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ये नवाब कांग्रेस से जीता, फिर बसपा से, फिर सपा से, फिर कांग्रेस से, फिर बसपा, फिर... अमां क्या है ये?

आज़ादी मिली थी और 1952 में आम चुनाव हुए. और पहली बार रामपुर से सांसद चुने जाने वाले नेता अबुल कलाम आज़ाद थे. स्वार विधानसभा उस लोकसभा क्षेत्र का है हिस्सा है जहां बीजेपी के लीडर मुख़्तार अब्बास नक़वी भी सांसद चुने गए. समाजवादी पार्टी से अभिनेत्री जया प्रदा भी सांसद बनीं. ये वो सीट है जिस पर नवाब ज़ुल्फ़िकार अली खान पांच बार सांसद चुने गए. पहले 1967 से 1977 तक और फिर 1980 से 1991 तक. स्वार विधानसभा से जो मौजूदा विधायक हैं वो नवाब काज़िम अली खान उर्फ़ नवेद मियां हैं. ये नवेद मियां, ज़ुल्फ़िकार अली खान के बेटे हैं. नवेद मियां कांग्रेस, सपा, बसपा की परिक्रमा कर चुके हैं. और इस बार कांग्रेस का दामन छोड़कर एक बार फिर बसपा के उम्मीदवार हैं. मगर नवाबियत को चुनौती एक लड़के ने दे दी है. किले को भेदने की तैयारी कर रहा ये लड़का सपा नेता आज़म खां का बेटा अब्दुल्लाह आज़म खां है. लेकिन ये वो भी सीट हैं, जहां बीजेपी या तो जीती है या दूसरे नंबर पर रही है. लेकिन इस बार मुकाबला नवाब और आज़म खां के बेटे के बीच ही माना जा रहा है.

स्वार विधानसभा सीट

2012 के आंकड़ों के मुताबिक कुल वोटर्स – 2 लाख 68 हजार 889
पुरुष वोटर्स – एक लाख 45 हजार 604
महिला वोटर्स – एक लाख 23 हजार 216

पहले ये सीट स्वार टांडा नाम से थी. परिसीमन हुआ और ये सीट स्वार हो गई. इस सीट पर अभी तक सिर्फ एक बार विधानसभा चुनाव हुए हैं. यानी 2012 में. और जीत उसे ही मिली जो साल 2002 से इस सीट पर जीत रहा था. यानी नवाब काज़िम अली खान उर्फ़ नवेद मियां. 2012 में वो कांग्रेस के टिकट से लड़े थे. उससे पहले वो सपा का दामन पकड़े थे. इस बार इस सीट से कैबिनेट मंत्री आजम खान के बेटे अब्दुल्लाह आजम खां को समाजवादी पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है. इसलिए इस बार सीट पर अहम मुकाबला होने की संभावनाएं हैं. समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी का असर चुनाव पर पड़ सकता है. क्योंकि इस सीट पर कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारना चाहती थी.

swar tanda

बसपा कैंडिडेट

नवाब काजिम अली खान रामपुर के ही हैं. सियासत और नवाबियत दोनों ही विरासत में मिली हैं. नवेद मियां के नाम से भी जाने जाते हैं. बेगम नूरबानो और जुल्फिकार के बेटे हैं, नूर बेगम कांग्रेस के टिकट पर रामपुर की सांसद भी रह चुकी हैं.

nawab ali

नवेद मियां वो शख्सियत हैं, जिन्होंने स्वार (2012 से पहले स्वार टांडा) पर बसपा और सपा का भी खाता खुलवा दिया. मतलब ये कि पहले 2002 में कांग्रेस से विधायक बने, फिर 2007 में बसपा से. किन्हीं वजहों से इस्तीफ़ा दे दिया, और उसी साल फिर उपचुनाव हुआ. सपा का दामन थामकर फिर विधायक बन गए. 2012 में फिर चक्र घूमा और वो कांग्रेस में आ गए. और इस बार साल 2017 में एक बार फिर बसपा का पल्लू थाम लिया है. क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें क्रॉस वोटिंग करने पर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. मियां नवाब के राजनीतिक करियर को देखकर कह सकते हैं कि पहले एक से 10 तक की गिनती गिनी और अब 10 से एक की तरफ जा रहे हैं. यानी कांग्रेस का दामन छोड़कर बसपा. अब देखना ये है कि कितने टाइम तक टिकते हैं. उनके पार्टी इतिहास को देखते हुए अबके सपा में जाने की बारी है.

सपा कैंडिडेट

अब्दुल्लाह आज़म को उम्मीदवार बनाया है. आजम खान के बेटे हैं. और लगातार नवाब खानदान पर हमलावर हैं. उनकी सियासत को तगड़ी चुनौती दे रहे हैं. वो इतने युवा हैं कि उनकी उम्र को लेकर विवाद हो गया है. क्योंकि विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए कम से कम उम्र 25 साल होनी चाहिए.

