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कहानी आब-ए-ज़मज़म की, जिसे एयर इंडिया ने मक्का से लाना पहले बैन किया, फिर माफ़ी मांग ली

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ये मुस्लिमों की सबसे बड़ी तीर्थयात्रा ‘हज’ का समय है. मक्का पहुंचने वाले करोड़ों मुसलमानों में कई लाख हिंदुस्तान से भी होते हैं. मक्का सऊदी में है और वहां पहुंचने का रास्ता हवाई है. ऐसे में 4 जुलाई को एयर इंडिया (AI) ने एक नया नियम निकाला. कि जेद्दा से हैदराबाद-मुंबई (AI966) और जेद्दा से कोच्ची (AI964), इन दोनों फ्लाइट्स से आने वाले हाजी अपने साथ ज़मज़म का पानी नहीं ला सकेंगे. 15 सितंबर तक.

AI ने क्या कहा, क्यों लिया ये फैसला?
इस फैसले के पीछे वजह ये बताई गई कि इन दोनों फ्लाइट्स में जगह की थोड़ी कमी है. पहले AI का B747 और B777 एयरक्राफ्ट जेद्दा से आता-जाता था. अब AI ने उसको हटाकर यहां अपना AI966 और AI964 एयरक्राफ्ट लगा दिया. इसमें सीटें थोड़ी कम थीं. एयरलाइन का कहना था कि इसी को देखते हुए ये नया नियम बनाया है उसने. AI के इस नियम से हज जाने वालों में हड़कंप मच गया. वजह ये कि हाजी काबा से आब-ए-ज़मज़म का ढेर सारा पानी साथ लाते हैं. अपने लिए, दोस्तों-रिश्तेदारों के लिए. काबा जाने वालों का ज़मज़म के बिना लौटना होता ही नहीं. हाजी परेशान. हज कमिटी भी परेशान.

…फिर एयर इंडिया ने माफ़ी मांग ली
कमिटी का कहना था कि AI और उसके बीच हुए करार के मुताबिक, AI को हज करके लौट रहे हर शख्स को पांच लीटर ज़मज़म साथ लाने देना ही होगा. नियम ये है कि सऊदी से आने वाली AI की सारी कर्मशल फ्लाइट्स में यात्री 40 किलो तक सामान ला सकते हैं. जो ज़मज़म का पानी ला रहे हों, उनके लिए पांच किलो की स्पेशल छूट होती है. AI की खूब आलोचना हुई. राजनैतिक प्रेशर भी पड़ा. इसका नतीजा ये निकला कि 9 जुलाई को आखिरकार AI ने अपने उस पुराने फैसले पर सफ़ाई दी. कहा, जितने वज़न का सामान लाने की इजाजत है, उस सीमा के अंदर ज़मज़म का पानी ला सकते हैं हाजी. एयर इंडिया ने बस सफ़ाई नहीं दी. बाक़ायदा मुआफ़ी भी मांगी. कहा, हाजियों को होने वाली असुविधा के लिए वो सॉरी हैं.

काबा के पूर्वी कोने में लगा है ये पत्थर, जिसे मुस्लिम सबसे पवित्र मानते हैं
काबा के पूर्वी कोने में लगा है ये पत्थर, जिसे मुस्लिम सबसे पवित्र मानते हैं. 

क्या है आब-ए-ज़मज़म?
इस्लाम की सबसे पवित्र जगह काबा. काबा का वो काला पत्थर जिस अति-विशाल मस्जिद के कंपाउंड में है, उसका नाम है मस्जिद-ए-हरम. इसी मस्जिद की सरहद में एक कुआं है. ठीक-ठीक, काबा से करीब 66 फुट दूर पूरब की तरफ. इस कुएं का नाम है ज़मज़म. मुसलमान इसे दुनिया का सबसे पवित्र पानी मानते हैं. उनका यकीन है, ये चमत्कारिक है. इसके पानी को कहते हैं आब-ए-ज़मज़म. अरबी में आब का मतलब होता है पानी. आब-ए-ज़मज़म मतलब ज़मज़म का पानी. मुसलमान मानते हैं कि ज़मज़म पिछले करीब चार हज़ार सालों से है.

क्या है इस कुएं की कहानी?

