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इस आदमी ने करवाया था आज़ाद भारत पर पहला मिलिट्री हमला

आज उस इंसान की बात जिसके प्रधानमंत्री रहते आज़ाद भारत पर पहला मिलिट्री हमला हुआ. जो गुलाम भारत के मुजफ्फरनगर (यूनाइटेड प्रोविंसेज) से पहली बार चुनाव लड़ नेता बना. और आजाद पाकिस्तान में मोहाजिरों ( इंडिया से गए लोग) का सपोर्ट करने का आरोप लेकर मरा. नवाबज़ादा लियाक़त अली खान. पाकिस्तान का पहला पीएम. पाकिस्तान का नाम लियाक़त के नाम से शुरू होता है.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ा ये बालक मुहम्मद अली जिन्ना के संपर्क में आया और फिर इसको भी उस दौर की बीमारी ने घर कर लिया कि हिन्दू-मुस्लिम साथ नहीं रह सकते. लड़ के लेंगे पाकिस्तान.

liaqat ali khan with jinnah
मुहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान 

इंडिया के फाइनेंस मिनिस्टर से पाकिस्तान के प्राइम मिनिस्टर तक

इंडिया के पार्टीशन के ठीक पहले एक टेम्पररी सरकार बनी थी. जिसके प्रधानमंत्री थे जवाहर लाल नेहरू. इस सरकार के फाइनेंस मिनिस्टर थे लियाक़त अली खान. और ये सरकार कांग्रेस-मुस्लिम लीग के लिए आखिरी मौका थी, पार्टीशन रोकने के लिए. पर ऐसा हुआ नहीं. दोनों एक-दूसरे पर इल्जाम लगाते रहे. लियाकत पर इल्जाम लगता था कि फाइनेंस मिनिस्टर की हैसियत से वो किसी भी मंत्रालय को पैसा ही नहीं रिलीज करते थे. हर बात में चिक-चिक. मतलब सरकार चलने ही नहीं देना चाहते थे.

नतीजन 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बना और लियाकत अली खान इसके पहले प्रधानमंत्री बने. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री ने एजुकेशन, साइंस, टेक्नोलॉजी के लिए बड़ी कोशिश की. उस वक़्त के मशहूर विद्वान ज़िआउद्दिन अहमद को जिम्मेदारी दी पाकिस्तान के एजुकेशनल सिस्टम को सुधारने की. फिर 1949 में नेशनल बैंक ऑफ़ पाकिस्तान बनाने का श्रेय भी इनको जाता है. फिर नेहरू-लियाकत पैक्ट भी हुआ. रिफ्यूजी समस्या सुलझाने के लिए. देर से ही सही.

बहुत तेजी में थे. सब सुधारना चाहते थे, सब बिगाड़ने के बाद.

नेहरू-लियाकत पैक्ट
नेहरू-लियाकत पैक्ट

पर सब कुछ फील गुड नहीं था. इनके पांच काम जिन्होंने पाकिस्तान की दशा और दिशा दोनों तय कर दिए.


1.पाकिस्तान के बनने के बाद कायद-ए-आज़म जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान में हर धर्म के लोग रहेंगे. पर जिन्ना एक बात भूल रहे थे कि लोगों को पाकिस्तान बनाने की सलाह इस्लाम के नाम पर ही दी गई थी. तो नए-नवेले पाकिस्तान में धर्मांध लोग अपने हिसाब से सब तय करना चाहते थे. और डेमोक्रेसी के लिए ऐसे लोग बड़े खतरनाक होते हैं. इनको रोकने के लिए लियाकत अली खान ऑब्जेक्टिव रिजलुशन लेकर आये. पर कहते हैं कि इसी नेक काम की बदौलत वैसे सारे लोगों को मान्यता मिल गई. एक बार आपने उनको मान-सम्मान दे दिया और उनसे किसी तरह का समझौता कर लिया, फिर तो आप उनसे हार ही जायेंगे. हालांकि इसमें साफ़-साफ़ लिखा था कि माइनॉरिटी को अपने हिसाब से रहने का हक़ है. पर उसके ठीक ऊपर ये भी लिखा था कि पाकिस्तान इस्लामी देश है और यहां के लोग कुरान और सुन्नत के हिसाब से रहेंगे. बाद में जिया-उल-हक ने इसी का इस्तेमाल कर शरिया थोप दिया पाकिस्तान पर.


2.फिर उस वक़्त इंडिया रूस के साथ अपने रिश्ते बढ़ा रहा था. और सबको पता था कि जहां अमेरिका हाथ डालेगा, सेर भर मांस तो खींच ही लेगा. क्योंकि अमेरिका कम्युनिज्म से इतना ज्यादा घबरा गया था कि रूस को रोकने के लिए वो कुछ भी कर सकता था. किया भी था. द्वितीय विश्व-युद्ध ख़त्म होने का उस पर कोई असर नहीं था. बराबर टेंशन देते रहता था सबको. लियाकत अली खान ने अमेरिका को ही चुना. इनको लगा कि रूस के चलते इस्लामिक देश परेशान हैं. इनको सारे इस्लामिक देशों का नेता बनना था. तो अमेरिका ठीक रहेगा. और अमेरिका को इस क्षेत्र में एक ऐसा दोस्त चाहिए था जिसके पास अपना दिमाग न हो. जहां से अमेरिका भारत, चीन, रूस और सेंट्रल एशिया को कंट्रोल कर सके. और यही हुआ भी.

