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'मां-पापा को नहीं पता, फोन के इस तरफ मेरी शक्ल कितनी बदल गई है'

pp ka column

एक साल हो गया कॉलेज, हॉस्टल लाइफ ख़त्म हुए. इस एक साल के दरम्यान लाइफ में जितने बदलाव आए हैं, ऐसा लगता है 10 साल उम्र बढ़ गई हो.

कॉलेज लाइफ से सबका नॉस्टैल्जिया जुड़ा होता है. दोस्त, दुश्मन, ऐश, लड़ाइयां, रूल्स तोड़ना, आखिरी रात असाइनमेंट लिखना. लेकिन एक अलग लेवल पर, एक अलग फ्रीक्वेंसी पर हमारे कैंपस हमारे साथ कुछ और भी कर रहे होते हैं. हमारे दिमाग की बनावट बदल रहे होते हैं. हमें हमारी पॉलिटिक्स समझा रहे होते हैं. हमें ढाल रहे होते हैं, जीने के लिए कुछ वैल्यूज दे रहे होते हैं.

हम जब कॉलेज से बाहर निकलते हैं, अपने वैल्यू सिस्टम को साथ लेकर निकलते हैं. हमें यकीन होता है कि हम इन्हीं शर्तों पर जिएंगे. कभी इनसे समझौता नहीं करेंगे. फिर हम नौकरी की ओर बढ़ते हैं. और धीरे-धीरे अपनी वैल्यूज के साथ ‘एडजस्टमेंट’ शुरू करते हैं. आंधी की तरह चौड़ में घूमने वाले हम लोग अपने बॉस के फैसले स्वीकार करना सीखते हैं. शादी कर अपने लाइफ पार्टनर के के साथ ‘एडजस्ट’ करते हैं. और ‘एडजस्टमेंट’ की ये फेहरिस्त लंबी होती चली जाती है.

जैसा मैंने पिछले कॉलम में लिखा था, लड़कियां घर से निकल एक प्यारी सी आज़ादी पाती हैं. अपना शहर छोड़, एक नए शहर की आज़ादी. घर से दूर, जहां सड़क पर चलते हुए पड़ोस के अंकल नहीं मिलते, नमस्ते करने को. दुकानों पर जान-पहचान के लोग नहीं मिलते. हम सभी इस नए शहर में अपने पिता का सरनेम लगाने वाली बेटियां नहीं होती, एक इंडिविजुअल होती हैं. एडल्ट, अपने फैसले खुद लेने वालीं. मम्मी-पापा फोन पर निर्देश देते हैं, पर उनका पालन हुआ है या नहीं, चेक करने नहीं आ सकते. और ज़िंदगी के ये 4-5 साल मानो हमारा DNA ही बदल देते हैं.

मैंने दिल्ली में अंग्रेजी लिटरेचर की पढ़ाई की. लिबरल आर्ट्स. जहां आपकी कही हुई हर बात की वैल्यू होती है. आपकी विचारधारा भले ही लोग पसंद न करें, पर कभी उसका विरोध नहीं करते. यही तो आर्ट्स है न. कि एक कविता, कहानी, बात या तस्वीर के हजार मतलब हो सकते हैं, और सभी मतलब मान्य होते हैं. ‘परसेप्शन’, ‘पर्सपेक्टिव’ और ‘फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ की कद्र होती है.

क्लासरूम में हमने जाना, औरतों के बारे में कितने झूठ, स्टीरियोटाइप फैले हुए हैं. कितने चुटकुले, टीवी सीरियल और फिल्में सेक्सिस्ट होते हुए भी खूब पैसे कमा रहे हैं. कैसे एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से लेकर मीडिया औरतों के शरीर भुना ऑडियंस पाते हैं. हमने समझा कि किस तरह समलैंगिकता ‘नॉर्मल’ है. हमने जाना किस तरह ट्रांसजेंडर होना ‘नॉर्मल’ है. हमने सीखा कि ‘जेंडर’ एक हमारी गढ़ी हुई चीज है, प्रकृति की नहीं. हम जिस क्लासरूम में थे, वहां लिंगभेद तो क्या, लिंग का कॉन्सेप्ट ही ख़त्म हो चुका था.