सारा अब्राहम. अब्राहम हागर.
यहूदी, ईसाई और इस्लाम. तीनों को कहते हैं अब्राहमिक रिलीज़न. तीनों धर्मों ने अब्राहम को पैगंबर माना. इन्हीं अब्राहम से शुरू होती है ज़मज़म की कहानी. अब्राहम की पत्नी थीं सारा. दोनों की उम्र में 10 साल का अंतर था. शादी के कई साल बीत गए, मगर इन्हें बच्चा नहीं हुआ. वंश आगे बढ़ाने के लिए बच्चा अब भी ज़रूरी समझा जाता है. तब भी माना जाता था. सारा की एक दासी थी- हागर. कहते हैं, सारा ने अब्राहम से कहा कि वो हागर के साथ रिश्ता बना लें. बिना शादी किए. बस बच्चे के लिए. उस समय की यहूदी परंपराओं में ऐसा होता था कि ऐसे बच्चे शादीशुदा पत्नी से हुए बच्चों की तरह बरते जाते थे. हागर के साथ संबंध से अब्राहम को एक बेटा हुआ. उसका नाम रखा गया- इस्माइल.

मगर फिर सारा का खुद का बच्चा हो गया
फिर क्या हुआ कि सारा खुद प्रेगनेंट हो गईं. कहते हैं, उस समय अब्राहम की उम्र थी 100 बरस और सारा थीं 90 साल की. अब्राहम और सारा के भी बेटा हुआ. इसका नाम रखा गया इसाक. जिसका यहूदी परंपरा में आइज़क भी उच्चारण करते हैं. आगे क्या हुआ, ये पता है. मगर क्यों हुआ, इसको लेकर कई कहानियां हैं. कुछ के मुताबिक, खुद ईश्वर ने अब्राहम को आदेश दिया कि वो इस्माइल और हागर को बक्का की बंजर घाटी में छोड़ आएं. कुछ कहानियां ऐसी हैं कि सारा ने अब्राहम से कहा था कि वो हागर और उनके बेटे को कहीं दूर छोड़ आएं. इंसानी नज़रिये से देखें, तो लगता है अपना बेटा हो जाने के बाद सारा को हागर और इस्माइल से ईर्ष्या हुई होगी. और उन्होंने अपने प्रभाव और प्रेम का इस्तेमाल करके हागर और इस्माल को निकलवा दिया होगा.

अब्राहम, हागर को दुधमुंहे इस्माइल के साथ रेगिस्तान में छोड़ आए
तो एक दिन अब्राहम ने हागर से कहा, वो लंबे सफ़र की तैयारी करें. इस्माइल अभी दुधमुंहे बच्चे थे. हागर और इस्माइल को साथ लेकर अब्राहम चले. फिर हरे-भरे इलाकों, पहाड़ों को पार करके वो पहुंचे अरब के रेगिस्तान. वहां, जहां आज मक्का है. इस रेगिस्तान में छांव का एक कतरा नहीं था. न कोई पेड़, न पानी का एक क़तरा. अब्राहम ने हागर और इस्माइल को यहीं उतार दिया. फिर थोड़ा पानी और थोड़ा सा खाना देकर चले गए. जाते-जाते उन्होंने हागर से कहा. ऊपरवाला तुम्हारा खयाल रखेगा.

भरे रेगिस्तान में अकेली औरत और उसका दुधमुंहा बच्चा
ये कितना मार्मिक लगता है. एक औरत और उसके छोटे बच्चे को यूं बीच रेगिस्तान अकेला छोड़कर चला जाया जाए. ख़ैर. तो क़िस्सा है कि बच्चे को प्यास लगी. वो प्यास से रोने लगा.उसकी प्यास बुझाने के लिए हागर बेहाल सी रेगिस्तान में दौड़ती रही. दो पहाड़ियां थीं- सफ़ा और मरवा. इस पहाड़ी से उस पहाड़ी. मगर पानी का नाम-ओ-निशान नहीं कहीं. हागर थककर चूर हो गईं. एकदम बेदम सी. कहानी है कि तभी हागर को एक फरिश्ते ज्रिबाइल की आवाज़ सुनाई दी. वो इस्माइल के पास खड़ा था. जहां इस्माइल की एड़ी थी, वहीं फरिश्ते ने ज़मीन खोदना शुरू किया. और ज़मीन से साफ़-मीठे पानी का सोता भरभरा कर ऊपर आने लगा. रेगिस्तान में यूं पानी का आना चमत्कार था. अतिशय सुखद था.