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पहले बसपा के नवाब काज़िम अली उर्फ़ नवेद मियां ने जिलाधिकारी को शिकायत कर दी, जिसमें कहा गया कि अब्दुल्लाह की उम्र 24 साल 7 महीने है. लेकिन वो सही से प्रूफ नहीं दे पाए इसके चलते ज़िला प्रशासन ने अब्दुल्लाह आज़म का नॉमिनेशन सही माना. लेकिन अब भाजपा ने चुनाव आयोग से अब्दुल्लाह आजम पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है. कहा गया है कि उनकी उम्र 25 साल नहीं है. अब्दुल्लाह आजम के नामांकन को रद्द किया जाए. अभी इसपर कोई फैसला नहीं आया है. अगर नामांकन रद्द होता है तो ये सपा और कांग्रेस के लिए बड़ा झटका होगा.

भाजपा कैंडिडेट

लक्ष्मी सैनी. 2012 में भी बीजेपी की उम्मीदवार थीं. लेकिन नवाब नवेद मियां के सामने नहीं टिक पाईं. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर नवेद मियां ने लक्ष्मी सैनी को 13715 वोटों से हरा दिया था. इस बार फिर बीजेपी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बना दिया है. इस सीट पर बीजेपी भी कमज़ोर नहीं है. क्योंकि यहां शिव बहादुर सक्सेना लगातार 4 बार विधायक बने हैं. यानी 1989, 1991, 1993, 1996. और फिर इसके बाद वो तीन बार दूसरे नंबर पर रहे. और पिछली बार लक्ष्मी सैनी दूसरे नंबर पर रहीं.

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यहां प्रत्याशी बनाये जाने के लिए संघ की पसंद शांतिलाल चौहान थे. बीजेपी ने लक्ष्मी सैनी को टिकट देकर पिछड़ी जातियों को साधने की कोशिश की है. लेकिन इस फैसले से चौहान बिरादरी में नाराज़गी है, जो लक्ष्मी सैनी के लिए परेशानी का सबब बन सकती है.

स्वार का चुनाव होगा जबर

अब तक के स्वार के सियासी हालात को देखकर कहा जा सकता है कि नवाब को पार्टी की ज़रूरत नहीं रही है, बल्कि वो पार्टी के लिए ज़रूरी रहे हैं, जो पार्टी से निकाले जाने या छोड़े जाने के बाद वापसी कर रहे हैं. लेकिन इस बार नवाब का राजनीतिक किला खतरे में है. और इसको भेदने के लिए आज़म खान ने अपने लाडले को मैदान में उतारा है. भले ही उसकी उम्र को लेकर विवाद हो, लेकिन उसने नवाब का सुकून छीन लिया है. तभी तो मोहम्मद आज़म एक दिन में कई जनसभाएं कर रहे हैं. और अब से नहीं 2-3 महीने से.

abdullah azam

वो रैली करते हैं. और राजमहल को ज़ुल्मी बताते हुए उनकी दास्तान सुनाते हैं. वो रामपुर मॉडल की बात करते हैं, क्योंकि वहां से उनके पापा (आज़म खान) विधायक हैं. और इस बार भी उम्मीदवार हैं. और वहां से आठ बार विधायक बन चुके हैं. स्वार सीट पर नवाब का बोलबाला रहा है. मगर जितनी मुश्किल अब्दुल्लाह आजम ने खड़ी कर दी है, उतनी तो शायद आज़म खान ने भी नहीं की होगी. अपने बचाव में नवाब ये ही कह पाते हैं, आज़म खान रामपुरी नहीं हैं. और उन्होंने रामपुर में विकास के नाम पर लोगों को बेघर कर दिया है.

नवेद मियां के लिए इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि रामपुर में कांग्रेस का अच्छा खासा वोट बैंक रहा है, भले ही वो नवाबी खानदान की बदौलत हो. लेकिन इसबार कांग्रेस, सपा से गठजोड़ कर बैठी है. और कैबिनेट मिनिस्टर आजम खान बराबर की सीट से ही विधायक हैं. अगर उम्र के विवाद से अब्दुल्लाह आज़म पार पा लेते हैं तो ये नवाब को एकदम कर्री टक्कर देंगे.

मगर आपने वो कहावत तो सुनी होगी. दो बिल्लियों की लड़ाई में मज़ा बंदर का आ जाता है. तो नवेद और अब्दुल्लाह आज़म के मुकाबले के बीच बीजेपी को कमज़ोर नहीं आंका जा सकता. वो इसलिए क्योंकि बीजेपी ने जब से स्वार या स्वार-टांडा सीट पर चुनाव लड़ा है या तो वो जीती है या फिर दूसरे नंबर पर रही है. लेकिन इस बार सियासी समीकरण बदले हैं.

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