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अटल बिहारी वाजपेयी और प्रमोद महाजन में लड़ाई क्यों हुई थी?

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मुंबई 2005

बीजेपी अधिवेशन

अटल बिहारी वाजपेयी रिटायरमेंट का ऐलान करते हैं. और कहते हैं, अब आडवाणी- महाजन की जोड़ी राम लक्ष्मण की तरह बीजेपी को आगे ले जाएगी.

आडवाणी. पचास के दशक में वाजपेयी के निजी सचिव से करियर की शुरुआत. फिर सांसद, पार्टी अध्यक्ष, मंत्री और उप प्रधानमंत्री तक का सफर. सफर का एक पड़ाव पीएम इन वेटिंग भी था. मगर वो एक जुमला भर रह गया. जो अब मार्गदर्शक मंडल नाम की कुटीर में दीवार पर चस्पा है.

अब दूसरे नाम पर चलते हैं. महाजन. प्रमोद महाजन. जो राम लक्ष्मण वाले इस बयान के कुछ ही महीने बाद कत्ल कर दिए गए. भाई के हाथों. उससे पहले प्रमोद के हाथों बीजेपी खूब संवरी. पहले वह आडवाणी के सारथी बने. रामरथयात्रा उन्हीं के दिमाग की उपज थी. आडवाणी तो जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर की तर्ज पर पदयात्रा करना चाहते थे. प्रमोद बोले, मेटाडोर पर सवार होइए. ज्यादा जगहों तक पहुंचेंगे.

पहुंचे. प्रमोद. आडवाणी के करीब. मगर फिर नब्बे के बीच और राम लक्ष्मण वाले ऐलान से ठीक दस साल पहले उसी मुंबई में एक और ऐलान हो गया.

मुंबई 1995

बीजेपी अधिवेशन

आडवाणी ऐलान करते हैं. विरोधी पूछ रहे हैं कि बीजेपी का पीएम फेस कौन होगा. मैं घोषणा करता हूं. अटल बिहारी वाजपेयी हमारे प्रधानमंत्री होंगे.

एलके अडवानी और अटल बिहारी वाजपेयी.
एलके आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी.

वाजपेयी. अवाक रह गए. आडवाणी उनके बगल में अपनी कुर्सी पर लौटे तो अटल बोले. ये क्या कर दिया. मुझसे तो पूछ लेते. आडवाणी मुस्कुरा दिए. मुस्कुरा महाजन भी रहे थे. मगर भीतर उथल पुथल थी. राजनीति के पक्के खिलाड़ी प्रमोद महाजन को अब अंदाजा हो चला था. पार्टी में अटल की फिर से तूती बोलेगी. सत्ता चाहिए तो संगठन भी उनके हिसाब से ही चलेगा. मगर दिक्कत ये है कि उनके ऊपर आडवाणी खेमे का ठप्पा लगा है.

प्रमोद महाजन ने ठप्पा हटाने की ठानी. धीमे धीमे वाजपेयी के करीब आए. अटल की दत्तक पुत्री नमिता और दामाद रंजन भट्टाचार्य से प्रगाढ़ हुए. उन्हीं की तरह वह भी अटल को बाप जी कहने लगे. अटल फिर महाजन को अपना संकटमोचन मानने लगे. वह भूल गए. 1989 का वह दौर, जब मंच पर महाजन उनसे उलझ पड़े थे.

पालमपुर 1989

बीजेपी अधिवेशन

महंत अवैद्यनाथ के नेतृत्व में रामजन्मभूमि यज्ञ समिति अपना आंदोलन तेज कर चुकी है. शिलान्यास का ऐलान हो चुका है. कुंभ में लाखों साधु जुट चुके हैं. हर हिंदू के घर से एक ईंट और सवा रुपये लेने का प्रस्ताव आने में कुछ महीने थे, मगर इसकी चर्चा शुरू हो चुकी थी. बीजेपी की सब पर नजर है. विश्व हिंदू परिषद (विहिप) उसके जेबी संगठन के तौर पर काम नहीं कर रहा है. शिलान्यास के प्रस्ताव को उस वक्त की कांग्रेस सरकार के गृह मंत्री बूटा सिंह और यूपी के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी का सहयोग मिल चुका है. यह सब समझ आडवाणी ने तय किया. अब पूरी तरह से विहिप के आंदोलन से जुड़ने का वक्त आ गया है. ऐसे में बीजेपी ने अपने अधिवेशन में प्रस्ताव पारित करने का विचार किया. प्रस्ताव यह था कि इस विवाद ( राम जन्मभूमि) को अदालत के जरिए नहीं सुलझाया जा सकता. रामजन्मभूमि के लिए कांग्रेस सरकार भी वैसा ही फैसला करे, जैसा प्रधानमंत्री नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के सम्मान में किया था. सरकार को हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस स्थान को हिंदुओं को सौंपना चाहिए. इसके लिए या तो बातचीत का रास्ता अपनाया जाए. या फिर कानून बनाया जाए. लेकिन अदालत के रास्ते इसे कतई नहीं सुलझाया जा सकता.