पहले ज़मज़म के कुएं पर ये लोहे का घेरा लगा था. रस्सी में बाल्टी लटकाकर पानी निकाला करते थे. ये अब वहां सऊदी के म्यूजियम में रखा है (फोटो: muslimvillage.com)
पहले ज़मज़म के कुएं पर ये लोहे का घेरा लगा था. रस्सी में बाल्टी लटकाकर पानी निकाला करते थे. ये अब वहां सऊदी के म्यूजियम में रखा है (फोटो: muslimvillage.com)

रेगिस्तान का वरदान: ज़मज़म से काबा
कहानी है कि जिब्राइल ने ही फिर हागर से कहा. वो डरे न. कि वो जहां है, वो ऊपरवाले का घर है. वो घर, जिसे इस्माइल बनाएंगे. कहते हैं कि इसके कुछ समय बाद जुरहम के कबीले ने वहां से गुजरते हुए एक चिड़िया देखी रेगिस्तान में. ऐसी मरुभूमि में चिड़िया का होना, माने पानी की मौजूदगी. यूं उन्हें ज़मज़म मिला और वो मक्का में ही बस गए. इन्हीं के बीच बड़े हुए इस्माइल. यही इस्माइल काबा के गार्जियन हुए. आगे मक्का बसा. और फिर इससे आगे की और हज़ारों कहानियां बनीं.

ज़मज़म के पानी की क्वॉलिटी को लेकर भी चिंताएं हैं
पहले तो लोग रस्सी और बाल्टी से पानी निकाला करते थे. अब सिस्टम बदल गया है. लोग शीशे के पार से कुआं देखते हैं. बिजली के पंप ज़मज़म से पानी निकालते हैं. जून 2016 की खलीज़ टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, किंग अब्दुल्ला ज़मज़म वॉटर फैक्ट्री रोज़ाना दो लाख बोतलें बनाती हैं ज़मज़म पानी की. रमज़ान और हज के दौरान ज्यादा बोतलें आती हैं. हालांकि इस पानी की गुणवत्ता पर कई सवाल भी उठे. ख़बरें आईं कि इस पानी में आर्सेनिक ख़तरनाक स्तर पर है. 2010 में सऊदी ने 700 मिलियन रियाल के एक प्रॉजेक्ट का ऐलान किया था. ये ज़मज़म के पानी को प्यूरिफाई करने के लिए था. ताकि पानी की गुणवत्ता सही रहे.

ज़मज़म के इस कुएं ने मक्का को आबाद किया. उसे बसाया. ज़मज़म के इस कुएं को पानी मिलता है ज़मीन के अंदर बहते कई सारे चश्मों से. चश्मा मतलब मीठे पानी का सोता. सोचिए. दूर-दूर तक फैला अथाह रेगिस्तान. जहां पानी का नाम-निशान नहीं. और ऐसे में बीच रेगिस्तान एक मीठे पानी का कुआं. नदियों और दरियाओं के इलाके वाले लोग शायद 25-50 साल पहले तक नहीं समझ पाते. कि ऐसी सूरत में पानी का ओहदा दैविक से कम क्या हो सकता है. मगर ग्लोबल वॉर्मिंग ने अब दुनिया को समझा दिया है. कि फिलहाल मीठे पानी से कीमती कुछ नहीं. सैकड़ों साल पहले के उस मक्का में भी रेगिस्तान के बीच का ये कुआं ऊपरवाले का आशीर्वाद ही समझा गया. दूर-दूर के लोगों के लिए. वहां से गुज़रते कारवांओं, राहगीरों के लिए. दुनिया की सारी प्राचीन सभ्यताएं किसी नदी के किनारे बसीं और बढ़ीं. यूं ही ज़मज़म के इर्द-गिर्द मक्का बसा. लोगों ने इसे समझा दिव्य, पवित्र, श्रद्धेय. अनमोल खजाना.


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