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इन लोगों ने 128 सीटों पर भाजपा का गेम बना दिया

इस बार के चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा की लहर, आंधी, तूफान सब कुछ है. इन नतीजों में नरेंद्र मोदी की लहर के साथ भाजपा की सहयोगी पार्टियों ने भी चौंकाने वाले नतीजे दिए हैं. 2017 के चुनावों में भाजपा से मिलते-जुलते नाम वाली एक पार्टी ने भासपा का प्रदर्शन भी चौंकाने वाला है. भाजपा की सहयोगी पार्टी भासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) ने न सिर्फ अपनी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत की है. बसपा के पूर्व नेता ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के साथ गठबंधन से भाजपा को भी पूर्वांचल में जीत दर्ज करने में मदद की है.

क्या है भासपा?

बनारस के फतेहपुर गांव में हेडक्वार्टर वाली भासपा पूर्वांचल के राजभर समुदाय की पार्टी है. राजभर समुदाय की गिनती पिछड़ों में होती है. अखिलेश यादव ने जिन 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रस्ताव दिया था उनमें राजभर जाति भी शामिल थी. पूर्वांचल की जातिगत गणना में राजभरों की गिनती करीब 18 प्रतिशत है. इसी वजह से पीले झंडे वाली ‘भारतीय समाज पार्टी’ रह-रहकर अलग पूर्वांचल मुद्दा उठाती है. भासपा ने इस बार कप प्लेट के निशान पर चुनाव लड़ा है.

कौन हैं ओमप्रकाश राजभर?

ओमप्रकाश राजभर ने 1981 में कांशीराम के समय में राजनीति शुरू की. 2001 में इनका बसपा में मायावती से विवाद हुआ था. राजभर भदोही का नाम बदल कर संतकबीर नगर रखने से नाराज थे. ओमप्रकाश राजभर की मानें तो इस नाम के बदलने से भदोही में राजभरों का इतिहास मिट रहा था. इसके बाद इन्होंने अपनी पार्टी बनाई. 2004 से चुनाव लड़ रही भासपा ने यूपी और बिहार के इलेक्शन्स में अपने प्रत्याशी खड़े किए मगर ज़्यादातर मौकों पर जीतने से ज़्यादा खेल बिगाड़ने वाले बने रहे. मगर इस बार भाजपा के साथ गठबंधन करके ओमप्रकाश राजभर की पार्टी ने भी सत्ता के साथ रहने का सुख पा लिया. वैसे ओमप्रकाश राजभर ने पहले मुख्तार अंसारी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. मगर बाद में पीछे हट गए थे.

क्यों जीती है भासपा?

2004 से अलग-अलग चुनावों में किस्मत आज़मा रही भासपा को इस बार भाजपा का साथ मिला. मोदी लहर और सही जातिगत समीकरण ही वो कुंजी है जिसने भासपा को जीत दिलवाई. भासपा के कैंडिडेट अपने कास्ट फैक्टर के चलते हर बार 5,000 से 50,000 वोट जीत जाते थे. इस बार भारतीय जनता पार्टी का साथ भी मिल गया. इसका दोनों पार्टियों को बड़ा फायदा मिला. इसके चलते भाजपा को पूर्वांचल की 128 सीटों पर बेहतर सोशल इंजीनियरिंग मिली. इस तरह के गठबंधनों के चलते भाजपा ने तमाम गैर-यादव ओबीसी जातियों को अपनी तरफ किया. जिसका सीधा फायदा चुनाव के नतीजों में दिखा.

क्या होंगे इस नई सोशल इंजीनियरिंग नतीजे?

इस सोशल इंजीनियरिंग का जितना फायदा भाजपा और छोटी पार्टियों को मिल रहा है. उससे कहीं ज़्यादा नुकसान दलित और पिछड़ों की राजनीति करने वाली बसपा और मायावती को होगा. मायावती दलितों के साथ जिन अति पिछड़ों को जोड़कर सत्ता में आ जाती थी. वो फॉर्मूला अब कारगर नहीं रहा.

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