लियाकत अली खान और अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रूमैन
लियाकत अली खान और अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रूमैन

3.वहीं राजनीति में लियाकत को अपनों से ही डर था. डायरेक्ट एक्शन डे के नायब सुहरावर्दी का प्रभाव बढ़ते ही जा रहा था. उसको रोकने के लिए लियाकत को विश्वासी लोगों की जरूरत थी. पर इंडिया से गए लोगों पर लियाकत को भरोसा नहीं था. वो सिर्फ वेस्ट पंजाब से ढूंढ रहे थे. इससे बाकी जगहों के लोग नाराज हो जाते थे. विडम्बना ये है कि बाकी जगहों से गए लोगों के हक़ के लिए लियाकत चिंतित भी थे.


4. फिर जब पाकिस्तानी फ़ौज ने कबायलियों के साथ मिलकर भारत पर हमला कर दिया तब लियाकत ने रोकने की कोशिश नहीं की. ये लियाकत अली खान की प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे बड़ी हार थी. इस चीज ने पाकिस्तान के मन में भारत के प्रति नफरत भर दी. लियाकत इस चीज को रोक सकते थे.


5.अपने देश को एकदम पाक रखने के लिए लियाकत अली खान ने एक कदम उठाया था जो हैरान करने वाला था. क्योंकि उस वक़्त ये कोई नहीं करता था. Public Representative Offices Disqualification Act (PRODA) एक्ट लाया गया. भ्रष्टाचार और अपने पद का दुरुपयोग रोकने के लिए. अगर ऐसा पाया गया तो नेता दस साल के लिए बैन हो जाते थे. पर लियाकत पर आरोप लगा कि मुस्लिम लीग के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ऐसा एक्ट लाया गया है. क्योंकि विपक्षी ही ज्यादा जेल में जाते थे. फिर आलम ऐसा हुआ कि कोई भी किसी भी नेता के खिलाफ शिकायत दर्ज करा देता और उसे जेल जाना पड़ता. राजनीति से ही बर्खास्त हो जाता. एक नए पैदा हुए देश में ये बड़ा भयावह हो गया था. ये कानून भी एक वजह बना मिलिट्री राज लाने के लिए. इसके बाद पाकिस्तान में आये तानाशाहों ने ऐसे और कानून लाये. अयूब खान के समय मिलिट्री सिविल सर्वेन्ट्स को भी बर्खास्त करती थी. बाद में बेनजीर भुट्टो की सरकार को इसी आधार पर बर्खास्त कर दिया गया. ये उत्साह अच्छी चीज है. पर अति-उत्साह से पॉलिटिकल सिस्टम ही डैमेज हो गया. इसका खामियाजा पाकिस्तान ने खूब भुगता है.


फिर हुआ प्रधानमंत्री का क़त्ल जिसने पाकिस्तान में मिलिट्री राज की नींव रख दी.

ऐसा नहीं था कि लियाकत अली खान निर्विवाद नेता थे. उनके दुश्मन भी बहुत थे. पाकिस्तान बनने के एक साल बाद ही सरकार गिराने की कोशिश होने लगी. एक फेमस रावलपिंडी कांस्पीरेसी भी हुई थी. जिसमें मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ भी शामिल थे. ये लोग पकड़ लिए गए. जेल गए. फिर देश छोड़ दिए. इन सारी चीजों ने लियाकत अली खान की नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए. साथ ही पाकिस्तान की स्थिति पर जहां प्रधानमंत्री भी सुरक्षित नहीं था.

वही हुआ भी. 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी के कंपनी बाग़ में लियाकत अली खान की गोली मारकर हत्या कर दी गई. उनके हत्यारे को दो लोगों ने मार दिया. उन दो लोगों को पब्लिक ने मार दिया. इस केस के जांच कर रहे ऑफिसर प्लेन क्रैश में मारे गए. कंपनी बाग़ का नाम लियाकत बाग़ कर दिया गया. और 56 साल बाद यहीं से जाते वक़्त बेनजीर भुट्टो की भी हत्या हुई. लियाकत की हत्या आज भी रहस्य है. बल्कि तिलिस्म है. बहुत लोग कहते हैं कि अमेरिका ने मरवाया. बहुत कहते हैं कि पाकिस्तानी नेताओं ने मरवाया. कहने वाले कहते रहते हैं. सच किसी को पता नहीं.

लियाकत के मरने के 5-6 साल के अन्दर ही मिलिट्री जनरल अयूब खान ने सत्ता पलट कर दिया. और पाकिस्तान में मिलिट्री राज की शुरुआत हो गई. किसी भी देश के लिए इससे दर्दनाक कुछ हो नहीं सकता. जनता के बीच घास छीलकर गए नेताओं की बात अलग होती है.

अयूब खान
अयूब खान

अयूब खान ने अपनी आत्मकथा “Friends Not Masters”में लिखा है:

लियाकत अली खान के क़त्ल के बाद जब मैं पाकिस्तान पहुंचा तो मैंने देखा कि नए प्राइम मिनिस्टर ख्वाजा नज़ीमुद्दीन, मोहम्मद अली, मुश्ताक अहमद और बाकी सारे एकदम मस्त हैं. लियाकत का नाम किसी की जबान पर नहीं था. किसी के मन में कोई दुःख नहीं था. ऐसा लग रहा था कि सब के सब इंतजार कर रहे थे इसी चीज का. प्रमोशन लेने के लिए. मुझे ये लगा कि ये लोग कितने स्वार्थी हैं. इनको इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि देश ने एक ऐसा आदमी खो दिया है जो पूरे देश को बांधकर रखता.


ये स्टोरी हमारे साथी ऋषभ श्रीवास्तव ने की है.


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