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जितिन हो गए देन, शीला दीक्षित हो गईं नाउ. हाऊ...

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आज से छह साल पहले की बात है. इंडिया टुडे मैगजीन एक खास इशू निकाल रही थी. थीम थी ‘देन एंड नाउ’ यानी तब और अब. इसके लिए कांग्रेस के दो नेता बुलाए गए थे. दिल्ली की लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं शीला दीक्षित. और धौरहरा से सांसद. राज्यमंत्री जितिन प्रसाद.

बातचीत की शुरुआत में ही शीला ने चुहल करते हुए कहा. आई होप आई एम नाउ एंड ही इज़ देन (उम्मीद करती हूं कि मैं अब में गिनी जाऊंगी और जितिन तब में आएंगे). इस पर जितिन प्रसाद खिलखिला दिए.

अब आगे. आज की बात. जितिन प्रसाद. 2014 में लोकसभा चुनाव हार गए. इधर छह-आठ महीने से उनका नाम चल रहा था. यूपी कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर. मगर बात बनी नहीं. राहुल गांधी ने राज बब्बर को कमान सौंप दी. फिर कहा गया कि राहुल गांधी की पोल मैनेजरी कर रहे प्रशांत किशोर ने जितिन के लिए कुछ और, कुछ बड़ा सोच रखा है.

जितिन प्रसाद
जितिन प्रसाद

लखनऊ में चर्चा चली कि कुंवर जितेंद्र प्रसाद के साहबजादे को सीएम फेस बनाया जाएगा. वजह. कांग्रेस अपने कोर वोट बैंक की तरफ लौटना चाहती है. जिसने उसे दशकों सत्ता में रखा. ब्राह्मण, मुसलमान और दलित. दलित तो कांशीराम ले गए. और फिर मायावती ने उन्हें हमेशा के लिए पक्का कर लिया. मुसलमान बाबरी मस्जिद के बाद से बिदक गए. अब तक पूरी तरह नहीं लौटे हैं. और ब्राह्मणों ने कांग्रेस को राम मंदिर आंदोलन के दौर में छोड़ना शुरू कर दिया था. 1989 में शुरू हुआ ये प्रोसेस 1991 में पूरा हो गया.

सत्ता के आदी ब्राह्मणों को समझ आ गया कि अब उनका पुरसा हाल कांग्रेस में नहीं. कथित तौर पर बनियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी में है. बीजेपी के अल्ले-पल्ले बाभन बने रहे. मगर 2007 के चुनाव में बाजी उलट गई. अब उन्हें नए नारे सुनाई दे रहे थे. हाथी गणेश हो गया था. बहुजन सर्वजन की बात कर रहा था. और कभी जूते मारने की बात करने वाली मायावती के बगल में मुस्कुराते हुए कोई बामसेफी दौर के नेता नहीं सतीश चंद्र मिश्र नजर आ रहे थे. बीएसपी ने झोंककर सवर्णों को टिकट बांटे. ब्राह्मणों को पता था. कल्याण सिंह को आगे कर चुनाव लड़ रही बीजेपी का कोई चांस नहीं. हाथी पर सवार हो गए. बीएसपी सत्ता में आ गईं.

ये एक सबक है. जो कांग्रेस घोंट रही है. और कह रही है कि अब सब वोटर ब्लॉक वोलेटाइल हो गया है. तो करना बस इतना है. कि एक ब्राह्मण चेहरे को आगे कर दो. काम हो जाएगा. इस सोच के पीछे एक तर्क और काम कर रहा है. कि इधर बीजेपी पिछड़े वोटों पर ज्यादा मेहरबान है. मोदी भी यूपी में अपनी ओबीसी पहचान जाहिर करते हैं. प्रदेश अध्यक्ष भी केशव प्रसाद मौर्या को बना दिया गया है. इसे काउंटर करने के लिए बीजेपी ने पहले गोरखपुर के नेता शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा भेजा. और फिर कलराज मिश्र को 75 का होने के बावजूद मोदी कैबिनेट से बाय-बाय नहीं किया.

अब वापस लौटें कांग्रेस की तरफ. जितिन प्रसाद सीएम फेस बनने की तैयारी में थे. मगर तभी कहीं का हगा, कहीं चहोरा वाली कहावत हो गई. प्रशांत किशोर को यूपी से पहले पंजाब देखना था. यहां वो अपनी हौंक रहे थे. मगर मुकाबले में हैं कैप्टन अमरिंदर सिंह. दरबार के पुराने वफादार. पांच साल सीएम रहे. पिछली बार भी तमाम ना-नुकुर के बावजूद राहुल गांधी को चुनाव से पहले कहना पड़ा था. कांग्रेस सत्ता में लौटी तो कमान कैप्टन को मिलेगी. मगर ऐसा हुआ नहीं. और चुनावी हार के बाद राहुल ने कैप्टन के खूब पर कतर दिए. पटियाला के राजा साहेब भी अपने में मगन हो गए. बीच-बीच में सुगबुगाहट उठी, मगर ज्यादा कुछ नहीं. मगर सोनिया गांधी के एक फोन ने सब बदल दिया. ये फोन हुआ था 2014 में. सोनिया ने कैप्टन को आदेश दिया. अमृतसर से जाकर अरुण जेटली के खिलाफ चुनाव लड़िए. कैप्टन इनकार नहीं कर पाए. और आगे की तो सब जानते हैं. जो अमृतसर सीट जेटली को केक वॉक लग रही थी. वो तमाम कोशिशों के बावजूद वह नहीं जीत पाए.