फोटो क्रेडिट: reuters
फोटो क्रेडिट: reuters

अटल इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे. उनके करीबी जसवंत सिंह अटल को लगातार विरोध के लिए उकसा रहे थे. मगर अटल ने अपना विरोध सांकेतिक रखा. मुखर नहीं हुए. तभी वीपी सिंह के साथ उनकी बात मुलाकात हवा में उड़ने लगी. वीपी उन्हें लगातार साथ आने का न्योता दे रहे थे. अटल साथ आए. मगर पार्टी छोड़कर नहीं. बीजेपी ने उन्हें ही आगे किया. वीपी सिंह की जनता दल और उसके छाता संगठन जन मोर्चा के साथ समन्वय का. अटल का साथ दे रहे थे आडवाणी के एक और बैकरूम ऑपरेशन चैंप गोविंदाचार्य. 1989 के आखिरी में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बन गई. वीपी सिंह के नेतृत्व में. उसे बीजेपी और वाम मोर्चे का समर्थन हासिल था. बीजेपी अब ताकतवर थी. पिछली लोकसभा के 2 के मुकाबले इस बार उसके 88 सांसद थे. यह सब रामजन्मभूमि आंदोलन के चलते हुआ था. इसलिए पार्टी अध्यक्ष आडवाणी ने तय किया. रामनाम लेते रहना है. उन्होंने गोविंदाचार्य और प्रमोद महाजन के साथ विचार मंथन किया.

तय हुआ कि बीजेपी के चार नेता चार दिशाओं से एकात्मकता यात्रा निकालेंगे. अटल जम्मू से, विजयराजे सिंधिया गुवाहटी से, सिकंदर बख्त मुंबई से और आडवाणी कन्याकुमारी से. पहला विकेट गिरा सिंधिया का. उन्होंने खराब स्वास्थ का हवाला देते हुए इनकार कर दिया. सिकंदर बख्त बोले, यार, मुझे सुनने कौन आएगा. यह सुन प्रमोद महाजन की पेशानी पर बल पड़ गए. वह अटल बिहारी वाजपेयी के पास पहुंचे. यात्रा अभी भी मुमकिन थी. अटल जम्मू से चल आधा देश नापते और आडवाणी कन्याकुमारी से आधी दूरी पर आते. प्रमोद ने विस्तार से सब कहा. अटल ने एक वाक्य में झिड़कते हुए जवाब दिया.  – मैं नौटंकी में विश्वास नहीं करता.

अब आडवाणी अकेले बचे थे. लेकिन वह हथियार डालने को तैयार नहीं थे. उनकी संगठन पर पकड़ थी. उन्हें पता था कि संसदीय परंपरा में रचे पगे बाकी नेता हवा भांप नहीं पा रहे. उनके सामने दो तारीखें भी थीं. पहली, 9 नवंबर 1989. जब बिहार के एक हरिजन कामेश्वर चौपाल के हाथों विहिप ने रामजन्मभूमि गर्भगृह से 192 फीट दूर हवन और भूमि पूजन के बाद शिलान्यास की पहली शिला रखवाई. दूसरी तारीख थी 30 अक्टूबर 1990. वीपी सिंह ने संतों से 3 महीने मांगे थे. रामजन्मभूमि विवाद के लिए. मगर तब तक बात नहीं बनी. तो महंत अवैद्यनाथ ने ऐलान कर दिया. 30 अक्टूबर से मंदिर निर्माण चालू होगा. इस तारीख से पहले आडवाणी अपनी यात्रा पूरी कर लेना चाहते थे. जून 1990 में उन्होंने प्रमोद महाजन और गुरुमूर्ति की मदद से रूट तय किया. यहीं पर आडवाणी को महाजन ने अहम सलाह दी. आडवाणी अपने कई अहम राजनीतिक फैसलों की चर्चा पत्नी कमला से करते थे. एक शाम दोनों बैठे थे. तब चाय पर चर्चा करते हुए आडवाणी बोले, मैं राममंदिर निर्माण के लिए पदयात्रा निकालने की सोच रहा हूं. तभी प्रमोद महाजन भी वहां पहुंच गए. आडवाणी ने उन्हें भी इस विचार की सूचना दी. बोले, दीन दयाल उपाध्याय की जयंती 25 सितंबर या फिर गांधी जयंती 2 अक्टूबर के दिन यात्रा शुरू की जा सकती है. ये 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचे, ऐसा विचार है. महाजन ने विचार का समर्थन किया, मगर यह भी जोड़ा कि पदयात्रा में ज्यादा इलाके कवर नहीं होंगे. मीडिया कवरेज भी सीमित रहेगी. इसलिए आप गाड़ी पर सवार हों. फिर महाजन ने मेटाडोर कस्टमाइज करवाई. उसे रथ का रूप दिया. और नाम भी रखा- रामरथ यात्रा.

