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केजरीवाल से अगर मायावती ये सीख लें तो कमाल हो जाएगा

उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में सारा शोर भले समाजवादी पार्टी और भाजपा का हो, लेकिन मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी को खारिज करने की बेवकूफी कोई सपने में भी नहीं करता. पर बसपा प्रचार तो कर रही है, लेकिन प्रचार के एक मोर्चे पर वो लगातार पिछड़ रही है. बसपा का खराब मीडिया मैनेजमेंट उसे मेनस्ट्रीम न्यूज़ कवरेज से थोड़ा दूर ही रखता है और फेसबुक-वॉटसैप-ट्विटर से बसपा खुद दूर रहती है. उस माध्यम से जिसके सहारे आम आदमी पार्टी जैसी नई पार्टी आज कहां से कहां पहुंच गई है. बसपा को आम आदमी पार्टी से इस मामले में मंतर ले लेने की ज़रूरत है.

बसपा कहां पीछे छूटती है?

बसपा का मीडिया मैनेजमेंट बड़ा कमज़ोर रहा है. पार्टी का एक अकेला चेहरा मायावती हैं. प्रवक्ता हैं, पर पर रोज-रोज तो नहीं बोलतीं. कोई और बोलने वाला है नहीं. सब यही करती हैं.  पिछले दिनों दिल्ली के एक बैंक में कुछ खाते मिले जिनके बारे में शक था कि इनके ज़रिए कालाधन सफेद करने की कोशिश हुई. ये खाते बसपा के नाम से थे. मीडिया में हल्ला मच गया. लेकिन बसपा की तरफ से बयान अगले दिन जाकर ही आया, जब मायावती खुद इस मुद्दे पर बोलीं. तब तक का वक्त लोगों को कयास लगाने को मिल गया. ये एक मिसाल बस है. ऐसी घटनाओं से निश्चित तौर पर बसपा की छवि को नुकसान पहुंचता है.

मायावती-पार्टी की अकेली आवाज़. पिक्चर: Reuters
मायावती-बसपा की अकेली आवाज़. पिक्चर: Reuters

ऑनलाइन स्पेस से तो पार्टी लगभग गायब है. पार्टी के फेसबुक-ट्विटर पर कोई वेरीफाइड पेज नहीं हैं. मायावती पार्टी का अकेला चेहरा हैं, वो तक ट्विटर पर नहीं हैं.  2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ के ज़रिए बसपा को जीत दिलाने के मास्टरमाइंड सतीश चंद्र मिश्रा भी सोशली उतने एक्टिव नहीं हैं.

AAP कैसे निपटती है ‘कम कवरेज’ से?

आप काफी वक्त से ये शिकायत करती आई है कि उसे मीडिया जानबूझ कर कम कवर करता है. इस इलज़ाम की सच्चाई ठीक-ठाक बता पाना मुश्किल है. लेकिन इतना ज़रूर है कि पार्टी अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की भरसक कोशिश करती है. अखबारों-चैनलों से इतर पार्टी ऑनलाइन स्पेस पर अपनी आवाज़ हमेशा बुलंद रखती है. चाहे दिल्ली सरकार की उपलब्धियां गिनवानी हों या पंजाब में भगवंत मान की रैली या गोआ का यूथ मेनिफेस्टो, पार्टी पल-पल पर ट्वीट करती है. फेसबुक पर पोस्ट डालती है. इस तरह से पार्टी की बात सीधे लोगों तक पहुंचती है.

'मीडिया' में नहीं तो ट्विटर पर सही. (ट्विटर स्क्रीनशॉट)
‘मीडिया’ में नहीं तो ट्विटर पर सही. (ट्विटर स्क्रीनशॉट)

इतना ही नहीं, अपने पक्ष में इस्तेमाल की जा सकने वाली खबरों को भी पार्टी सोशल मीडिया पर तुरंत शेयर करती है.

फेसबुक स्क्रीनशॉट
फेसबुक स्क्रीनशॉट

राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल और फेसबुक पेज हैं. कह सकते हैं कि मीडिया द्वारा भेदभाव के इलज़ाम में अगर थोड़ी भी सच्चाई हो तो उसकी कुछ भरपाई तो पल-पल जनरेट होते नोटिफिकेशन कर ही देते हैं.

यही वो सबक है जो बसपा को सीखना चाहिए. अपनी छवि रातोंरात बदलना मुश्किल है और टीवी-अखबार जैसे पारंपरिक और खर्चीले साधनों पर अपनी धमक दर्ज कराना भी. लेकिन एक मीडिया सेल बनाकर ऑनलाइन कैंपेन चलाना कुछ आसान है. बसपा 2014 में एक भी सांसद चुनवा कर दिल्ली नहीं भेज पाई. उस हालत से उठकर उत्तर प्रदेश में भाजपा और सपा दोनों को पटखनी देने के लिए बसपा को एक चमत्कार की दरकार है. और इस चमत्कार का एक रास्ता सोशल मीडिया से होकर गुज़रता है.

पिक्चर: Reuters
पिक्चर: Reuters

ऑनलाइन स्पेस को युवा वोटर से जुड़ने का सबसे अच्छा माध्यम समझा जाता है. यहां से गायब पार्टी के बारे में ये राय बनने का खतरा रहता है कि ये यंग नहीं है.

राजनीति छवि बनाने और बेचने का खेल है. आप क्या करते हैं जितना ही ज़रूरी सवाल है कि लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं. एक तस्वीर को गढ़ कर उसे इस कदर मार्केट कर देना कि लोग उसे ही सच मानने लगें, राजनीति में एक ज़रूरत की तरह है. आपको लगातार खबरें बनानी हैं और खबरों में बने रहना है. खबरों के गदर में लोगों को बराबर याद दिलाते रहना कि एक पार्टी है जो आपके भरोसे, आपके वोट के काबिल है, आसान काम नहीं है.

इंटरनेट पर मचने वाला शोर पार्टियों के कितने काम का है इस पर बहस हो सकती है. लेकिन अगर चुनावी खेल के नियम ये कहते हैं कि फेसबुक पर पोस्ट डाले जाएं, ट्वीट किए जाएं और वॉट्सएप ग्रुप्स पर मैसेजेस की बाढ़ लाई जाए, तो बसपा के इस सब से दूर रहने का कोई तुक नहीं बनता.


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