएगी. इससे कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान, दवाइयों और दूसरे प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट पर दबाव पड़ सकता है.
3. रुपये पर असरट्रेड डील में देरी और एक्सपोर्ट पर दबाव का असर भारतीय रुपये पर भी पड़ सकता है. फाइनेंशिल ईयर 2025-26 के मुताबिक, भारत पहले ही अमेरिका के साथ करीब 34 अरब डॉलर (करीब 3.29 लाख करोड़ रुपये) के ट्रेड सरप्लस में है.
एनासिस्ट्स का मानना है कि ट्रेड डील ना होने पर भारत पर अमेरिका बहुत हाई टैरिफ लगा सकता है. सैंक्शन कानून से राहत भले ही मिल जाए, लेकिन रूसी तेल खरीदने से अमेरिका के लिए महंगा टैरिफ लगाने का रास्ता खुला रहेगा.
ज्यादा टैरिफ भारतीय एक्सपोर्ट्स की मुश्किल बढ़ाएगा. अगर भारतीय कंपनियों का एक्सपोर्ट घटता है और विदेशी मुद्रा की आमद कम होती है तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है. कमजोर रुपया आगे चलकर कच्चे तेल जैसे जरूरी इंपोर्ट को भी महंगा कर सकता है.
4. रूस से तेल खरीद बनी चुनौतीरूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है. अमेरिका चाहता है कि भारत, रूस से तेल खरीद कम करे, क्योंकि उसका मानना है कि इससे रूस को यूक्रेन युद्ध के लिए पैसा मिलता है.
भारत का कहना है कि 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश की एनर्जी जरूरतों को देखते हुए तेल कहां से खरीदा जाए, ये उसका अपना फैसला है. अगर इस मुद्दे पर सहमति नहीं बनी तो भारत पर और टैरिफ लगने का खतरा बना रहेगा. नए अमेरिकी कानून ने भारी-भरकम टैरिफ लगाने की राह और आसान कर दी है.
5. एग्रीकल्चर और घरेलू इंडस्ट्री बचानाभारत के लिए एग्रीकल्चर सेक्टर, सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है. अमेरिका के डेयरी, पोल्ट्री, चावल, गेहूं और दूसरे एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स के लिए भारत अपना बाजार ज्यादा खोलने के पक्ष में नहीं है. भारत सरकार को डर है कि इससे देश के किसानों और घरेलू कारोबार पर असर पड़ सकता है. दूसरी ओर अमेरिका भारत से ज्यादा बाजार खोलने और अमेरिकी प्रोडेक्टस को भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच देने की मांग कर रहा है.
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कुल मिलाकर, ट्रेड डील में देरी सिर्फ अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट का मामला नहीं है. इसका असर भारतीय कंपनियों, किसानों, रुपये और देश की इकोनॉमी पर भी पड़ सकता है. इसलिए, भारत के सामने अपने सेंसटिव सेक्टर्स को बचाते हुए अमेरिका के साथ ट्रेड डील फाइनल करने की बड़ी चुनौती है.
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