1990 में आडवाणी का रथ.
1990 में आडवाणी का रथ.

अटल बिहारी वाजपेयी इस तमाशे से खुद को दूर रखे हुए थे. वह पुराने मित्रों से मिलते, अध्ययन करते और नाम भर की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होते. लेकिन संघ के दबाव में उन्होंने रथयात्रा को दिल्ली में हरी झंडी दिखाने की हामी भर दी. मगर यहां भी वह अपने विचार साफ करने से बाज नहीं आए. कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे. आडवाणी तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं. वाजपेयी बोले. अयोध्या का अर्थ समझते हैं आप लोग. वह जगह जहां युद्ध नहीं होता. जब युद्ध ही नहीं तो योद्धा कैसे. आडवाणी जी वहां यात्रा पर जा रहे हैं, लड़ाने लड़ने नहीं.

मगर आडवाणी इस सियासी लड़ाई के लिए तैयार थे. और इस बार उनका मुकाबला कांग्रेस से नहीं वीपी सिंह की सरकार से था. आडवाणी को अंदेशा था कि उनकी यात्री रोकी जा सकती है. प्रधानमंत्री या उनकी पार्टी के मुख्यमंत्रियों के इशारे पर. ये मुख्यमंत्री थे यूपी में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव. इसलिए यात्रा के आखिरी चरण से पहले 17 अक्टूबर को दिल्ली में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई. इसमें प्रस्ताव पेश किया गया कि अगर सरकार ने आडवाणी की रथयात्रा रोकने की कोशिश की तो बीजेपी समर्थन वापस ले लेगी. अटल इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे. उन्हें अंदाजा था कि वीपी सिंह राममंदिर समस्या का हल निकालने की कोशिश में जुटे हैं. ऐसी एक कोशिश अरुण नेहरू, अजीत सिंह और दिनेश गोस्वामी के चलते फेल हो चुकी थी. मगर पुराने समाजवादी कृष्णकांत, जॉर्ज फर्नांडिस, अरुण जेटली और गुरुमूर्ति जुटे थे. दिक्कत यह थी कि सरकार विहिप से आश्वासन चाहती थी. कि अयोध्या के बाद मथुरा और काशी की मांग नहीं की जाएगी. यहीं चीजें बिखर गईं.

बहरहाल कार्यकारिणी बैठक में अटल के करीबी अप्पा घटाटे मौजूद थे. अटल के इशारे पर वह बोलने के लिए खड़े हुए. प्रमोद महाजन उनकी मंशा भांप गए. वह अप्पा पर हावी होते हुए बोले, आप समर्थन कर रहे हैं या नहीं. इस पर वाजपेयी आपा खो बैठे. वह प्रमोद महाजन को आंखों तरेरते हुए बोले, उन्हें बोलने तो दो. महाजन अपनी जगह वापस ढेर हो गए. घटाटे ने पूछा. अगर रथयात्रा को बिहार और यूपी के बजाय पं. बंगाल में रोका गया, तब हम क्या करेंगे. क्या तब भी समर्थन वापस लेंगे. इस सवाल का किसी के पास जवाब नहीं था. वाजपेयी बैठक से चुपचाप चले गए. प्रस्ताव पारित मान लिया गया.

