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मुख्तार अंसारी के दोस्त को तोड़कर BJP ने बनाई स्ट्रैटजी!

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उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने मुख्तार अंसारी को उसी के गढ़ में घेरने की रणनीति बनाई है. शनिवार को इसका ऐलान किया जाएगा.

अनुप्रिया पटेल को केंद्र में मंत्री बनाकर बीजेपी ने यूपी के कुर्मी वोटों को अपना बनाने की कोशिश की है. जमीन मजबूत करने के लिए बीजेपी शनिवार को अगला कदम उठाएगी. उसकी नजर अब राजभर जाति के वोटों पर है.

जिन इलाकों पर राजभर जाति का असर है, उसमें मऊ भी आता है. जहां मुख्तार अंसारी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत हैं. बीजेपी का प्लान है कि वहां असर रखने वाली छोटी-छोटी पार्टियों को साथ लेकर अपनी ताकत बढ़ाई जाए. ये छोटी पार्टियां अकसर खुद तो चुनाव नहीं जीत पातीं लेकिन वोट काटकर किसी बडी पार्टी के खेल खराब करने की हैसियत रखती हैं.

बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव में 80 फीसदी वोटरों को ध्यान में रखकर गेमप्लान बनाया था. इस बार सामाजिक समीकरण का गुलदस्ता थोड़ा छोटा है. पार्टी विधानसभा चुनाव में यादव, मुसलमान, जाटव वोटों को छोड़ 60 फीसदी पर दांव लगा रही है. यूपी में 40 फीसदी ओबीसी वोटर है.

शनिवार को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, मऊ के रेलवे ग्राउंड में अति पिछड़ा और अति दलित महापंचायत में हिस्सा लेंगे. किसी रैली में ऐलान होगा कि ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समता पार्टी के साथ बीजेपी का चुनावी गठबंधन हो रहा है. सूत्रों के मुताबिक बीजेपी , ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समता पार्टी को 22 सीटें तक दे सकती है. पूर्वांचल के इलाके में करीब 42 सीटों पर राजभर वोटरों की अच्छी तादाद है और वो नतीजे बदलने की ताकत रखते हैं.

ओमप्रकाश राजभर के साथ तालमेल करके बीजेपी, इस इलाके में मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल को भी टक्कर देना चाहती है. कौमी एकता दल का सपा से गठबंधन होने के पहले ही टूट गया और अब वो खुलेआम कह रहें हैं कि वो मुलायम को सबक सिखाएंगे. बीजेपी मानकर चल रही है कि इससे उसे फायदा होगा.

खास बात यह है कि खुद मुख्तार अंसारी मऊ सदर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं. अभी संभावना यही है कि बीजेपी के साथ तालमेल के बाद इस बार ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समता पार्टी, मुख्तार अंसारी के खिलाफ कैंडिडेट उतारेगी. मजे की बात ये है कि पिछले चुनाव में ओमप्रकाश राजभर की पार्टी मुख्तार अंसारी के साथ चुनाव लड़ी थी. इस बार समीकरण दूसरे हैं.

ओमप्रकाश राजभर भी स्वामी प्रसाद मौर्य और आरती चौधरी की तरह पहले बहुजन समाज पार्टी में होते थे. लेकिन 2002 में उन्होंने मायावती से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली.

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