फोटो क्रेडिट: PTI
फोटो क्रेडिट: PTI

अमरिंदर मैडम की गुड बुक में लौटे. मगर राहुल गांधी का प्लान अभी भी कुछ और था. इसलिए प्रशांत किशोर को पंजाब तैनात कर दिया गया. यहां वह जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो गए. अमरिंदर ने सोनिया को साफ कर दिया. पिछली बार भी इसी चक्कर में सत्ता गंवाई थी. इस बार भी ये बाहरी आदमी आकर रौला जमा रहा है.

और अब आज की बात. प्रशांत किशोर हौंक दिए गए हैं. उनसे कहा गया है कि मेनिफेस्टो वगैरह देखिए. रणनीति बनाइए. टिकट बांटने और संगठन चलाने का काम हम पर छोड़ दीजिए. और इसीलिए पीके के भरोसे रहे जितिन प्रसाद की गड्डी छलांगा लगाने से पहले ही अटक गई.

एंटर गुलाम नबी आजाद. यूपी में कांग्रेस के नए प्रभारी. उन्होंने प्रियंका और राहुल को समझाया. कांग्रेस बरसों-बरस पुरानी पार्टी है. उसे पुराने रसूखदार नेताओं को आगे करना चाहिए. और इस गणित में नाम आया शीला दीक्षित का. शीला दीक्षित का यूपी कनेक्शन क्या है. उनके ससुर उन्नाव के थे. वह 84 में कन्नौज से सांसद और फिर मंत्री रहीं. 89 में हार गयीं. फिर नरसिम्हा राव के दौर में कांग्रेस में एक बगावत हुई. इसके अगुवा थे एनडी तिवारी और अर्जुन सिंह. उन्होंने कांग्रेस बनाई और उसका नाम रखा गया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी). इस पार्टी में इन दोनों के अलावा माखनलाल फोतेदार, शीशराम ओला और शीला दीक्षित जैसे गांधी परिवार के वफादार शामिल हुए. 1996 के लोकसभा चुनाव में शीला इसी पार्टी के टिकट पर अपनी ससुराल उन्नाव चुनाव लड़ने पहुंची. बुरी तरह हारीं. उन्हें सिर्फ 11 हजार वोट मिले. यानी कि जमानत जब्त हो गई. शीला समझ चुकी थीं. यूपी में अब उनका कोई भविष्य नहीं था. इसलिए उन्होंने दिल्ली पर फोकस किया.

लेकिन अब उनका नाम आ गया है. कांग्रेस के तमाम गुटों को प्रकट रूप से उनके आगे कतारबद्ध होना होगा. अमेठी के कुंवर संजय सिंह, शाहजहांपुर के कुंवर जितिन प्रसाद. कानपुर के श्री प्रकाश जायसवाल. रामपुर के प्रमोद तिवारी. फैजाबाद के निर्मल खत्री और आगरा के राज बब्बर. सबको शीला जी के हिसाब से चालें चलनी होंगी.

कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि पूरे उत्तर प्रदेश में किसी और नेता का ऐसा प्रोफाइल नहीं, जो अखिलेश-मुलायम और मायावती का मुकाबला कर सके. प्रियंका गांधी का नाम आगे बढ़ाना ट्रंप के पत्ते को बर्बाद करना होगा. राहुल तो पूरे देश के हैं. और बाकी जो नेता बचे हैं, वे अपने-अपने इलाकों भर के हैं. पूरे सूबे के लिए ऐसा चाहिए, जो कद्दावर हो. और गणित पर जितिन शीला के सामने कहीं नहीं टिकते.

लेकिन कांग्रेस का ये दांव कारगर नहीं लगता. आजकल युवा वोटर फिजा बनाते हैं. 78 की शीला उन्हें कैसे लुभा पाएंगी. और 12 फीसदी ब्राह्मण वोटरों की चाल तो उन्हें ये नाम देने वाले ब्रह्मा भी न भांप पाएं. कभी कहता है कि अबकी बार, भाजपा सरकार. कभी कहता है कि टिकट तो बहन जी ही दे रही हैं.

शीला के सामने दिक्कत इतनी ही नहीं. असल बात तो बूथ की है. जिसने बूथ जीता, उसने चुनाव जीता, अमित शाह ये बात यूं ही मंतर की तरह बार-बार नहीं दोहराते. और कांग्रेस में हाल ये है कि जिला कमेटी नेहरू भवन के बाहर निकलते ही छितरा जाती है. बस्ता रखने और झंडा ढोने वाले नहीं मिलते. इतने कम समय में शीला इसे कैसे चाक चौबंद कर पाएंगी. नेताओं की लीला. वही जानें.


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