क्लासरूम में हमने समाज में अपने ‘होने’ को समझा. अपनी भूमिकाएं समझीं. अपने वैल्यू सिस्टम बनाए. और तय किया कि अपने ‘होने’ से कभी कोई समझौता नहीं करेंगे.

फिर हमने क्लासरूम के बाहर कदम रखे. और पता पड़ा कि पढ़ी हुई चीजें एक भ्रम थीं.

मीडिया हाउस में काम करने के नाते मुझे रोज सैकड़ों ख़बरें सुनने को मिलती हैं. उसमें से आधी रेप और ऑनर किलिंग की होती हैं. किसी भले दिन अखबार उठा के पढ़ लीजिए, पता लग जाएगा कि सच क्या है, अंदर के पन्नों का. अखबार के अंदर के पन्ने हमारे समाज के अंदर के पन्ने हैं. केंद्र से दूर, बड़े शहरों से दूर.

जिस वक्त बड़े शहरों में ‘स्लट वॉक’ हो रही थी, राजस्थान के गांव में कोई नवजात बच्ची को कूड़े के ढेर में फेंक रहा था. जिस समय बड़े शहरों में ‘प्राइड वॉक’ हुई, हिजड़ा समुदाय की कोई ट्रांसजेंडर HIV से मरी. जिस वक्त किसी बड़े ऑडिटोरियम में ‘जेंडर कॉन्फ्रेंस’ हुई, किसी लड़की का रेप हुआ.

कहने का अर्थ ये कतई न लगाया जाए कि स्लट वॉक, प्राइड वॉक या जेंडर कॉन्फ्रेंस कराने का कोई मतलब नहीं. या ये सारी पढ़ाई गैरजरूरी है. कहने का अर्थ ये है कि जो हुआ, महज क्लासरूम में हुआ. हम शहर में पढ़े. फिर विदेश में पढ़े. फिर औरों को पढ़ाया. लेकिन जो औरतें, पुरुष या ट्रांसजेंडर इस प्रगतिवाद से अछूते थे, वो अछूते ही रहे.

कॉलेज के बाद आपकी क्लास की आधी लड़कियों को घर बुला लिया जाता है, शादी के लिए. आपकी सबसे प्यारी सहेली की शादी कर दी जाती है, उसकी मर्ज़ी के खिलाफ. आपके मां-पापा को नहीं पता होता, ‘फेमिनिस्म’ किस चिड़िया का नाम है. पढ़ाई के पांच सालों तक फ़ोन के इस तरफ आपकी असल शक्ल कितनी बदल गई है, उन्हें नहीं पता होता. फिर शादी और नौकरी को लेकर आप उनसे बहस करती हैं, रोती हैं. उनके प्रेम से विवश होकर हथियार डालना चाहती हैं. फिर कॉलेज के वक़्त तय की हुई वैल्यूज याद आ जाती हैं. और आपका मन खिचने लगता है, आटे की किसी लोई की तरह. आप डरती रहती हैं कि ये दिमाग टूटकर बिखर न जाए. रोती हैं, डिप्रेस होती हैं. इमोशनल ब्रेकडाउन आपको कमज़ोर और खोखला कर देते हैं.

कॉलेज से पढ़कर निकली हुई ऐसी एक भी लड़की को मैं नहीं जानती जो इस द्वंद्व में न हो. एंग्जायटी, डर, नींद न आना, नौकरी में टारगेट तक न पहुंच पाना, जैसे हमारे दौर की सबसे आम समस्याएं हैं.

‘अब शादी की उम्र हो चली है’.

‘क्यों थोड़े से पैसों के लिए नौकरी करती हो, क्या हम तुम्हें पाल नहीं सकते.’

‘टीचरी कर लो, घर के लिए वक्त निकाल पाओगी.’

घर से आए ये सवाल आपको कुरेदते हैं. घाव से बना देते हैं. या तो आप हथियार डाल समाज को अपना लेती हैं. या इसी द्वंद्व में जीती रहती हैं.

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आरामकुर्सी

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