वीपी सिंह, आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी
वीपी सिंह, आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी

उधर वीपी सिंह को भी अंदाजा था. कि आडवाणी की गिरफ्तारी का मतलब सरकार गंवाना होगा. लेकिन उनके ऊपर दवाब था. शरद यादव का. एक गणित भी थी. एक सबक भी. एक दूसरे में नत्थी. कि मुस्लिम वोटों को अपने पाले में करने का यही मौका है. मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का ऐलान कुछ महीने पहले अगस्त 1990 में हो चुका था. ऐसे में जनता दल नेताओं को ओबीसी वोट अपने पक्ष में दिख रहा था. अगर इस वोट बेस पिरामिड में मुस्लिम स्थायी रूप से जोड़ने हैं तो आडवाणी का रथ रोकना होगा. ये समझ शरद ने वीपी को दी. सब ये भी जानते थे कि जो रथ रोकेगा वो कथित सेकुलर खेमे में हीरो बन जाएगा. मुलायम सिंह यादव इसकी तैयारी में बैठे थे. मगर वीपी सिंह यूपी की सियासत से निकले खिलाड़ी थे. वह मुलायम स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स पसंद नहीं करते थे. मुख्यमंत्री की रेस में भी आखिरी तक वह मुलायम के मुकाबले अजीत सिंह की पीठ पर हाथ धरे थे. इसलिए उन्होंने मुलायम के बजाय लालू पर दांव खेलने का फैसला किया. लालू ने आडवाणी की रथयात्रा को समस्तीपुर में रोक दिया. तब के डीएम और अब के मोदी सरकार में मंत्री आरके सिंह ने उन्हें गिरफ्तार किया. आडवाणी को हेलिकॉप्टर में बैठाकर बिहार (अब झारखंड) के पं. बंगाल से जुड़े हिस्से दुमका में एक गेस्टहाउस मे बंद कर दिया. पांच हफ्ते के लिए.

अब नजर बिहार से दिल्ली की ओर टिक गई. एक समूह राष्ट्रपति भवन की तरफ बढ़ रहा था. राष्ट्रपति थे आर वेंकटरमण. उनसे मिले बीजेपी नेता. अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में. पहले से तैयार चिट्ठी सौंपने. समर्थन वापसी की.

उधर मुलायम अपनी कॉल मिस होने से चिढ़े थे. उन्होंने केंद्र सरकार की सेहत की परवाह बंद कर दी. और अपना ध्यान 7 दिन बाद होने वाली विहिप की कारसेवा पर फोकस कर दिया. 30 अक्टूबर के पहले गिरफ्तारियां होने लगीं. महंत अवैद्यनाथ को कानपुर के एक स्टेशन पनकी पर रेल रोक गिरफ्तार कर लिया गया. इन सबके बावजूद लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंच गए. वहां पुलिस ने गोलीबारी की, जिसमें दर्जनों कारसेवक मारे गए.

lalu nitish mulayam

और इसके बाद. समय हर बाद के आगे जाता है. कारसेवकों के अस्थि कलश घुमाए गए. मुलायम सिंह को मुल्ला मुलायम का दर्जा मिला. बीजेपी की सरकार आई. कल्याण सिंह के कार्यकाल में मस्जिद को एक और कारसेवा के दौरान गिरा दिया गया. आडवाणी मंच से शांति की अपील करते रहे.

और अटल. वह अयोध्या में नहीं थे. वह इस युद्ध के योद्धा नहीं थे. वह लखनऊ से लौट गए थे. लखनऊ, जहां से वह सांसद थे. लखनऊ जो गंगा जमुनी तहजीब का एक मर्कज कहा जाता है. लखनऊ जो लक्ष्मण के नाम पर बसा माना जाता है. लक्ष्मण, जिसकी उपमा अटल ने महाजन को दी थी. मगर शक्ति लगी तो कोई संजीवनी उनके काम नहीं आई.

यही समय है. यही सियासत है. तमाम तर्कों से परे.

इस आर्टिकल के कई प्रसंग वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब से लिए गए हैं. इस किताब का टाइटल है यदा यदा हि योगी. इसमें योगी आदित्यनाथ के बहाने बीजेपी के इस नए पड़ाव तक पहुंचने की कहानी बयां की गई है.

विजय त्रिवेदी की किताब यदा यदा हि योगी.
विजय त्रिवेदी की किताब यदा यदा हि योगी का कवर.

किताब- यदा यदा हि योगी

राइटर- विजय त्रिवेदी

पब्लिकेशन- वेस्टलैंड

कीमत- 299 रुपये (पेपरबैक एडिशन)


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